हरिवंश : निराशापूर्ण राजनीति के दौर में उम्मीद की किरण

वरिष्ठ संपादक रहे राज्यसभा सदस्य हरिवंश नारायण सिंह का राज्यसभा के उपाध्यक्ष (डिप्टी स्पीकर) बनना निराशापूर्ण राजनीति के मौजूदा दौर में उम्मीद की एक किरण है।उनके निर्वाचन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बधाई देते हुए राज्यसभा में उनके जीवन का विवरण प्रस्तुत किया।
जैसे प्रभात खबर में प्रधान संपादक रहते हुए हरिवंश भी (जैसा कि अखबार के प्रिंटलाइन में उनका नाम छपता और इसी नाम से वह लिखते) थे, वैसे ही सांसद बनने के बाद रहे हैं। सांसद बनने के बाद सबसे पहले उन्होंने अपनी पूरी संपत्ति अखबार में छापकर सार्वजनिक की। अपने लिए वही गाड़ी, वही ड्राइवर, वही लोग। घर में जाने पर खुद से नाश्ता-पानी कराना। पैदल जाकर सैलून में दाढ़ी बनवाना। उसी तरह उनकी पत्नी का खुद सब्जी खरीदने जाना। किराये के टैक्सीवाले को फोन कर बुलाना, उसकी सेवा लेना। इकोनॉमी क्लास से चलना। बॉडीगार्ड नहीं रखना और अंशकालिक बॉडीगार्ड की सेवा महीने में दो-चार दिन लेना। सांसद बनकर इतना साधारण बने रहना, आम आदमी की तरह ही कतार में लगने का अभ्यास बनाए रखना। आज के सत्ता-प्रदर्शन वाले जमाने में अपने-आप में यह सब बड़ी बात है। हालांकि कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि यह सब तो दिखाने के लिए होता है।

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बिहार के रोहतास जिले से उनका जुड़ाव दो तरह से
भारत के विश्वविख्यात सोनघाटी क्षेत्र वाले
बिहार के रोहतास जिले से उनका जुड़ाव दो तरह से रहा है। बिहार में रोहतास जिले के पड़ोस के सीमावर्ती पर्वतीय जिले कैमूर में भभुआ-चांद के एक गांव में उनका फुफुहारा है। कैमूर जिला करीब ढाई दशक पहले तक रोहतास जिला का ही हिस्सा था। दूसरा कि, सांसद के तौर पर जब उनको गांव का चयन करना था, तब उन्होंने चुना ऐसा गांव जिसे वे पहले से नहींजानते थे। उन्होंने चयन किया भवानीदयाल संन्यासी के गांव बहुआरा (रोहतास जिला, बिहार) का, जो सासाराम संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत है। पटना में आर्यावर्त के संपादकीय टीम में रहे पत्रकार-कवि भवानीदयाल सिंह जो बाद में सन्यासी बने थे। भवानीदयाल संन्यासी दक्षिण अफ्रीका गए थे और फिर वहां से लौटकर अपने गांव में रहे थे और देश की आजादी के लिए अलख जगाई थी। उन्होंने अफ्रीका में अहिंसा का प्रयोग किया था।

हरिवंशजी ने अपने संसदीय कोष से अन्य सांसदों की तरह नली-गली, सड़क, स्कूल भवन आदि बनवाने के काम से इतर अपना सांसद कोष खामोशी के साथ बिना ढिंढोरा पिटते हुए बिहार में दो स्ंस्थानों की स्थापना के लिए बिहार सरकार को दे दिया। एक आर्यभट्ट विश्वविद्यालय में नदी अध्ययन सह संधान केंद्र और दूसरा आईआईटी पटना में इनडेंजर्ड लैंग्वेज सेंटर के विकास के लिए।

