अफ्रीका से सोन-घाटी : स्याह गुफाओं में कोहबर के हजारों साल बाद दमकते ‘सात फेरेÓ तक !

डेहरी-आन-सोन (बिहार)-विशेष प्रतिनिधि। आप बिहार के सोन नद अंचल की 21वीं सदी के सबसे बड़े सामाजिक-सांस्कृतिक समाचार से रू-ब-रू हैं। सोन नद की विश्वविश्रुत घाटी-भूूमि पर मानव सभ्यता-यात्रा में ऐसा पहली बार हुआ है कि इतिहास पीछे लौटा है। हजारों वर्ष पूर्व काले, घुंघराले बालों वालों ने अफ्रीका से नंग-धड़ंग चल सोन नद किनारे कैमूर की गुफाओं में कोहबर बनाया था। 2019 के जनवरी में नीली आंखों वाली ने उसी अफ्रीका से प्रेमी के साथ ‘जनम-जनम के सात फेरेÓ लगाने के लिए मय लगेज-लश्कर सपरिवार सोन नद तट पर बसे गांव शंकरपुर (बिहार के रोहतास जिला में इंद्रपुरी थाना अंतर्गत) पहुंची। उसके विदेशी परिवार को भारत-यात्रा के लिए कई महीनों तक कानूनी तैयारी करनी पड़ी और भारतीय हिन्दू विवाह पद्धति के अनुरूप पूरे परिवार को सांस्कृतिक अभ्यास भी करना पड़ा।

अफ्रीका से नंग-धड़ंग चला था आदमी, 70 हजार साल पहले पहुंचा था अंडमान

कोई 65-70 हजार साल पहले मानव प्रजाति (होमोसैपियन) का काफिला अफ्रीका के जंगल (मुख्यत: घास के मैदान) से बेहतर भोजन-वास की तलाश में नंग-धड़ंग ही हिंद महासागर में स्थित अंडमान-निकोबार द्वीप समूह पर पहुंचा था और वहां से दक्षिण भारत में।  फिर नंग-धड़ंग पैदल ही चलकर सोन के किनारे खड़े कैमूर पठार पर 15-20 हजार साल या इससे भी पहले पहुंचा था। उन आदिम जनजातियों ने बतौर लिव-इन-रिलेशन (तब विवाह प्रथा नहीं थी) में कैमूर की गुफाओं में हजारों वर्ष गुजारे और ‘कोहबरÓ की नींंव रख सभ्य जीवन की तमीज सीखी। उन्हीं के वंशज आगे की सभ्यता-यात्रा में कैमूर की गुफाओं से बाहर निकल कर और कैमूर पठार से नीचे उतर कर कैमूर की तलहटी में वे उन स्थानों पर सैकड़ों-हजारों सालों तक रहे, जहां झरने थे, झरनों से बनी छोटी नदियां थीं और थे कैमूर पहाड़ पर चढऩे-उतरने के घाट (रास्ता)। इन स्थानों पर रहकर कैमूर के वंशजों ने फल, कंद-मूल उगाना, झोंपड़ी बनाना सीखा और सीखा भाष (बोली) का ककहरा, तो उन्हें लाखों साल के अपने शिकारी जीवन (प्रजाति) से मुक्ति मिली और उनका कायान्तरण आरंभिक किसान (अद्र्ध कृषक प्रजाति) के रूप में हुआ।

हजारों सालों के संघर्ष के बाद कैमूर से उतर कर आदमी पहुंचा हड़प्पा-मोहनजोदड़ो और यूरोप तक

कैमूर के पर्वतीय घाटों अर्थात पहाड़ पर चढऩे-उतरने के जंगली रास्तों से नीचे उतरते हुए और हजारों सालों तक प्रकृति से संघर्ष कर आगे बढ़ते, विस्थापित होते हुए आदिम जनजातियां हजारों किलोमीटर दूर भारतीय महाद्वीप की आखिरी छोर हड़प्पा-मोइनजोदड़ो तक पहुंची। वहां पहुंचते-पहुंचते उनका पूरी तरह कायान्तरण किसान और शिल्पकार प्रजाति के रूप में हो चुका था। हड़प्पा-मोहनजोदड़ों में उन्होंने नगर सभ्यता की नींव रखी और वहां सत्ता, कारोबार का केेंद्र स्थापित कर हजारों सालों में अपनी सभ्यता-संस्कृतिक-कारोबार का अरब, यूरोप की धरती तक विस्तार किया। सभ्यता विस्तार के इस बहुत लंबे कालखंड में इनका काला रंग गोरा, घुंघराला बाल फरहरा, थोड़ी झुकी रीढ सीधी, ठिगना कद लंबा, काली आंखें भूरी-हरी-नीली हो जाने से उनका कायान्तरण अब आधुनिक मानव प्रजाति (होमोसैपियन होमोसैपियन) के रूप में हो चुका था।

