आकांक्षा सक्सेना की कहानी : …और शहर मैं भी तो गई थी

कहानी

…और शहर मैं भी तो गई थी

-आकांक्षा सक्सेना


नवोदित लेखिका, पत्रकार और ब्लागर आकांक्षा सक्सेना की यह कहानी  इच्छा-दमन की समस्या और मनोचिकत्सकीय समाधान पर आधारित है। शहरों पर अति आधुनिकता में उच्श्रृंखल होने के आरोप और गांवों पर दकियानुस बने रहने की प्रवृत्ति को एक नये नजरिये के साथ देखने-प्रस्तुत करने, दमित मन का चित्रण करने का लेखिका का अंदाज साहस भरा है। नवोदित कहानीकार ने अपने कथ्य को अपने कथा-शिल्प में अपनी जिस कोंपल-क्षमता से, जिस मनोविज्ञान से बुनने का प्रयास किया है, वह प्रभाव पैदा करता है और अपना असर छोड़ जाता है। पेश है सोनमाटीडाटकाम के वातायन स्तंभ में यह कहानी–     -संपादक
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खाट पर पड़े 60 साल के मलके चचा, जिन्हें पूरा गांव चचा कहकर सम्बोधित करता और चिढ़ाता था, को चाय से बहुत चिढ़ थी। चचा के घर के सामने से जो गुजरता, चाय गरम टन्न गिलास कहता तो मलके चचा उस पर गालियों की बौछार कर देते और कहने वाला हंसते हुए भाग जाता। कुछ लोग अपने बच्चों को डांटते कि मलके चचा कमजोर हो गये हैं, चाय गरम टन्न गिलास कहकर चिढ़ाया मत करो, गालियां सुनने के लिए क्यों उनका खून जलाते हो?
अचानक एक दिन चचा ने बच्चों पर चिल्लाते हुए कहा, भाग जाओ सब, अब हम मजदूरी के लिये दिल्ली जा रहे हैं, फिर सताते रहना इन दीवारों को। पड़ोस की चाची ने पूछा, दिल्ली काहे चचा? चचा बिना कुछ जवाब दिए अपने मिट्टी के कमरे के कच्चे फर्श पर पानी छिड़क करं चुपचाप लेटकर पंखा डुलाने लगे। कुछ देर बाद खुसुर-फुसर की आवाज से मलके चचा का ध्यान भंग हुआ। वह घर के पीछे आम के पेड़ों की तरफ बढ़ चले। देखा कि एक घूंघट में वृद्ध औरत और रूमाल बांधे अधेड़ आदमी थे। मलके चचा ने मन ही मन कहा घोर कलयुग है, जून की तपती दोपहरी में भी चैन नही! चचा अपने कमरे में आकर लेट गये।
उनकी पत्नी गाय की घास रखते हुए पूछा, खाना खा लिया था आपने? मगर मलके चचा तो आंख बंद किये किसी दूसरे लोक में मगन थे। चाची ने हिलाकर कहा, सो रहे क्या? मलके चचा ने चाची को घूरते हुए हाथ पकड़ लिया। चाची ने हाथ झटक कर कहा, कोई लाज-शरम है कि नहीं, चौके में रोटी-सब्जी रखी है, खा लेना। मैं गाय को पानी पिला आऊं।

मलके चचा बाहर चबूतरे पर बैठ गए और किसी स्वप्नलोक में खो गए। गली के बच्चे चाय गरम टन्न गिलास कहकर वहीं खड़े थे, पर मलके चचा ने प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की। पड़ोसी हैरान थे कि चिड़चिड़े स्वभाव के मलके चचा इतने शांत क्यों हैं?

रात सामान बांधकर और अपनी गाय सामने वाली चाची को सौंपकर मलके चचा और चाची ट्रेन से दिल्ली आ गए। दिल्ली की चकाचौंध देख मलके चचा हैरान रह गये। वे बताए गए पते पर पहुंचे, जो बहुत बड़ा बंगला था। बाहर खड़े गार्ड ने अंदर से बनवारी को बुलाया, जो बागवानी का काम देखता था। बनवारी ने चचा-चाची को देखते ही कहा अंदर आ जाओ चचा। दोनों कांपते कदमों से अंदर पहुंचे।

बनवारी ने पौध कटिंग आदि काम समझाया और फिर एक कमरा दिखाते हुए कहा कि इसमें मैं, मेरी पत्नी और लड़के की विधवा रहते हैं। पास वाले कमरे में आप दोनों रहो। रात को मालकिन आएंगी तो मिलवा देंगे।
शाम हुई तो बनवारी ने कहा कि मालिक-मालकिन आ गये हैं। हाल में हैं। तुम दस मिनट बाद मिल लो। मैं सब्जी लेने जा रहा हूं। मलके चचा थोड़ी देर टहलने के बाद हॉल में जा पहुंचे। वह अंदर बढ़ते कि कदम थम गये और वह खिड़की से अंदर का नजारा देखने लगे। खूबसूरत भारी बदन की अधेड़ मालकिन अधेड़ मालिक के साथ रोमांस कर रहीं, शराब पिला रहीं हैं।

