सुनो मैं समय हूं : विषय के बीजारोपण से पुस्तक प्रकाशन तक 15 सालों का सफर

नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया (दिल्ली) जैसे अन्तरराष्ट्रीय प्रसार वाले भारत के सबसे बड़े बहुभाषी (30 भाषाओं से अधिक) प्रकाशन संस्थान से पुस्तक प्रकाशित होना किसी लेखक के लिए उसके लेखकीय जीवन की एक उपलब्धि है। मेरा पुस्तक-संयोजन (सुनो मैं समय हूं) अपने विषय वस्तु विशेष पर अध्ययन, श्रम और खोजपूर्ण पत्रकारिता का प्रतिफल है। यह पुस्तक 10वीं-12वीं कक्षा के बड़े बच्चों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है, मगर बड़ों के लिए भी है। कम-से-कम उनके लिए तो जरूर जो विज्ञान के विद्यार्थी नहीं रहे हैं। यह रामायण, गीता, बाइबिल, कुरान जैसी आदर-आस्था का महान ग्रन्थ तो नहीं है, मगर जिंदगी और कायनात को साइंस के नजरिया से जानने-समझने वाली घर-घर के लिए किताब है। फिलहाल मैं मानता हूं कि अपने विषय-वस्तु पर हिन्दी मेंं दुनिया का यह पहला संयोजन है। इस पुस्तक को पढऩे के लिए न्यूनतम लगातार पांच घंटे का या फिर एक दिन का समय चाहिए। बतौर विज्ञान लेखक मैंने अपनी उपस्थिति पहली बार कोलकाता से प्रकाशित राष्ट्रीय साप्ताहिक रविवार (आनंद बाजार समूह) में 1978 में दर्ज की थी। 36 साल पहले अक्तूबर 1983 में आकाशवाणी के पटना केेंद्र से भोजपुरी भाषा में मेरी विज्ञान वार्ता (कथा सूरज के) प्रसारित हुई थी और कोलकाता से प्रकाशित भोजपुरी की मासिक पत्रिका में प्रकाशित भी हुई थी, जो संभवत: भोजपुरी में प्रथम विज्ञान लेखन है।
सभ्यता के आरंभ से ही कौतूहल और प्रश्नाकुलता
विश्व की सभी सभ्यताओं में उनके आरंभ से ही आदमी के मन में सृष्टि और जीवन को लेकर कौतूहल रहा है, प्रश्नाकुलता रही है। धरती, नदी, पहाड़, चांद, तारे, आकाश और जीव-जगत की उपस्थिति सदियों से मनुष्य के मन-मस्तिष्क को मथते रहे हैं। ईश्वर ने बनाई सृष्टि तो फिर ईश्वर को किसने बनाया? सभी जीवों में एक ही जैव पदार्थ है, तब फिर पृथ्वी पर आदमी का ही एकछत्र राज्य क्यों? यह पुस्तक इन्हीं मूल सवालों का विज्ञान-दृष्टि से तथ्यात्मक निरूपण है, वैज्ञानिक शोधों-अनुसंधानों के निष्कर्षों पर आधारित अब तक उपलब्ध जवाब है। यह सदियों से जारी अंधविश्वास, धार्मिक आग्रह के बीच वैज्ञानिक चेतना के अंकुरण का और विज्ञान के विकास का संक्षिप्त इतिहास है। पन्नों की तय संख्या-सीमा के दायरे में विषय की क्रमबद्ध, तार्किक प्रस्तुति प्राचीन और आधुनिक संदर्भ के साथ मैंऩे भरसक सरल भाषा में की है। पाठकों को इसमें कथा-क्रम जैसी रोचकता का अहसास भी होगा।
कुछ इस तरह है इस पुस्तक-योजना की कहानी
इस पुस्तक के आकार ग्रहण करने की कहानी कुछ इस तरह है। मैं 2001 में देहरादून में दैनिक जागरण से बतौर स्टाफ रिपोर्टर जुड़ा, तब वहां संपादकीय विभाग में समाचार संपादक श्री अशोक पांडेय, राज्य राजनीतिक ब्यूरो प्रमुख श्री दिनेश चंद्र और अंतर-डेस्क समन्वयक श्री लक्ष्मी प्रसाद पंत ( वर्तमान में दैनिक भास्कर, जयपुर संपादक) की टीम थी। वहां आरंभिक वर्षों में देहरादून के एक दर्जन से अधिक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर के वैज्ञानिक संस्थानों से रू-ब-रू होने, उनमें हो रहे शोध कार्यों को खबरों के हिसाब से समझने का अवसर मिला। विज्ञान, पर्यावरण के नए सूचना-प्रवाह से मेरे प्रयोग (रिपोटिंग) को विस्तार मिला, नई उड़ान मिली। तब हवा, पानी, पहाड़, जंगल, पर्यावरण, वन्यजीवन और खगोल (अंतरिक्ष) विज्ञान से संबंधित तर्क-तथ्य आधारित मेरी रिपोर्ट देहरादून संस्करण के अलावा दैनिक जागरण के दिल्ली स्थित सेन्ट्रल डेस्क (राष्ट्रीय संस्करण) में भी स्थान पाती थीं। देश के शीर्ष वैज्ञानिक राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम के मित्र वैज्ञानिक, विज्ञान लेखक प्रो. धीरेन्द्र शर्मा, जो ईस्वा (इंडियन साइंस राइटर्स एसोसिएशन) के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके थे, ने मुझे ईस्वा से बतौर आजीवन सदस्य जोड़ा। डा. कलाम भी ईस्वा के मानद फेलो थे। भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सहयोग से दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय विज्ञान संचार संगोष्ठी में मुझे एक सत्र में खोजी विज्ञान पत्रकारिता की भूमिका पर अपनी बात प्रस्तुत करने का और दूसरे दिन अन्य सत्र में पारंपरिक-सामयिक विज्ञान-तकनीक की खोज-खबर व प्रसार पर समूह-चर्चा में भाग लेने का अवसर मिला। उसी संगोष्ठी में भोजनावकाश के दौरान अमेरिका से आए नासा के सेंटर फार ग्लोबल स्टडीज के अध्यक्ष डा. सरोज मिश्र से मुलाकात हुई और फिर बाद में मैंने उनसे मंगल-यात्रा (अंतरिक्ष) के मद्देनजर बातचीत कर जानकारी हासिल की।