कैमूर की एक पुरानी जनजाति अस्तित्व संकट में, सभ्यता की नींव रखने अंडमान द्वीप से आए थे बिंध्य-कैमूर के पुरखे

कैमूर पहाड़ पर रहने वाली एक आदिम जनजाति कोरवां तो अंडमान की आदिम जनजाति की तरह अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही है, जिसकी जनसंख्या-वृद्धि लगभग अवरुद्ध बनी हुई है। जैविक दृष्टि से कोरवां जनजाति अंडमान-निकोबार की आदिम जनजातियों की करीबी मानी जाती है। जैविक विश्लेषणों, डीएनए परीक्षणों से तय किया जा चुका है कि अंडमान के आदिवासी पूरे एशिया के मानव समुदाय के पूर्वज हैं, जो अफ्रीका के जंगलों से भारत भूमि के अंडमान निकोबार द्वीप (हिन्द महासागर क्षेत्र) पर पहुंचे थे और आज भी प्राकृतिक अवस्था (नंग-धड़ंग जंगली जीवन) में रहते हैं। भारत की 72 अति आदिम जनजातियों में शामिल अफ्रीका और अंडमान की अति आदिम जनजातियों की तरह दिखने वाली कैमूर पर्वत की कोरवां जनजाति का अस्तित्व-संकट में है, जिसकी आबादी घट रही है। यही वजह है कि अनिवार्य नसबंदी के दौर में भी जिलाधिकारी को इस समुदाय पर नसबंदी की अनिवार्यता नहीं लागू करने का आदेश जारी करना पड़ा था।
समूचे एशियावासी हैं अंडमानियों के वंशज और अफ्रीका से आए थे अंडमान के आदिम आदिवासी
अफ्रीका से अंडमान पहुंची आदिम जनजातियां छोटे-छोटे जनसमूहों मे 12-15 हजार साल पहले तक समुद्र-द्वीप से बाहर निकलती रही थीं। वे अलग-अलग कालखंडों में हजारों सालों तक दक्षिण भारत में रहने के बाद आगे बढ़ते हुए झारखंड-बिहार की विश्वविश्रुत सोन नद की घाटी के कैमूर (बिंध्य पर्वतश्रृंखला की एक कड़ी) पठार को पार कर सभ्यता के अगले हजारों सालों के पड़ाव पर उत्तर-पश्चिम भारत की ओर निकल पड़ी थी। आज अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह पर मौजूद पूरी तरह नंगी ही रहने वाली अति आदिम चार जनजातियां 12-15 हजार साल पहले अंडमान-निकोबार में ही छूटी और अलग-अलग द्वीप पर रह गई थीं, जिन्हें विश्व का संरक्षित समुदाय का दर्जा दिया गया है। हैदराबाद के कोशकीय एवं आणविक जीव विज्ञान केन्द्र और अमेरिका के हावर्ड मेडिकल स्कूल के वैज्ञानिक दल के अध्ययन में यह स्पष्ट हो चुका है कि भारत में 61 फीसदी आबादी एएसआई (पैतृक दक्षिण भारतीय) रक्त वाली है और भारत में उत्तर-दक्षिण के लोगों के डीएनए में अंतर नहीं है। हर संतान में मां से माइटो-कांड्रियल (डीएनए) और पिता से वाई-क्रोमोसोम (डीएनए) आता है, जिनमें एक निश्चित दर से परिवर्तन होता है और इसी परिवर्तन के आधार पर वंश-काल का निर्धारण वैज्ञानिक करते हैं। अब भारत, अमेरिका और न्यूजीलैंड के जीव वैज्ञानिकों का यह शोध (करंट बायोलाजी) भी सामने आ चुका है कि हिमयुग से पहले मौजूदा अंडमानियों के पूर्वज अफ्रीका से निकलकर अंडमान आए थे और एशिया से अरब, यूरोप में पहुंचे थे। अधिसंख्य यूरोपीय उन एशियाई शिकारी जातियों (कृषक बनने से पहले) के ही वंशज हैं, जो 15-20 हजार साल पहले मध्य एशिया से यूरोप की ओर निकल गए थे।
परिचय, प्रगाढ़ता, प्रेम और फिर विवाह-बंधन मे बदला रिश्ता

