केरल जलप्रलय : ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का ही कहर

(प्रतिबिम्ब/कृष्ण किसलय)
केरल में करीब एक सदी बाद आई भीषण बाढ़ से पांच सौ से अधिक लोगों की जान गई, लाखों बेघर व विस्थापित होने को मजबूर हुए और कई हजार करोड़ रुपये का सरकारी व गैर सरकारी संपत्ति की क्षति हुई। नेचर कम्युनिकेशन में प्रकाशित एक अध्ययन में यह बताया गया है कि मानसून की बारिश से आई बाढ़ के कारण पिछले साल दुनिया भर में 69 हजार लोगों की मौत हुई और एक करोड़ 70 लाख लोग विस्थापित हुए। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर ग्लोबल वार्मिंग का बढऩा जारी रहा तो अभी और भयंकर नतीजे देखने को मिल सकते हैं। वैज्ञानिक शोध यह बता रहे हैं कि 1950 से 2017 तक 67 सालों में बाढ़ आने की एक वजह बहुत ज्यादा बारिश का होना भी है। ज्यादा बारिश की वजह से बाढ़ आने की घटनाओं में तीन गुनी वृद्धि हुई है।

इस बार की बाढ़ मौसम में परिवर्तन और उसके असर के अनुमान के अनुरूप
पोस्टडैम इंस्टिट्यूट फार क्लाइमेट इंपैक्ट रिसर्च (जर्मनी) के शोध अध्ययन का निष्कर्ष है कि भारत के केरल में आई बाढ़ मौसम में परिवर्तन और उससे होने वाले असर के अनुमान के अनुरूप है। अरब सागर के गर्म होने से उसके आस-पास के लैंडमास (भू-स्थल) इलाके में मानसूनी हवा में बदलाव होता है। रसियन एकेडमी ऑफ साइंस ने अपने अध्ययन में यह पाया है कि बीते एक दशक में क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) की वजह से लैंडमास (भू-स्थल) ज्यादा गर्म हुआ है। इसी का असर है कि केरल में मानसून की बारिश अधिक हुई। हालांकि इंडियन इंस्टिट्यूट आफ ट्रापिकल मेट्रोलाजी के वैज्ञानिकों का मानना है कि केरल की बाढ़ जैसी एक-दो मौसमी घटना को अंतिम तौर पर मौसम परिवर्तन से जुडा हुआ नहींमाना जा सकता।

बादलों ने सामान्य से ढाई गुना अधिक पानी केरल की धरती पर गिराया
मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस बार बादलों ने सामान्य से ढाई गुना अधिक पानी केरल की धरती पर गिराया। भीषण बारिश के बाद बाढ़ ने केरल को इतना डुबा दिया कि 13 लाख लोगों को अपने घरों से विस्थापित होना पड़ा और राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी। केरल में इस बार के मानसून में इतनी बारिश हुई कि इस राज्य के सभी 35 जलाशय 10 अगस्त तक ही लबालब भर गए। प्रशासन को 26 सालों में पहली बार इडुक्की डैम के दरवाजे खोल पानी को बाहर निकालने की जरूरत पड़ गई।

भीषण गर्मी की मार से गुजर रहा यूरोप भी, कारण है अफ्रीका से गर्म सूखी हवा का आना
जहां भारत को बाढ़ की भीषण आपदा का सामना करना पड़ा, वहीं यूरोप इसी अवधि में भीषण गर्मी की मार से गुजरा। इस बार गर्मी से स्पेन, पुर्तगाल और दक्षिणी फ्रांस सबसे ज्यादा प्रभावित हुए, जहां तापमान का रिकार्ड 48 डिग्री सेल्सियस से ऊपर दर्ज किया गया। इस बार तो एथेंस का चार दशक पुराना रिकार्ड टूट गया, जब वहां जुलाई 1977 में तापमान करीब 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचा था। जर्मनी में भी 40 डिग्री सेल्सियस और ब्रिटेन में भी 38 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज किया गया। यूरोप में बढ़ती हुई गर्मी का कारण अफ्रीका से गर्म सूखी हवा का आना बताया जा रहा है। हालांकि भीषण गर्मी का असर अब सुदूर पूरब में स्थित जापान और कोरिया में भी है, जहां तक अफ्रीकी हवा का असर नहीं पहुंचता है। इस बार जापान में मौसम का पारा 41 डिग्री सेल्सियस पर पहुंच गया।

