हम भी हैं इंसान !

आज लोगों की दुनिया फेसबुक की डिजिटल दुनिया में लाइक और गपशप जैसे फालूत कॉमेन्ट करने तक सिमट चुकी हैं। हम वास्तविकता से कोसों दूर हैं। आज इस हालत पर कहीं चिंता नहीं दिखाई देती कि क्या वजह है कि सरकारी प्राइमरी स्कूलों में खिचड़ी-खाना मुफ्त, पढ़ाई मुफ्त, गणवेष मुफ्त और वजीफा भी होने के बावजूद बच्चे नहीं आते। शिक्षा में गुणवत्ता नहीं, भले ही टेक्नोलॉजी और गणवेश का रंग-ढंग आकर्षक हो गया हो। सरकारी स्कूलों में वॉशरूम देखकर ही स्थिति जाहिर हो जाती है। गरीबों-मजदूरों के घरों के बच्चे कभी आलू बीनने चले जाते हैं, कभी ईट-भट्टे पर काम करने, धान रोपने तो कभी किसी की दुकान पर मजदूरी करने चले जाते हैं, क्योंकि अपने पेट और घर की जरूरती पूरी करने की मजबूरी उन्हेंंपढऩे नही देती। आज आधे से ज्यादा बाल मजदूर कृषि क्षेत्र में हैं। बाद में यही बच्चे बड़े होकर बड़ी कम्पनियों की कठपुतली बन जाते हैं और दूर विदेशों में प्रवासी मजदूर बनकर खून के आंसू रोते हैं।


 

मजदूर दिवस (1 मई) पर विशेष

हम मजदूर भी इंसान हैं साहब !

-आकांक्षा सक्सेना

औरैया (उत्तर प्रदेश)

दुनिया में भारत का अध्यात्म-योग, कला-तकनीक और वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में भी डंका बज रहा है। पूरी दुनिया भारत का लोहा मान गई है। चाहे चांद पर पानी खोजने की बात हो या लार्ड हैड्रल कोलाइड्रल महामशीन से ब्रह्माण्ड के सबसे सूूक्ष्म कण (गॉड पाॉटिकिल) की खोज की प्रक्रिया हो। यह सब देख-सुन कर हर भारतीय का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है, मगर दूसरी तरफ देश-समाज के गरीब-पिछड़े तबके की ओर नजर जाती है तो मन ग्लानि से भर जाता है। आजादी और लोकतंत्र के सात दशक बाद भी मजदूर सिर्फ मजदूर बने रहने लिए मजबूर है, जिन तक सरकारी सुविधायें पूरी तरह नहीं पहुंच सकी हैं और जिनका बचपन भूख, गरीबी, बेकारी, बेबसी में हर पल रौंदा जाता रहा है। जिनका बचपन पेट की आग बुझाने के लिए होटलों में एक तरह से बंधुआ मजदूर बनर जूठे बर्तन धोने को मजबूर हैं। छोटे-बड़े ढ़ाबों, बसों-ट्रेनों में चाय बेचने को मजबूर है।

ऐसा कोई बाजार नहीं है, जहां बाल मजदूर नहीं

ऐसा कोई बाजार नहीं है, जिसमें बाल मजदूर काम न कर रहे हों। यह किसी से छिपा नहीं है। यह स्थिति तब बनी हुई है, जब 12 जून को प्रति वर्ष बाल मजदूर विरोध दिवस पूरे देश में मनाया जाता है। आईएलओ वर्ष 2002 से इस दिन हर साल जागृति का आयोजन करता है। देश में बाल श्रम के विरुद्ध सख्त कानून भी है। इसके बावजूद आज देश में 5-14 वर्ष की छोटी उम्र के 57 लाख चिह्निïत बाल मजदूर हैं। दुनिया में भी बाल मजूदरों की संख्या 2.5 करोड़ से अधिक है। दुखद यह है कि इनमें पचास फीसदी बच्चियं हैं। यह स्थिति बेहद शर्मनाक है। देश का कानून कहता है कि 14 साल के बच्चे से जबरन श्रम करवाना दण्डनीय अपराध है।

