आश्रयगृह की बच्चियों से बलात्कार की पुष्टि, पांच साल में छह लड़कियां गायब !

बालिका आश्रय गृह के सनीसनीखेज मामले में अखबार के मालिक-संपादक और बाल संरक्षण अधिकारी के साथ आठ महिलाओं को भी जेल भेजा जा चुका है। पीडि़त बच्चियों ने अपने एक साथी की हत्या कर शव को परिसर में दफनाने का आरोप लगाया है। सवाल है कि निगरानी की पूरी व्यवस्था के बावजूद मासूमों के साथ लंबे समय से दरिंदगी का खेल खेलने वाले रसूखदार कौन-कौन हैं? इस घटना में संलिप्त लोगों की सच्चाई सामने आनी चाहिए, ताकि सफेदपोश ऐसे कारनामे कर समाज में छुट्टा नहीं रह सकेें और ऐसे दुष्कांड की पुनरावृति न हो सके। चौतरफा राजनीतिक दबाव के बाद मुख्‍यमंत्री ने मुख्‍य सचिव, प्रधान मुख्‍य सचिव और डीजीपी को मामले की जांच सीबीआई को सौंपने का निर्देश दिया है। दूसरी ओर, इस मामले में पटना हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है, जिस पर कोर्ट तुरंत सुनवाई के लिए तैयार हो गया। एफआईआर लिखे जाने के दो महीने बाद डॉक्टरों की एक टीम ने वहां पहुंचकर एक कमरे की जांच की है। टीम ने वहां इस्तेमाल कि गईं 63 दवाइयों और ड्रग्स के रैपर्स की एक लिस्ट बनाई है। उन सभी का परीक्षण किया जाएगा। एक्सपर्ट्स ने शेल्टर होम से बच्चियों के कपड़े और एक कंप्यूटर भी बरामद किए हैं।

पटना/मुजफ्फरपुर (विशेष प्रतिनिधि)। बिहार के मुजफ्फरपुर के बालिका आश्रय गृह में रहने वाली 44 लड़कियों में से 29 के साथ लंबे समय से नशीला पदार्थ खिलाकर दुष्कर्म के सनीसनीखेज मामले के सामने आने से प्रदेश-देश में आक्रोश है। पीडि़त बच्चियों ने अपने एक साथी की हत्या कर शव को परिसर में दफना दिए जाने का आरोप लगाया है। पीडि़ताओं के बयान के आधार पर बालिका आश्रय गृह में खुदाई की गई। अभी तक की खुदाई में शव के दफनाने का साक्ष्य नहीं मिल सका है। इस बालिका आश्रय गृह को सरकारी सहायता प्राप्त है।

बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया कि एनजीओ के संचालक ने सत्ताधारी दल जदयू के पक्ष मे चुनाव प्रचार किया था। सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने लोकसभा में इस मामले को उठाया। चौतरफा राजनीतिक दबाव के बाद मुख्‍यमंत्री ने मुख्‍य सचिव, प्रधान मुख्‍य सचिव और डीजीपी को इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपने का निर्देश दिया है। दूसरी ओर,  इस मामले में पटना हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है, जिस पर कोर्ट तुरंत सुनवाई के लिए तैयार हो गया।