पालतू कुत्तों के लिए पुलिस ने की जूते खरीदने की अपील, बदली टेस्ट क्रिकेट की परंपरा
उत्तर में साइबेरिया से लेकर दक्षिण में ग्रीस तक के गर्म होने की सूचना है। राइन और एल्ब नदियों में पानी गर्म होने से मछलियां मरने लगीं। जर्मनी में किसानों को बढ़ती गर्मी के कारण फसलों की नुकसान होने पर सरकार से मदद की अपील करनी पड़ी है। असंतुलित वर्षा से फ्रांस में भी फसलों की क्षति हुई। यूरोप में कृषि उपज इस बार पिछले छह वर्षों में सबसे कम होने की आशंका है। इंग्लैंड के दौरे पर गई भारतीय क्रिकेट टीम को भारत जैसी गर्मी का अनुभव हुआ। जबकि भारतीय खिलाड़ी वहां गुनगुनी ठंड में खेल का लुत्फ लेते रहे हैं। गर्मी के कारण टेस्ट क्रिकेट की परंपरा बदल गई कि खिलाड़ी क्रिकेट मैदान में बिना जैकेट टास करने उतरे। स्विट्जरलैंड की पुलिस को अपील करनी पड़ी कि पालतू कुत्तों के लिए गर्मी से उनके तपते तलवों को बचाने खातिर लोग जूते खरीद लें। गर्मी पडऩे से यूरोप के पर्यटन उद्योग पर असर पडऩे जा रहा है। गर्म देशों के लोग गर्मी से राहत के लिए भी यूरोप की यात्रा करते हैं।

इतना तय है कि ग्लोबल वार्मिंग मौसम के असंतुलित होने जाने की वजह से भी बढ़ रहा है। इस परिवर्तन को ही बड़ी चेतावनी मानकर दुनिया को ग्लोबल वार्मिंग की तेज होती धार को भोथरा बनाने के सभी और हर संभव उपाय अपनाने में जुट जाना चाहिए। मौसम वैज्ञानिक बता रहे हैं कि तापमान में निरंतर बढ़ोतरी होगी। विश्व में औद्योगीकरण की शुरुआत से पहले पृथ्वी का जो औसत तापमान था, उसकी तुलना में धरती के तापमान में एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है और इस वृद्धि से हीऐसा भयानक प्राकृकि बदलाव देखा जा रहा है। जबकि निकट भविष्य में वैश्विक तापमान में और वृद्धि होने का अंदेशा वैज्ञानिकों ने व्यक्त किया है।

अमेरिका और चीन के बाद भारत करता है सबसे अधिक कार्बन-डाई-आक्साइड का उत्सर्जन
पर्यावरण को गर्म बनाने में सबसे अधिक भूमिका कार्बन-डाई-आक्साइड गैस की ही है, जो मोटर वाहनों, कारखानों और अन्य मानवीय गतिविधियों से हर साल करीब 4.5 अरब टन पैदा होता है। इस गैस को पैदा करने वाले जीवाश्म ईंधन (पेट्रोल, डीजल आदि) की खपत भारत में हर रोज 14 लाख बैरल है। यूनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कन्वेंशन आन क्लाइमेट चेंज की रिपोर्ट (ग्रीन हाउस एमिशन फ्राम इंडिया) में बताया गया है कि कार्बन-डाई-आक्साइड के उत्सर्जन के मामले में दुनिया में भारत का स्थान अमेरिका और चीन के बाद ही है।