आकंड़े बताते हैं कि देश-दुनिया में 11 वर्ष के छोटे बच्चे प्रत्येक दिन पूरे 20 घंटे श्रम करने में लगे रहते हैं। दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से प्रत्येक दिन 14 बच्चे गायब होते हैं। यही गायब बच्चे बाल मजदूरी और वेश्यावृत्ति जैसी घिनौनी दुनिया में जबरन उतार दिए जाते हैं। यूनीसेफ के आंकड़ों से पता चलता है कि पांच से सात हजार नेपाली बच्चे मजबूरीवश वेश्यावृत्ति में लिप्त हैं। और, आज देश में जो मर्यादाहीनता दिख रही है, घिनौनी अमानवीयता-क्रूरता दिख रही है, वह इंटरनेट पर गंदी सोशल साइटों का नतीजा है। सरकारों को ऐसी अश्लील साइटों पर बिल्कुल प्रतिबंध लगा देना चाहिए, जो देश के सुनहरे भविष्य को असभ्य, हिसंक और पशु बनाने पर आमादा हैं। इस तरह के वेबसाइटों का एकमात्र मकसद युवाओं को भटकाना और उनका शोषण करना है। इस बात को सभी जानते हैं, पर कोई दमदार और संगठित तरीके से आवाज नहीं उठाता, चाहे राजनीति करने वाले हों या सामाजिक संस्था चलाने वाले हों।

वास्तविक हालत पर चिंता नहीं, फेसबुक में लाइक तक सिमट चुकी दुनिया

आज लोगों की दुनिया फेसबुक की डिजिटल दुनिया में लाइक और गपशप जैसे फालूत कॉमेन्ट करने तक सिमट चुकी हैं। हम वास्तविकता से कोसों दूर हैं। आज इस हालत पर कहीं चिंता नहीं दिखाई देती कि क्या वजह है कि सरकारी प्राइमरी स्कूलों में खिचड़ी-खाना मुफ्त, पढ़ाई मुफ्त, गणवेष मुफ्त और वजीफा भी होने के बावजूद बच्चे नहीं आते। शिक्षा में गुणवत्ता नहीं, भले ही टेक्नोलॉजी और गणवेश का रंग-ढंग आकर्षक हो गया हो। सरकारी स्कूलों में वॉशरूम देखकर ही स्थिति जाहिर हो जाती है। गरीबों-मजदूरों के घरों के बच्चे कभी आलू बीनने चले जाते हैं, कभी ईट-भट्टे पर काम करने, धान रोपने तो कभी किसी की दुकान पर मजदूरी करने चले जाते हैं, क्योंकि अपने पेट और घर की जरूरती पूरी करने की मजबूरी उन्हेंंपढऩे नही देती। आज आधे से ज्यादा बाल मजदूर कृषि क्षेत्र में हैं। बाद में यही बच्चे बड़े होकर बड़ी कम्पनियों की कठपुतली बन जाते हैं और दूर विदेशों में प्रवासी मजदूर बनकर खून के आंसू रोते हैं।

सोशल मीडिया पर अपलोड किए गए तमाम वीडियो यह बताते हैं कि दूर देशों में हजारों प्रवासी मजदूर अपने देश आने के लिए तड़प रहे हैं, मजबूर हैं। कम्पनियां या मजदूरों की आपूर्ति करने वाली एजेंसियां उनको मोटी सैलरी का लालच देकर ले जाती हैं और परायी धरती पर पांव रखते ही मजदूरों के पासपोर्ट छीन लेती हैं। फिर उनका शारीरिक और मानसिक शोषण होता है। उनकी पुकार सुनने वाला कोई नहीं। इन्हीं मजदूरों सेे 70 अरब डालर की बड़ी रकम देश में आती है, हमारी अर्थव्यवस्था की नींव मजबूत करती है। वह मजदूर जो देश की अर्थव्यवस्था की नींव हैं, उसकी खुद की नींव जर्जर है।