दिल्ली में बीज-रोपण, देहरादून में ढांचा-निर्माण और मेरठ में देह-धारण
संगोष्ठी खत्म होने के बाद दिल्ली में मैं आउटलुक के संयुक्त संपादक श्री दिवाकर (वर्तमान में नेशनल हेराल्ड समूह, दिल्ली में संपादक)  से भी मिलने गया था। उनसे चर्चा के क्रम में किताब लिखने की योजना का बीजारोपण हुआ। उन्होंने सलाह दी कि विज्ञान विषयों पर किताबें नेशनल बुक ट्रस्ट छापता है, उसे भेजिए। 2005 में वरिष्ठ संपादक स्वर्गीय अमरेन्द्र कुमार ने अपनी पुस्तक (पत्रकारिता : विधाएं और आयाम) में मेरे आलेख (हिन्दी विज्ञान पत्रकारिता के बढ़ते चरण) में स्थान दिया। यह पुस्तक बाद में बिहार के दो विश्वविद्यालयों में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में संदर्भग्रंथ के रूप में स्वीकृत की गई। तब विज्ञान विषयक पुस्तक लिखने की मेरी इच्छा परवान चढ़ी। मैं विषय-वस्तु (ब्रहाांड और जीवन) पर सामग्री का संचय पत्रकारिता की व्यस्त नौकरी से बचे समय में धीरे-धीरे करने में जुट गया। इस बीच मैं देहरादून से आगरा आया और वहां करीब एक साल रहने के बाद दैनिक जागरण छोड़ घर (बिहार) लौट आया। 2013 में बहुभाषी, बहुसंस्करणीय प्रकाशन संस्थान सुभारती मीडिया लिमिटेड में दैनिक प्रभात के समूह संपादक श्री सुनील छइयां के आग्रह पर बतौर संयुक्त संपादक (मेरठ मुख्यालय) बुलाया गया, जहां श्री सुनील छइयां, श्री विजय भोला (निदेशक) की लीडर टीम थी और पूरे संपादकीय विभाग में समूह संपादक के बाद मेरा स्थान था। तब मुझे वहां संपादकीय पृष्ठ और फीचर पृष्ठ पर अंतरिक्ष विज्ञान, पर्यावरण और अन्य विज्ञान विषयों पर लिखने का भी अवसर मिला। वहीं ख्याल आया कि पुस्तक-योजना में मनुष्य के भावी जीवन की वैज्ञानिक संकल्पना की बात भी जोड़ दी जाए तो पुस्तक ज्यादा रोचक और उपयोगी होगी। तब मैंने पुस्तक का नाम रखा- सुनो, मैं समय हूं। दैनिक प्रभात में मैं एक पृष्ठ का अपना साप्ताहिक स्तंभ प्रतिबिंब लिखता था, जिसमें विज्ञान और पर्यावरण विषयों को प्राथमिकता देता था। छह महीने बाद ही छइयां जी के ब्रेनहेमरेज के शिकार हो जाने के कारण श्री श्रीकांत अस्थाना समूह संपादक बनाए गए। प्रतिबिंब के विषयों पर चर्चा के दौरान आस्थाना जी से पुस्तक योजना (सुनो मैं समय हूं) की जिक्र हुई तो उन्होंने भी कहा कि पांडुलिपि को अब अंतिम रूप दे डालिए।
पुस्तक के प्रथम पाठक डा. अतुल कृष्ण
अप्रैल 2016 की बात है। मैंने पांडुलिपि सुभारती मीडिया लिमिटेड के प्रबंध संपादक डा. अतुल कृष्ण को अवलोकनार्थ भेजी। डा. अतुल कृष्ण राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र मेरठ के प्रख्यात सर्जन, सुभारती मेडिकल कालेज के सर्जरी विभाग के प्रमुख और उत्तर भारत के सबसे बड़े निजी विश्वविद्यालय (स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय) के संस्थापक हैं। यह मेरा दुस्साहस था कि मैंने उनसे पांडुलिपि पढऩे का आग्रह किया और उनकी यह तारीफ कि अति व्यस्तता के बावजूद उन्होंने पांडुलिपि को देखने-पढऩे की कृपा की। उन्होंने महीने भर बाद सुभारती मीडिया लिमिटेड के वरिष्ठ लेखाधिकारी अंशु गोयल के हाथ से पांडुलिपि भेजी, जिसमें उनकी यह टिप्पणी भी थी-  …मैंने पुस्तक के विभिन्न भागों का कुछ-न-कुछ अध्ययन किया, पुस्तक अत्यंत ज्ञानवद्र्धक है। मेरे विचार से इसे अति शीघ्र छपवाएं। नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया के हिन्दी संपादक श्री पंकज चतुर्वेदी से मैंने संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि पांडुलिपि ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री बल्देवभाई शर्मा के नाम से भेजिए। मैंने सितम्बर 2016 में पांडुलिपि रजिस्टर्ड डाक से भेज दी और एक महीनेे बाद फोन पर शर्मा साहब से पूछा तो उन्होंने बताया, पांडुलिपि मिल चुकी है और संबंधित विभाग को विचारार्थ दी गई है। छह महीनों बाद ट्रस्ट के हिन्दी संपादक श्री पंकज चतुर्वेदी का मार्च 2017 में पत्र मिला, आपकी पुस्तक प्रकाशन के लिए स्वीकृत कर ली गई है। तीन महीने बाद ट्रस्ट की ओर से नीरा जैन जी (मुप्रसनि) के साथ अनुबंध की प्रक्रिया जून 2017 में पूरी हुई। एक साल बाद मई 2018 में श्री पंकज चतुर्वेदी का पत्र मिला कि पुस्तक को चित्रों के साथ 160 पेज में ही प्रकाशित होना है, जिसमें तस्वींरें भी होंगी। तब मुझे अपनी पुस्तक-योजना से धर्मान्धता, ईश्वर के नाम पर धर्म का कारोबार, अंधविश्वास और असलियत का संघर्ष, सौरमंडल, धरती और चंद्रमा, पृथ्वी से परे जीवन, भावी जीवनशैली की सामग्री पन्नों की सीमा के कारण हटानी पड़ी। हालांकि पुस्तक-योजना से क्या हटाना है, इसका कोई आग्रह नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया की ओर से नहीं किया गया था।

