विश्व पर्यावरण : मौसम के मद्देनजर एहतियात की दरकार

नई दिल्ली (विशेष संवाददाता)। गर्मी से तपते परेशान लोगों के लिए अच्छी खबर है कि इस बार मानसून पिछले साल से बेहतर होगा। खेती और अर्थव्यवस्था के लिए भी यह बेहतर है। अरब सागर की ओर से आने वाले दक्षिण-पश्चिमी मॉनसून ने औसतन एक जून से तीन दिन पहले ही 29 मई को भारत के केरल तट पर दस्तक दे दिया। देश में 2017 में 97 फीसदी बारिश दर्ज हुई थी, जो सामान्य थी। इस साल 2018 में जून-सितंबर के बीच 96 से 104 फीसदी बारिश होगी। मौसम विभाग के अनुसार, बंगाल की खाड़ी (हिन्द महासागर क्षेत्र) में बन रहा चक्रवात मुंबई और आसपास के इलाकों तक पहुंचेगा, जहां 8-10 जून को झमाझम बारिश होगी।

भारतीय मौसम विभाग के पूर्वानुमान के मुताबिक, मॉनसून जुलाई में पीक पर होगा और अगस्त में सामान्य से कुछ कम बारिश होगी। हालांकि विदेशी मौसम वैज्ञानिकों ने भी मॉनसून सीजन के बीच में बारिश कम होने की आशंका व्यक्त की है। देश के उत्तरी, पश्चिमी और मध्य क्षेत्रों में अच्छी बारिश होगी। दक्षिणी और उत्तर-पूर्वी भारत में अन्य हिस्सों की अपेक्षा कम बारिश की संभावना है। पिछली सदी में 1951 से साल 2000 तक देश में औसत 89 सेन्टीमीटर बारिश हुई थी। भारतीय मौसम विभाग ने पूरे देश में कहीं भी कम बारिश की आशंका नहीं जताई है। जबकि स्काईमेट और एक्युवेदर जैसी स्वतंत्र विदेशी एजेंसियों ने मॉनसून सीजन में असामान्य बारिश की चेतावनी दी है।

परिवर्तित हो रहा पर्यावरण, बेलगाम होता जा रहा मौसम
विश्व का पर्यावरण परिवर्तित हो रहा है। हर साल बढ़ती गर्मी, बेलगाम होता मौसम, पिछले अनुभवों के मुकाबले ज्यादा बाढ़-सुखाड़ इसी तेजी से बदले मौसम का परिणाम है। बदलते मौसम या बिगड़ते पर्यावरण (पारिस्थितिकी परिवर्तन) का एक कारण बढ़ती आबादी है, जिसका दबाव सीमित प्राकृतिक संसाधनों पर लगातार बढ़ता जा रहा है। जमीन, जंगल, पानी, खनिज, उपजाऊ मिट्टी जैसे प्राकृतिक संसाधनों को बढ़ाया नहीं जा सकता है, मगर आबादी तो दिन-ब-दिन सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती जा रही है। प्राकृतिक संसाधन अब बढ़ती आबादी की मांग की पूर्ति करने में सक्षम नहींहै और प्राकृतिक संसाधनों का पुनरुत्पादन करना संभव नहींहै, जमीन में वृद्धि तो असंभव है।
बिहार आबादी के मामले में देश भर में सबसे घना प्रदेश है, जहां सदियों से आबादी का दबाव प्राकृतिक संसाधनों पर सबसे अधिक रहा है। बिहार की जनसंख्या वृद्धि दर भी देश में सबसे ज्यादा है। इसका एक सीधा असर जलस्रोतों के अस्तित्व पर पड़ा है। पिछली सदियों में बिहार में करीब चार हजार वेटलैंड (नम आद्र्र भूमि वाले) क्षेत्र थे। आबादी के लिए आवास और अन्य जरूरतों को पूरा करने के कारण बिहार के करीब एक हजार वेटलैंड अस्तित्व खो चुकी हैं। 1500 वेटलैंड संकटग्रस्त है। जबकि नम भूमि जैव विविधता के लिए जरूरी है। जाहिर है कि बढ़ती आबादी के दबाव के कारण भी बिहार में पर्यावरण पर असर पड़ा है। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक बिहार में प्रति वर्ग किलोमीटर में 1102 व्यक्ति रहते हैं। बिहार में जनसंख्या वृद्धि दर भी अधि (25 फीसदी) है। सामाजिक जागरूकता और सरकार के प्रयासों के बावजूद नई सदी में आबादी के घनत्व का विस्तार थम नहीं सका है।