सोवियत संघ के देश अजरबैजान में भारतीय कुशल मजदूरों को बंधक बना लिया गया था। उसका एक वीडियो अजरबैजान में फंसे एक भारतीय (बिहार के गोपालगंज का निवासी) ने अपने परिवार को भेजा। मगर उसे न्याय नहींमिल सका, क्योंकि वह प्रकरण चुनाव में, चुनाव की खबरों में दफन हो गया। खाड़ी देश के सबसे चकाचौंध वाले शहर कतर में 2022 में होने वाले विश्वकप फुटबॉल के लिए निर्माण कार्य चल रहा है, जिसमें भारत सहित दक्षिण एशिया के देशों के मजदूर गए हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कतर के विश्व कप आयोजन के मद्देनजर जो रिपोर्ट पेश की है, उसमें प्रवासी भारतीयों की गुमनाम मौत पर सवाल उठाया गया है। भारत सरकार का उस पर जवाब है कि पिछले एक साल में 289 भारतीय मजदूरोंं की कतर में मौत हो चुकी है, जिनमें विश्व कप निर्माण कार्य में लगे श्रमिक भी शामिल हैं। जिन मजदूरों के कारण सरकारी खजाने तथा देश की प्रतिष्ठा में इजाफा होता है, उनकी खैर-खबर क्यों नहीं ली जाती है। सरकारों की जिम्मेदारी है कि वह ऐसा पैनल बनाए, जो प्रति महीने उनकी कुशलक्षेम की रिपोर्ट प्राप्त करे।

झारखंड के झरिया की जमीन सौ वर्षों से आग की दरिया, ऐसे नर्क में भी बाल मजदूर

झारखंड के झरिया में इस्पात निर्माण के लिए विश्व का सबसे महंगा कोयला (कोकिंग कोल) निकाला जाता है। मगर झरिया की जमीन तो कम-से-कम सौ वर्षों से सुलगते कोयले की दरिया बनी हुई है। वहां का तापमान इतना अधिक है कि जूते-चप्पल के तलवे कुछ ही देर में पिघलने लगते हैं। इस साक्षात धधकते नर्क में भी सौ वर्षों से लोग पापी पेट के लिए कोयले की ढुलाई की काम में लगे हुए हैं। सुनकर कलेजा मुंह में को आ जाता है कि ऐसे नर्क में काम करने वाले मजदूरों को दिहाड़ी के नाम पर दस-बीस रुपये ही मिल पाते हैं। इसी ओर किसी का भी ध्यान नहींहैं। मीडिया कारपोरेट चकाचौध की तस्वीर ही पेश करती है, पर इस मुद्दे को अपने अभियान का विषय नहींबनाती। आखिर झरिया के मजदूर और खासकर बाल मजदूर किससे कहें कि हम भी इंसान हैं साहब !
गांव-गांव अपेक्षित-वांछित रोजगार में वृद्धि हो, छोटे उद्योगों को बढ़ावा मिले और देश के कुशल कारीगरों को मान मिले तो देश का श्रम, देश की प्रतिभा दूर देशों में पलायन करने के लिए मजबूर नहींहोगी। देश-दुनिया की सरकारें और देश-दुनिया के स्वंयसेवी संगठन एक हों जाएं तो एक बड़ी क्रांतिहो जाएगी और बाल मजदूरी, प्रवासी बाल श्रम जैसी गम्भीर समस्याओं पर अंकुशलग जाएगा।

  • आकांक्षा सक्सेना

स्वतंत्र युवा लेखक-पत्रकार, ब्लागर व फिल्म मेकर

(लेखिका अखिल भारतीय कायस्थ महासभा की युवा शाखा की सचिव भी हैं)

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