धन्यवाद नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया और अन्य सभी को
जून 2018 में मैंने निर्धारित पृष्ठ संख्या के अनुरूप पांडुलिपि तैयार कर ट्रस्ट के हिन्दी संपादक श्री पंकज चतुर्वेदी को भेज दी। कोई आठ महीने बाद पिछले सप्ताह ट्रस्ट की ओर से भेजी गई प्रथम संस्करण-2019 (हिन्दी) की लेखकीय प्रतियां प्राप्त हुईं। पुस्तक प्रकाशित होने पर सबसे पहले मैं इसके प्रथम पाठक डा. अतुल कृष्ण जी को आदर सहित धन्यवाद देना चाहता हूं। इसके बाद दिवाकर जी को धन्यवाद, जिन्होंने पुस्तक लिखने और नेशनल बुक ट्रस्ट में भेजने का सुझाव दिया था। धन्यवाद राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत के पूर्व अध्यक्ष श्री बल्देवभाई शर्मा जी (अब केेंद्रीय विश्वविद्यालय, शिमला में प्रोफेसर) को, जिनके कार्यकाल में पांडुलिपि स्वीकृति हुई। धन्यवाद नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया के हिंदी संपादक और चर्चित पर्यावरण लेखक श्री पंकज चतुर्वेदी को कि नेशनल बुक ट्रस्ट की टीम ने पुस्तक मुद्रण-प्रकाशन की योजना पर कार्य किया। साथ ही, धन्यवाद देश-विदेश के प्रकाशकों के लिए चित्रांकन करने वाले प्रतिष्ठित चित्रकार श्री अरुप गुप्ता को, जिन्होंने डिमाई-आठ साइज वाले कुल 184 पृष्ठों की इस पुस्तक के लिए चार दर्जन से अधिक चित्र कल्पनाशीलता के साथ बनाएं हैं। अनुबंध करने के लिए धन्यवाद ट्रस्ट की नीरा जैन जी (मुप्रसनि) को। और, धन्यवाद सोनमाटी के प्रबंध संपादक अपने पुत्र निशांत राज का, जिन्होंने पुस्तक की स्टेशनरी संबंधी जरूरतों की समय पर पूर्ति में घर (डेहरी-आन-सोन) से दूर अपनी नौकरी के कार्य-स्थल पर रहकर भी तत्पर श्रम-योग किया।  अंत में, धन्यवाद ट्रस्ट के वर्तमान अध्यक्ष मध्य प्रदेश के प्रख्यात शिक्षाविद प्रो. (डा.) गोविन्द प्रसाद शर्मा को, जिनके कार्यभार संभालने के बाद मेरी पुस्तक (सुनो मैं समय हूं) की मुद्रित प्रतियां हस्तगत हुईं। नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया ने पुस्तक की कीमत 105 रुपये रखी है।