पूरी दुनिया में चल रही पर्यावरण संरक्षण की मुहिम
भारत समेत पूरी दुनिया में पर्यावरण संरक्षण को लेकर कई तरह की मुहिम चल रही हैं। पर्यावरण के अनुकूल ऊर्जा के स्रोत अपनाने पर जोर है। घटता वनक्षेत्र चिंता का सबब है, जिसके विनाशकारी नतीजे का सामना समाज कर रहा है। धरती पर हर जगह प्रदूषण चुनौती बन गया है। प्रदूषण से इंसानों के साथ जीव-जंतुओं की भी सेहत बिगाड़ रही है। ज्यादा से ज्यादा आधुनिक सुविधाओं की चाह ने प्रदूषण नियंत्रण से बाहर हो चुका है। प्रदूषण सीधे तौर पर इंसानों से क्रियाकलापों से ही पैदा हुई स्थिति है। पर्यावरण प्रदूषण का बड़ा कारण कार्बन-डाइ-आक्साइड है, जो मोटरगाडिय़ों से निकलने वाले धुएं से ज्यादा बढ़ता जा रहा है। देश-दुनिया में बढ़ती आबादी के कारण मिट्टी प्रदूषण बढ़ा है। मिट्टी की उर्वरता घटने का सीधा नुकसान खेती को है, जिससे फसल पैदावार की मात्रा घट रही है। बिहार में लाखों हेक्टेयर जमीन बंजर बन चुकी है। औद्योगिकीकरण, अनियंत्रित खनन और कीटनाशकों-रसायनों के इस्तेमाल के कारण मिट्टी प्रदूषण बढ़ा है।

अब प्लास्टिक ने भी पर्यावरण प्रदूषण को बढ़ाने का काम कर दिया है। जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण के बाद अब प्लास्टिक प्रदूषण देश-दुनिया के सामने है। प्लास्टिक स्वास्थ्य, जमीन और वायुमंडल को नुकसान पहुंचा रहा है। प्लास्टिक कचरा नालों से होकर नदियों में पहुंचकर नदियों की सेहत खराब कर रहा है। प्लास्टिक को प्राकृतिक तौर पर नष्ट होने में 500 से अधिक साल लगता है। प्लास्टिक की खोज 1933 में हुई थी और यह आज पूरी दुनिया में हर समाज के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है। हर साल 300 मीलियन मीट्रिक टन प्लास्टिक का उत्पादन होता है। इसके जलाने से डायोक्सिन गैस निकलती है, जिससे सांस की बीमारी और कैंसर में इजाफा होता है। पूरे भारत में एक दिन में करीब 25,940 टन प्लास्टिक वेस्ट जेनरेट होता है। इसीलिए विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) की पूर्व संध्या पर प्लास्टिक के विरोध में देश भर में अनेक जगहों पर अभियान की शुरुआत की गई और इस बार 5 जून  ‘बीट प्लास्टिक पलूशन’ थीम पर मनाने का फैसला किया गया। सरकार, उद्योग, समुदाय और आम जनता विकल्प तलाश कर प्लास्टिक उत्पादन में कमी लाए। भारत इस बार विश्व पर्यावरण दिवस का ग्लोबल होस्ट भी है।

(इनपुट व तस्वीर : उपेन्द्र कश्यप, मिथिलेश दीपक, अवधेशकुमार सिंह, निशांत राज)

 