वायुमंडल में हर साल जितनी मात्रा में ग्रीन हाउस गैसें मिलती हैं, उसमें चीन की हिस्सेदारी 29 फीसदी, अमेरिका की 15 फीसदी, यूरोपीय संघ के देशों की 11 फीसदी, भारत की छह फीसदी, रूस की पांच फीसदी, जापान की चार फीसदी और अन्य सभी देशों की 30 फीसदी है। हालांकि विकसित देशों में भारत के मुकाबले कार्बन-डाई-आक्साइड का उत्सर्जन बहुत ज्यादा है। अमेरिका में भारत से 12 गुना अधिक और जापान से सात गुना ज्यादा कार्बन-डाई-आक्साइड उत्सर्जित होता है। सवा अरब से अधिक आबादी वाले भारत में कार्बन-डाई-आक्साइड का वार्षिक उत्सर्जन 1.93 अरब टन है। भारत में प्रति व्यक्ति सालान कार्बन-डाई-आक्साइड का उत्सर्जन 1.6 टन है, जिसके अगले दशकों में चार टन हो जाने का आकलन किया गया है।
भारत में हवा स्वास्थ्य के प्रतिकूल, अमेरिकी मंत्रालय का दिल्ली में घर से बाहर नहीं निकलने का निर्देश
कार्बन-डाई-आक्साइड की अधिकता के कारण भारत में हवा स्वास्थ्य की दृष्टि से बेहद प्रतिकूल हो चुकी है। दुनिया के सर्वाधिक 20 प्रदूषित शहरों में 13 भारत के ही हैं, जिनमें दिल्ली, पटना, लखनऊ के नाम शीर्ष पर दर्ज हैं। देश की राजधानी दिल्ली की हालत तो ऐसी है कि अमेरिकी दूतावास मेें रहने वाले कर्मचारियों के लिए पिछले साल अमेरिकी मंत्रालय की ओर से यह निर्देश जारी करना पड़ा था कि वे अपने बच्चों को घर से बाहर खुली हवा में खेलने नहींदें। पिछले साल ही भारत के उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने वायु प्रदूषण से संबंधित मामले में सुनवाई के दौरान टिप्पणी की थी कि दिल्ली के लुटियन जोन (सबसे सुविधा संपन्न इलाके) में रहने के बावजूद उनके पोते को सांस की बीमारी से बचने के लिए मास्क लगाना पड़ता है।
ग्लोबल वार्मिंग और वायु प्रदूषण को कम करने का एक कारगर उपाय है पौधरोपण
धरती को ग्रीन हाउस गैस गर्म बनाती हैं। कार्बन-डाई-आक्साइड भी एक ग्रीन हाउस गैस है, जिसे पेड़-पौधे सोखते हैं और बदले में आक्सीजन पैदा कर वायुमंडल में छोड़ते हैं। जाहिर है कि कार्बन उत्सर्जन का स्तर इसी तरह बना रहा तो निकट भविष्य में ही धरती पर इससे उत्पन्न खतरा विकराल रूप ले लेगा, जिसे किसी भी उपाय से संभाल पाना संभव नहीं हो सकेगा। ग्लोबल वार्मिंग और वायु प्रदूषण को कम करने का एक सबसे कारगर उपाय पौधरोपण है। इससे हरियाली में वृद्धि होती है और पर्यावरण संतुलन कायम होता है। इसके साथ ही इको-फ्रेेंडली (प्राकृतिक मित्र) सामूहिक जीवनशैली को तेजी से अपनाना होगा।

– कृष्ण किसलय, समूह संपादक

सोनमाटी मीडिया समूह (प्रिंट और डिजिटल संस्करण)

फोन : 9708778136

 

 

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महात्मा गांधी ने भी जुटाया था केरल बाढ़ के लिए धन

करीब एक सदी पहले 1924 में भी केरल में भयावह बाढ़ आई थी। तब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने केरल की मदद करने और लोगों को एकजुटता के लिए रुपये जुटाए थे। 1924 में आई बाढ़ में भारी संख्या में लोग बेघर हुए और मारे गए थे। बाढ़ का सबसे ज्यादा प्रभाव केरल के मालाबार में हुआ था। मालाबार का जलप्रलय अकल्पनीय था। 1924 के जुलाई में आई बाढ़ तीन हफ्तों तक रही, जिसने केरल के मुन्नार, त्रिचूर, कोझिकोड, अलुवा, मुवत्तूपुझा, कुाराकोम और तिरुवनंतपुरम को प्रभावित किया था। मूसलाधार बारिश से सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त हो गया था। सड़कें तो नदियों में तब्दील हो गई थीं। वह बाढ़ मलयालम कैलेंडर (कोल्ला वर्षम्) के अनुसार 1099 में आई थी। इसलिए उस बाढ़ को ग्रेट फ्लड ऑफ 99 कहा जाता है। उस समय केरल तीन हिस्सों त्रावणकोर, कोच्चि और मालाबार में बंटा था। महात्मा गांधी ने 30 जुलाई 1924 को कांग्रेस नेताओं को टेलीग्राम भेजकर लोगों की मदद करने को कहा था।
महात्मा गांधी ने अपने समाचारपत्रों (यंग इंडिया और नवजीवन) में बाढ़ की वीभिषका पर कई लेख प्रकाशित किए थे और लोगों से बाढ़ प्रभावितों की मदद की अपील की थी। उनकी अपील पर महिलाओं, बच्चों ने भी दान दिया था। कई महिलाओं ने सोने के जेवर तक बेच दिए। बच्चों ने अपनी नन्हीं बचत दान दी। कई लोगों ने एक समय का खाना छोड़ दिया था। कई ने अपने हिस्से का दूध बेच कर बाढ़ प्रभावितों की मदद की। नवजीवन (17 अगस्त 1924) के लेख में उन्होंने लिखा था, एक बहन ने बाढ़ प्रभावित लोगों की मदद के लिए अपने चार सोने के कंगन और गले की चेन दान दे दी है। दूसरी बहन ने अपना हार दे दिया है। एक ने अपनी बिछिया तक दान में दे दी। एक बच्ची ने अपने पांव में पहनने वाले तीन गहने दान में दे दिए। एक व्यक्ति ने अपना सोने का कफ्फलिंग दान में दे दिया। एक बच्ची ने मालाबार में प्रभावितों की मदद के लिए तीन पैसे चुराकर दान दिए थे।

-सोनमाटी कंटेन्ट टीम

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