सवालों के साथ जीना बड़ी हिम्मत वाली बात और बहुत कष्टदायक भी
संयोग से, राष्ट्रीय विज्ञान दिवस की इस साल की थीम है– जनसामान्य के लिए विज्ञान और विज्ञान के लिए जनमानस। यह सच है कि विज्ञान और तकनीक की वजह से आदमी की जिंदगी में अनेक बदलाव आए हैं। विज्ञान-दृष्टि यानी सत्य-दृष्टि किसी कारखाने में तैयार नहीं होती, किसी कारोबारी की दुकान में नहीं बिकती और किसी बैंक में नहीं होती कि उधार ली जा सके। सत्य-दृष्टि तो सत्य के ही जन्म होने की प्रक्रिया है और सत्य की खोज में ही सत्य का निर्माण होता है। सवालों के साथ जीना बड़ी हिम्मत वाली बात है और बहुत कष्टदायक भी। समाज और संसार के विकास-विस्तार में विज्ञान-दृष्टि, वैज्ञानिक चेतना और विज्ञान के नियमों की महत्वपूर्ण भूमिका है। पुस्तक सुनो मैं समय हूं, में जीवन और जगत से संबंधित वैज्ञानिक ज्ञान की जो संक्षिप्त जानकारी एक जगह उपलब्ध है, वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रसार का ही प्रयास है। और, यह आईन-रूप समय है मानव की सभ्यता-यात्रा, उसके संघर्ष की जिजीविषा, उसके ज्ञान-विस्तार के गुजरे कल, वर्तमान और आने वाला कल का भी।


-कृष्ण किसलय (लेखक : सुनो मैैं समय हूं)

सोनमाटी-प्रेस गली, जोड़ा मंदिर, न्यू एरिया, पो. डालमियानगर-821305,

जिला रोहतास (बिहार, भारत)    फोन 9708778136

One thought on “सुनो मैं समय हूं : विषय के बीजारोपण से पुस्तक प्रकाशन तक 15 सालों का सफर

  • March 1, 2019 at 12:57 am
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    बधाई हो भईया।आप ने उक्त पुस्तक को लिख कर अपने शहर ही नही प्रदेश व देश का मान बढ़ाया है।आप इतिहास रचने वाले पुरूष हैं।आप हम सभी पत्रकारों के लिए मार्गदर्शक रहे हैं।आपकी अगुवाई में पत्रकारिता के क्षेत्र में हमारे जैसे लोगपन को बहुत कुछ सीखने का मौका मिला है।हमे उम्मीद ही नही पूरा विश्वास है कि आगे भी हमे बहुत कुछ सीखने का मौका मिलेगा।आप ऐसे हीं पत्रकारिता के शिखर पर बने रहें ।यही कामना है।प्रणाम,छोटा भाई मुकेश

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