सोशल आडिट में हुआ इस सनसनीखेज मामले का खुलासा
टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के सोशल ऑडिट के दौरान इस मामले का खुलासा हुआ था। 100 पन्नों की सोशल ऑडिट की रिपोर्ट बिहार के समाज कल्याण विभाग के निदेशक को 15 मार्च को सौंपी गई। रिपोर्ट में प्रदेश भर के बालिका गृहों के हालात और वहाँ रह रहीं बच्चियों के साथ होने वाले व्यवहारों पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट दो महीने तक समाज कल्याण विभाग में धूल खाती रही। 26 मई को ज़िलों की बाल संरक्षण इकाई को रिपोर्ट भेजी गई। इसी दिन मुज़फ़्फ़रपुर ज़िला बाल संरक्षण इकाई के सहायक निदेशक दिवेश शर्मा ने एक पत्र समाज कल्याण विभाग के निदेशक को भेजा। 28 मई को जवाब आया कि बालिका गृह में रह रही बच्चियों को कहीं और शिफ़्ट किया जाए और एफ़आईआर दर्ज की जाए। 30 मई को सभी 46 बच्चियों को मोकामा, पटना और मधुबनी शिफ़्ट किया गया। 31 मई को एफ़आईआर दर्ज की गई।11 लोग अभियुक्त बनाए गए। एक अखबार के मालिक-संपादक और बाल संरक्षण अधिकारी के साथ आठ महिलाओं को भी जेल भेजा गया।

प्रदेश सरकार की प्रॉपर्टी होने से टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है। रिपोर्ट में लिखा है- ”इस बालिका गृह में रह रही बच्चियों की स्थिति बेहद चिंताजनक है। कई बच्चियों ने अपने साथ होने वाली हिंसा के बारे में बताया है। उन्हें यौन प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है। जिन हालात में बच्चियाँ रह रही हैं, वो काफ़ी दुखद है। थोड़ी भी खुली जगह नहीं है और यह किसी क़ैदखाने की तरह है।”

ज़िला बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष गिरफ़्तार नहीं

31 मई को एफ़आईआर दर्ज होने के बाद 10 लोगों को गिरफ़्तार किया गया। पुलिस की जांच हुई तो पता चला था कि बालगृह से छह लड़कियां वर्ष 2013 से 2018 के बीच गायब हुईं। ज़िला बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष को पुलिस गिरफ़्तार नहीं कर पाई है, जिन पर भी बच्चियों के यौन शोषण का आरोप है। मुजफ़्फ़रपुर का यह बालिका गृह शहर के साहु पोखर इलाक़े में है। शहर का चर्चित रेड लाइट एरिया चतुर्भुज स्थान पास में है। यहाँ रह रहीं लड़कियाँ या तो बदनाम बस्तियों से लाई गई थीं या किसी आपदा में अपने परिवार को खोने के बाद बेसहारा होकर यहाँ पहुंची थीं।

सांसद पप्पू यादव ने लोकसभा में कहा, सीबीआई करे मामले की जांच
जन अधिकार पार्टी (बिहार) के संरक्षक और सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने लोकसभा में इस मामले को उठाते हुए सीबीआई जांच की मांग की, ताकि पीडि़तों को न्याय मिल सके और दोषियों को सजा। दोषियों की राजनीतिक-प्रशासनिक पहुंच के कारण राज्य सरकार की मशीनरी इसकी सही तरीके से जांच नहीं कर सकती है और जांच प्रभावित भी हो सकती है। पप्पू यादव ने इस बाबत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भी लिखा है। सांसद ने पत्र में लिखा है कि टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस ने समाज कल्याण विभाग द्वारा संचालित कई संस्थाओं मे सोशल ऑडिट के दौरान गड़बडिय़ों को उजागर किया था। सांसद ने पत्र में कहा है कि लड़कियों को नशीली दवा देकर नेताओं-अधिकारियों के पास भेजा जाता था। मामले की प्रमुख गवाह व पीडि़ता की हत्या कर दी गई है और एक संबंधित अधिकारी की भी हत्या कर दी गई है। लड़कियों की मेडिकल जांच से स्पष्ट हो चुका है कि दुष्कर्म और यौन शोषण हुआ था।