तभी पीछे से बनवारी ने कहा, बाहर से क्या देख रहे हो चचा, यहां ये आम बात है। चलो अंदर। मलके बनवारी के साथ अंदर पहुंचे। मालकिन उठ कर आयीं और चचा के कंधे पर हाथ रखकर बोलीं, यहां आपको कोई तकलीफ नहीं होगी। फिर मालकिन मालिक के हाथ को पकड़ कर हँसते हुए अंदर कमरे की ओर चली गयीं।

मलके चचा और बनवारी दोनों अपने कमरे में लौट आये। बनवारी की विधवा पुत्रवधू ने सभी के लिये खाना परोसा और खा-पीकर सब अपने रूम में जाकर सो गये।

आधी रात मलके चचा की नींद खुलीं तो उन्होंने पत्नी को हिलाया तो वह चिल्ला उठी, सो जाओ चुपचाप, यह गांव नहीं हैं, समझे।

मलके चचा बाहर निकल कर टहलने लगे। उनके कदम मालकिन के कमरे की ओर अनायस बढ़ गये। चचा ने खिड़की से झांका तो दंग रह गए। मालकिन अंत:वस्त्र में फर्श की ओर दोनों पैर लटकाए पलंग पर बैठी थी। बनवारी फर्श पर मालकिन के पैरों से लिपटा हुआ जैसा बैठा हुआ था। वह छोटे बोतल से थोड़ी-थोड़ी शराब प्यालेनुमा गिलास में ढालकर मालकिन को दे रहा था।

दोनों इतने निश्चिंत कि किसी का डर नहीं। वहां मालिक दिख नहीं रहे थे। मलके चचा वहां से हट गए और अपने कमरे की ओर आ गए।

चचा का मन बैचेन हो उठा और वह अपने कमरे की ओर लौट पड़े। जिज्ञासावश वह बनवारी की कमरे के पास धीरे से रुक कर भीतर झांकने लगे। खुसुर-फुसुर की आवाज आ रही थी।  भीतर कमरे में मालिक बिस्तर पर लेटे हुए थे। बनवारी की बहू अपने बदन के कपड़े के सलीके से बेपरवाह, हंसती हुई मालिक का पैर दबाते हुए चिपकने का उपक्रम कर रही थी। मालिक बनवारी की बहू की साड़ी के पल्लू को खिंचते हुए, चेहरे पर मुस्कान के साथ जैसे यह कह रहे थे कि इस दरम्यान अब इसका क्या काम?

मलके चचा वहां से हट गए और अपने कमरे की ओर आ गए। मलके चचा ने एक बार फिर अपनी पत्नी से लिपटने का प्रयास किया कि पहले की तरह ही चिल्ला उठी, क्या कर रहे हो, शर्म नहीं आती, कुछ तो उम्र का लिहाज करो। मलके चचा ने बड़ी मुश्किल से सोने का प्रयास किया।

दूसरे दिन दोपहर में सब अपने-अपनेेेे काम में लगे थे। बनवारी ने कहा, कैसे हो चचा? मलके चचा ने पूछा, बनवारी तेरी उम्र क्या होगी? 50 में लगने वाला हूँ। मलके ने पूछा मालिक की कितनी उमर होगी? बनवारी ने कहा, 65 साल और मालकिन की 55-60 के करीब होगी। मलके चचा चुप हो गये। बनवारी ने पूछा, चचा चुप क्यों हो गये?

मलके ने कहा, तुम सब पर उम्र का असर क्यों नही दिखता? तुम सब खुश कैसे हो? बनवारी ने कहा कि हम खुद को जवान समझ कर जीते हैं, जो मन करता वह करते हैं।

मलके चचा ने कहा, इस उम्र पर बीवी को छुओ तो वह कहतीं कि उम्र का लिहाज करो। बनवारी ने कहा, चचा प्यार-मोहब्बत में उम्र कहां से आ गयी? बनवारी ने मलके चचा को अपने रूम में पर्दे के पीछे खड़ा कर दिया और कहा, बोलना मत, केवल देखना। बनवारी की अधेड़ औरत कमरे में आयी और बनवारी उसे चूमने लगा। उसकी औरत ने भी तेजी से चूमा। मलके चचा धीरे से कमरे से बाहर निकल गये।

एक दिन मलके चचा ने बहुत हिम्मत कर बनवारी से कहा, आजकल शहर में नाजायज रिश्ते बहुत बढ़ चले हैं। बनवारी ने कहा, मॉडर्न युग है। सबको अपने तरीके से जीने का हक है। मेरी बहू को हेपटाइटिस-बी की गम्भीर बीमारी हैै। वह कुछ महीनों की मेहमान है। अगर वह मालिक के साथ वक्त बिता रही है तो बुरा क्या है? गांव में लोग विधवा को जीने नहीं देते, बोलते हैं कि आदमी को खा गयी, कमबख्त, अपशगुनी, डायन। उसे पूजा-पाठ और शुभ कामों में बैठने नही देते।