अंतरराष्ट्रीय सप्तऋषि सम्मान समारोह-2018 दिल्ली में

कानपुर (उत्तर प्रदेश)-विशेष संवाददाता। अंतरराष्ट्रीय कायस्थ वाहिनी की ओर से पंकज श्रीवास्तव के नेतृत्व में सप्तऋषि अंतरराष्ट्रीय सम्मान समारोह का आयोजन 17 जून 2018 को दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू यूथ सेंटर (मेट्रो स्टेशन के निकट) में होगा। इस कार्यक्रम में विचार गोष्ठी का भी आयोजन किया गया है। यह जानकारी मुम्बई में हुई बैठक के बाद राष्ट्रीय सचिव एवं फिल्म डायरेेक्टर-प्रोड्यूसर अमृत सिन्हा ने दी। उन्होंने बताया कि सप्तऋषि सम्मान समारोह में साहित्य, पत्रकारिता, चिकित्सा, धर्म-दर्शन, समाजसेवा के क्षेत्र में अग्रणी योगदान करने वाले कायस्थ समुदाय के लोगों को सम्मानित किया जाता है, जिनका चयन कायस्थ वाहिनी की अंतरराष्ट्रीय इकाई की 11 सदस्यीय कोर कमेटी करती है।
उन्होंने बताया कि पंकज श्रीवास्तव कायस्थ समुदाय को सर्वसमाज हितैैषी संकल्प के साथ एकजुट करने का कार्य भारत सहित अनेकों देेशों में कर रहे हैं, जिसके लिए वह विदेश यात्राएं भी कर रहे हैं। उनकी यात्रा में समाज में अभूतपूर्व योगदान देने वाले कायस्थ समुदाय के वैसे अग्रणी व्यक्तियों की खोज की जा रही है, जो अपनी मेहनत के दम से ऊपर उठे हैं और समाज में खास मुकाम हासिल किया है। ऐसे व्यक्तियों को अंतरराष्ट्रीय कायस्थ वाहिनी की ओर से कायस्थरत्न, कायस्थ कुलभूषण और कायस्थ शिरोमणि सम्मान से अलंकृत किया जाता है। इस बार के कार्यक्रम में गत वर्षों की तरह भारत के शहरी-ग्रामीण इलाकों के साथ सिंगापुर, अमेरिका, मलेशिया, नाइजीरिया, नेपाल, दुबई आदि 49 देशों के कायस्थ प्रतिनिधियों के शामिल होने की सम्भावना है।

(वेब रिपोर्ट व तस्वीर : आकांक्षा सक्सेना)

 

मुगलसराय का नाम अब दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन

मुगलसराय (उत्तर प्रदेश)-सोनमाटी संवाददाता। अब उत्तर प्रदेश का मुगलसराय जंक्शन पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन के नाम से जाना जाएगा। उत्तर प्रदेश सरकार ने इस आशय की अधिसूचना जारी कर दी है। रेल मंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अंत्योदय का विचार दिया था।
मुगलसराय रेलवे का मंडल मुख्यालय भी है, जिसका विस्तार पूरब दिशा में बिहार के प्रमुख रेल स्टेशनों सासाराम, डेहरी-आन-सोन होते हुए गया तक है। इस जंक्शन (मुगलसराय) का नाम बदलने की कवायद पिछले साल शुरू हुई थी। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की कैबिनेट ने मुगलसराय स्टेशन का नाम बदलकर दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर रखने का फैसला किया था। इस फैसले का कड़ा विरोध करते हुए कुछ लोगों ने इस स्टेशन का नाम पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के नाम पर रखने की मांग की थी। 1968 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक दीनदयाल उपाध्याय का शव मुगलसराय स्टेशन पर संदिग्ध हालत में पाया गया था। जबकि इस शहर में भूतपूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री का जन्म हुआ था। कई संगठन वर्षों से मुगलसराय में शास्त्री स्मारक की मांग करते रहे हैं। जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और संघ से जुड़े अन्य संगठन 1970 से मुगलसराय को दीनदयाल उपाध्याय नगर के रूप में देखना चाहते थे।

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