निगरानी की पूरी व्यवस्था के बावजूद मामला सामने नहीं आया

बालिका गृह की देखरेख के लिए पूरी व्यवस्था है, जिसमें समाज कल्याण विभाग के पांच अधिकारी, वकील, समाजिक कार्य से जुड़े लोग हैं। बालिका गृह में हर महीने जांच के लिए जाने वाले एडिशनल ज़िला जज के दौरे के बाद भी मामला सामने नहीं आ सका। बालिका गृह के रजिस्टर में दर्ज है कि न्याययिक अधिकारी आते थे। समाज कल्याण विभाग के अधिकारी के लिए भी सप्ताह में एक दिन आना अनिनार्य है। इस तरह की निगरानी के बाद भी 29 बच्चियों के साथ बलात्कार हुआ। हाईकोर्ट के अधीन राज्य विधिक आयोग होता है, जिसके मुखिया हाईकोर्ट के रिटायर जज होते हैं । बालिका गृहों की देखरेख की जिम्मेवारी इनकी भी है। मामला सामने आने के बाद राज्य विधिक आयोग कि टीम बालिका गृह पहुंची।

कोर्ट ने पुलिस को नहीं दी रिमांड की अनुमति

बालिका गृह के संचालक की पत्रकारों के नेटवर्क में पैठ की वजह से अख़बारों-चैनलों ने इस ख़बर को प्रमुखता नहीं दी। ज़िला संस्करण में ख़बर छपती रही, मगर राजधानी पटना तक नहीं पहुंची और दिल्ली को तो पता ही नहीं चला। बालिका गृह का संचालक गिरफ्तार हुआ, पर तीसरे दिन बीमारी के नाम पर अस्पताल पहुंच गया और अस्पताल से फोन करने लगा तो पुलिस को वापस जेल भेजना पड़ा। बालिका गृह  संचालक के परिवार वालों का कहना है कि समाज कल्याण विभाग की एफआईआर में उसका नाम नहीं है। पुलिस के बालिका गृह के संचालक को रिमांड पर लेने के आवेदन पर कोर्ट ने रिमांड की अनुमति नहीं दी। पुलिस ने दोबारा रिमांड का आवेदन किया तो कोर्ट ने कहा कि जेल में ही पूछताछ कीजिए।

प्रेगनेंट बच्चियों  का कराया गया अबॉर्शन

रेप के कारण चार बच्चियां प्रेगनेंट हो गई थीं, जिसके बाद उनका अबॉर्शन कराया गया। अबॉर्शन कराने वालों में बालिका गृह की महिला कर्मचारी शामिल थीं। जेल में बंद बाल संरक्षण अधिकारी की पत्‍नी  ने आरोप लगाया है कि एक मंत्री के पति अक्‍सर बालिका गृह में आते थे। मेरे पति ने सीसीटीवी कैमरा लगाने और चिल्‍ड्रेन होम को शिफ्ट करने के लिए पत्र लिखा था। उनके पत्र पर दो साल तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।

11 अभियुक्तों में 10 किए गए हैं गिरफ्तार
मुजफ्फरपुर की एसएसपी हरप्रीत कौर के अनुसार, फिलहाल खुदाई में कुछ सामने नहीं आया है। गिरफ्तार 10 अभियुक्तों के विरुद्ध चार्जशीट दायर की गई ई। हालांकि अभी तक किसी भी लड़की ने पुलिस के यह नहीं बताया ई कि उन्हें कभी बालिका आश्रय गृह से बाहर ले जाया गया। मगर मेडिकल रिपोर्ट यह बताती हैं कि आश्रयगृह की आधे से ज्यादा लड़कियों के साथ कभी-न-कभी यौन संबंध बनाए गए। मेडिकल जांच में रेप और मारपीट के साक्ष्य सामने आए हैं। जांच में जानकारी हुई है कि नशे का इंजेक्शन देकर आरोपी बच्चियों के साथ रेप किया जाता था। कई के शरीर पर जले के निशान भी हैं।