हालांकि नए डीएनए, भाषा वैज्ञानिक, पर्यावरणीय साक्ष्यों पर आधारित पूर्वानुमान विस्तृत शोध, खोज-खबर का अलग विषय है, मगर पूरी दुनिया का आदमी एक ही मूल वंश का है। भले ही धार्मिक संगठनों की कट्टरता, वाणिज्यिक वर्चस्व और राजनीतिक अधिनायकत्व के कारण देश-दुनिया की सभ्यता-संस्कृति को अलग-अलग खांचों में बांटा-देखा जाता रहा हो, एक-दूसरे को ऊंच-नीच, श्रेष्ठ-हेय, अपना-गैर की तरह समझा जाता रहा हो, मगर गोरी, नीली आंखों वालों ऐन स्टेकोवा भी उसी पूर्वज होमोसैपियन की मौजूदा वंशधर है, जो आज बुलगारिया के सोफिया शहर की प्रवासी है और अफ्रीका के मोरक्को शहर में अपने कारोबार के सिलसिले में रहती है। ऐन स्टेकोवा की कारोबारी मुलाकात कैमूर के उन आदिम पुरखों के ही वर्तमान वंशज आदित्य सिंह के पुत्र अरविंद सिंह से कुछ महीनों या कुछ साल पहले अफ्रीका के मोरक्को शहर में हुई। अरविंद सिंह बिहार के रोहतास जिला में डेहरी-आन-सोन के निकट शंकरपुर गांव के प्रवासी हैं। यह गांव कैमूर पर्वत के आखिरी छोर की तलहटी में सोन नद के किनारे बसा है।

बहरहाल, दोनों की मोरक्को शहर (अफ्रीका) में कारोबारी प्रोफेशन के दौरान नियमित मुलाकात होती थी, जिससे उनका आपसी परिचय बढ़ा। परिचय प्रगाढ़ता में और प्रगाढ़ता प्रेम में बदल गई। उनके प्यार का रिश्ता अंतत: विवाह के स्थाई बंधन सात फेरों में बंध गया। महीनों की तैयारी के बाद ऐन स्टेकोवा का पूरा परिवार उत्तर-पूर्व यूरोपीय देश बुल्गारिया की राजधानी सोफिया से छह हजार से भी अधिक किलोमीटर की दूरी तय कर डेहरी-आन-सोन आया, होटल में ठहरा और पाली रोड-सिनेमा रोड स्थित अग्रसेन भवन परिसर में ऐन स्टेकोवा और अरविंद सिंह के हिन्दू रीति-रिवाज से संपन्न हुए विवाह-कार्यक्रम की सामाजिक परिपाटी में सक्रियता के साथ भाग भी लिया। इस विदेशी परिवार को यह नहीं पता था कि वह उस भूमि, उस स्थल पर खून का नया रिश्ता बनाने जा रहे हैं, जहां हजारों साल पहले उनके पुरखों की वंश-शाख अलग हुई थी। बेशक, हिन्दू रीति-रिवाज में तो हजारों सालों की मानव सभ्यता-यात्रा में आग पर अधिकार, वाणी (स्वर-यंत्र) के विकास, कृषि, वास्तु, परिधान, ज्योतिष गणना, युद्ध, नायक-देवों के वर्चस्व, विधि संहिता, कराधन आदि के साथ सभ्यता-पूर्व गुफाओं में रहने, कोहबर बनाने (चित्र-रेखांकन) के अवशेष भी बचे हुए हैं।

(विशेष रिपोर्ट : कृष्ण किसलय, साथ में आरंभिक सूचना और तस्वीर : उपेन्द्र कश्यप और निशांन्त राज)
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(तस्वीरों में : अंडमान में 65 हजार सालों से बोली जानेवाली भाषा (बो) बोलने वाली आखिरी महिला बो-सीनियर, अरविंद सिहं के परिवार के साथ ऐनस्टोकोवा का परिवार, कैमूर पर अंडमान से नंग-धड़ंग पहुंचने वाला अनुमानित आदिम मानव पूर्वज, अफ्रीका और बुल्गारिया से आए बाराती)
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(कृष्ण किसलय बिहार-झारखंड की सोनघाटी के संबद्ध जिलों के सांस्कृतिक इतिहास के अन्वेषण-अध्ययनकर्ता और विज्ञान लेखक हैं)
फोन 9708778136
संपर्क : सोनमाटी-प्रेसगली, जोड़ा मंदिर, न्यूएरिया, डालमियानगर-821305, जिला रोहतास, राज्य बिहार (भारत)

 

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