रोज-रोज के तानों से मेरी बहू बीमार हो गयी और उसके मायके वालों ने रखने से मना कर दिया। मैं उसे यहां ले लाया। मालिक ने इलाज कराया। अब दोनों दोस्त की तरह हंस-खेल कर खुश हैं। मैं क्यों उसकी खुशी का गला घोट दूं। जिस्मानी जरूरत एक मर्द होने के नाते जितनी मुझे है, उतनी मेरी पुत्रवधू को भी है। यह बात समाज को जिस दिन समझ आयेगी, तब औरत को सम्मान मिलेगा। वरना, संस्कारों की दुहाई से वह हर पल घुटन से मरती रहेगी और समाज उसे देवी-थान बनाकर पूजता रहेगा। शहर में कोई किसी की निजी जिंदगी में दखल नहीं देता।
मलके चचा बनवारी का हाथ पकड़कर बोले, तू सचमुच जी रहा है। हम जैसे दकियानूसी सोच के लोग अपनी सिकुड़ी जिंदगी ढ़ो रहे हैं। बनवारी ने हंसते हुए कहा, कोई महिला अपनी इच्छाओं को दफन कर मर जाये तो संस्कारी और कोई अपनी दिल की सुन कर जी ले तो वह कुलक्षणी। यह कहां का न्याय?
मलके चचा और बनवारी शाम को चलने को हुए तो मलके की पत्नी नेे बनवारी की पत्नी से कहा मुझे लग रहा है कि दोनों दारू पीने जायेगें। चलो रोको उन्हें। बनवारी की औरत ने हंसते हुए कहा, रूको चाची। आदमी दिनभर धूप में काम करने के बाद थोड़ी पी ले तो क्या जायेगा? ज्यादा टोका-टाकी रिश्ते बिगाड़ देती है चाची।

तीनों मलके की पत्नी, बनवारी की पत्नी और उसकी बहू रूम पर पहुंचीं। बनवारी की पत्नी ने सचमुच तीन गिलास में थोड़ी-थोड़ी दारू डाली और जबरदस्ती चाची को भी दारू पिला दी। फिर तीनों ने जीभर अपनी-अपनी भड़ास निकाली।
मालिक, मालकिन, बनवारी, उसकी बहू, पत्नी को जिंदगी के इस तरह मजे लेत देख चचा खुद को असहाय और अकेला महसूस करने लगे। मलके चचा खामोश रहने लगे, मनोरोगी हो गए पत्थर की मूरत जैसी। बनवारी ने इलाज कराया, पर स्वास्थ्य दिन-प्रतिदिन खराब होता गया। मलके चचा और चाची गांव लौट आए। गांव में झोलाछाप डॉक्टरों ने इलाज किया, जादू-टोना किया, पर मलके चचा बिस्तर से न उठ सके।

एक दिन बनवारी शहर से एक लड़के को लेकर आया और बोला कि यह मनोचिकित्सक हैं डा. उसमान। डा. उसमान ने कुछ प्रश्न किए। मलके हा और ना में जवाब देते गये। उसमान नतीजे पर पहुंचे कि करना क्या है? उसमान ने चाची से कहा सुहाग चाहिए या संस्कार? चाची ने कहा, सुहाग चाहिए, जो बोलोगे करने को तैयार हूं बेटा। डा. उसमान ने कहा, यह मनोरोग है, इस बीमारी की कोई दवा नहीं।

उस रात जब आंख खुली तो मलके चचा ने जैसे शहर की मालकिन को अपने खाट पर अपने करीब बैठा देखा। वह चौंक गये। तभी वह मलके चचा पर किसी कॉलगर्ल की तरह टूट पड़ीं। मालकिन की छुअन के अहसास से मलके चचा की वर्षों पुरानी गांठे खुल चुकी थी। वर्षों की पुरानी मांग पूरी हुई। सुकून भरी नींद आयी।

सुबह हुई। मनोवैज्ञानिक डा. उसमान ने कहा, चाचा, आपकी डॉक्टर तो आपकी बीवी हैं। रात मालकिन नहीं, चाची थीं। चाची हमारी उस मालकिन से ज्यादा प्यारी हैं। चाची मुस्कुरायीं और मलके के कान में फुसफसाया, आपके साथ शहर मैं भी तो गयी थी, डार्लिंग।
उस वक्त पड़ोस के कुछ बच्चे जुट आए, बोले चचा, आप तो ठीक हो गए। चाय पियोगे चचा, चाय गरम टन्न गिलास। मलके चचा ने मुंह भर गाली सुना डाली। चचा के घर के सामने पड़ोसी पहुंच गए और कहा अरे! वाह, चचा ठीक हो गये। डा. उसमान ने बच्चों को प्यार से धमकाते हुए कहा, तुम लोग सुधर जाओ, जाओ चचा के लिये चाय ले आओ।

महीनों से सन्नाटा पड़े गांव की उस पट्टी में रौनक लौट आयी थी।

(संपादन : कृष्ण किसलय)

कहानीकार

आकांक्षा सक्सेना (ब्लॉगर),

औरैया, जिला कानपुर (उत्तर प्रदेश)

 

 

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