42 लड़कियों की मेडिकल जांच में 29 के साथ यौन संबंध
बिहार पुलिस के पुलिस महानिदेशक केएस द्विवेदी के अनुसार राज्य के मुजफ्फरपुर के बालिका आश्रय गृह की 44 लड़कियों में 42 की मेडिकल जांच कराई गई। मेडिकल रिपोर्ट में 29 लडि़कयों के साथ यौन संपर्क का साक्ष्य सामने आया है। दो लड़कियों के बीमार होने के कारण उनकी जांच नहीं हो सकी। 15 दिसंबर 2013 से चार लड़कियों के इस बालिका आश्रय गृह से गायब होने की शिकायत की गई थीं। लड़कियों के गायब होने के मामले पुलिस में दर्ज नहीं किए गए हंै। बालिका आश्रय गृह के रिकॉर्ड में प्रबंधन ने इन लड़कियों को भगोड़ा बता रखा है। जांच में यह बात सामने आई है कि गायब एक लड़की की शादी मुजफ्फरपुर में हुई है।

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आखिर कौन हैं बच्चियों की जिंदगी के खिलवाड़ करनेवाले सत्ता के गलियारों के रसूखदार?
इस प्रकरण के बाबत वरिष्ठ पत्रकार संजय वर्मा (पटना) ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा है कि मुज़फरपुर शहर से लंबे समय से प्रकाशित हो रहे एक दैनिक अखबार के मालिक-संपादक की स्वयंसेवाी संस्था ने बेशुमार कमाई की और उनकी पहुंच पटना से दिल्ली तक थी। उनके गुजरने के बाद उनके पुत्र ने विरासत संभाली। पटना के प्रमुख अखबारों के मुकाबले बिक्री में नहीं दिखने के बावजूद मुज़फरपुर के इस अखबार की बिक्री कागजों में 62 हजार प्रतियां हैं और इसे सरकारी मेहररबानी से प्रमुख अखबारों जैसा करोड़ों रुपये के विज्ञापन मिलते रहे हैं। सियासी धाक देखिए कि अखबार के मालिक-संपादक बिहार सरकार के सूचना जनसंपर्क विभाग में पत्रकारों को मान्यता देनेवाली कमिटी के सदस्य हैं। इसी धाक के आधार पर सरकार ने मुजफ्फरपुर में संचालित बाल सुधारगृह सह अल्पावास गृह को चुना, जहां लबे समय से मासूमों के साथ दरिंदगी का खेल हो रहा था। अखबार के मालिक-संपादक के साथ संस्था की आठ महिलाओं को भी जेल भेजा जा चुका है। सवाल है कि मासूमों के साथ दरिंदगी का खेल खेलने वाले रसूखदार और कौन-कौन हैं? अखबार के मालिक-संपादक तो मोहरा भर है। इस घटना में संलिप्त लोगों की सच्चाई सामने आनी चाहिए, ताकि सफेदपोश ऐसे कारनामे कर समाज में छुट्टा नहीं रह सकेें और ऐसे दुष्कांड की पुनरावृति बिहार में न हो सके।

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बड़का लबार है, बाकी उसके पास अखबार है, जो तोप से भी ज्यादा धारदार है…

पटना के वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी ने बालिका आश्रयगृह प्रकरण के प्रसं में अपनी फेसबुक वाल पर अपने भोजपुरी हास्य-व्यंग्य स्तंभ (भेलारी का भाला-आरी) में लिखा है- बालिका गृह यौन शोषण कांड के मेन कींगपीन का जड़ पाताल लोक तथा फुलंगी दिल्ली के लूटियन जोन तक है। आज तक पुलिस उसको रिमांड पर लेकर पूछताछ नहीं कर सकी। नेता, अफसर, पुलिस, पत्रकार सबको उ अपना टी-शर्ट के पाकिट में रखता है। बड़का लबार है, बाकी उसके पास अखबार है, जो तोप से भी ज्यादा धारदार है। दीस-दैट के आरोप में पूर्व में कई बार सीबीआई का छापा भी उसके यहां पड़ चुका है। ———————————————————————————————————————

इनपुट : सोनमाटी समाचार नेटवर्क

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