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जब मोबाइल पर अचानक आया उनका फोन
पत्रकार होने के नाते मेरी उनसे औपचारिक मुलाकात दशकों पहले हुई थी। मैं भी आंरभिक दौर में दैनिक प्रभात खबर के लिए लिखा करता था। वर्ष 2017 जनवरी में मैंने जब उन्हें मोबाइल पर नववर्ष की औपचारिक शुभकामना भेजी थी। तब मैं पश्चिम उत्तर प्रदेश के सबसे पुराने बहुसंस्करीय दैनिक प्रभात (मुख्यालय मेरठ) में एसोसिएट एडीटर था। तब शाम में अचानक मोबाइल पर उनका फोन आया था और तब मेरे मुंह से सबसे पहले यही निकला था कि मैं देश की एक हस्ती से बात कर रहा हूं। सरल हृदय हरिवंशजी बस हंसकर रह गए।

सचमुच, उनके राज्यसभा के उपसभापति बनने पर अंतस से यह प्रसन्नता छलक रही है कि राजनीति के अत्यंत निराशाजनक दौर में हरिवंश जी जैसे व्यक्ति के लिए भी प्रतिष्ठापूर्ण जगह की गुंजाइश बची हुई है। इस दौर में हरिवंश जी का राज्यसभा का उपाध्यक्ष बनना बहुत बड़ी बात है। 

भरोसा है कि कुशलता से वे  करेंगे राज्यसभा का संचालन

यह भरोसा है कि वह बेशक जिस प्रखरता और कुशलता के साथ उन्होंने पत्रकारिता में अपनी भूमिका का निर्वहन किया, उसी कुशलता से वे राज्य सभा का संचालन भी करेंगे। राजनीति में धनबल, बाहुबल और वर्चस्व बल की जो आपाधापी है, उस हालात में पत्रकार हरिवंश का शीर्ष पद के लिए चुना जाना भारतीय राजनीति के इतिहास में एक गौरवपूर्ण अध्याय-आख्यान है। बिहार की ओर से, मेरी व सोनमाटी परिवार से जुड़े सदस्यों की ओर से और पत्रकार जगत की ओर से भी हरिवंश को कोटिश: बधाई!

-कृष्ण किसलय, समूह संपादक, सोनमाटी

 

 

जीवन का सफर : 1956 में बलिया में जन्म, 977 में टाइम्स ऑफ इंडिया समूह में प्रशिक्षु पत्रकार

यूपी के बलिया जिले के रहने वाले हरिवंश नारायण सिंह एनडीए की तरफ से राज्यसभा के उपसभापति बन गए हैं। उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार बीके हरिप्रसाद को 125 के मुकाबले 105 वोटों से हरा दिया है। इस खबर के बाद से उनके पैतृक गांव में खुशी का माहौल है। वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश का जन्म 30 जून 1956 को बलिया जिले के दलजीत टोला सिताबदियारा में हुआ। हरिवंश ने अपनी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक शिक्षा गांव के सटे टोला काशी राय स्थित स्कूल से शुरू की, उसके बाद जेपी इंटर कालेज सेवाश्रम (जयप्रकाशनगर) से।

जयप्रकाश नारायण (जेपी) से सबसे ज्यादा प्रभावित

1971 में हाईस्कूल पास करने के बाद वे वाराणसी पहुंचे। वहां यूपी कॉलेज से इंटरमीडिएट और उसके बाद काशी हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक किया और पत्रकारिता में डिप्लोमा की डिग्री हासिल की। अप्रैल 2014 में उन्हें राज्यसभा के लिए बिहार से चुना गया। उनका कार्यकाल अप्रैल 2020 में पूरा होगा। हरिवंश को जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया।

हैदराबाद एवं पटना में बैंक में नौकरी की और पत्रकारिता में फिर हुए वापस

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा के दौरान ही वर्ष 1977-78 में टाइम्स ऑफ इंडिया समूह मुंबई में प्रशिक्षु पत्रकार के रूप में उनका चयन हुआ। इसके बाद वे टाइम्स समूह की साप्ताहिक पत्रिका धर्मयुग में 1981 तक उप संपादक रहे। 1981-84 तक हैदराबाद एवं पटना में बैंक ऑफ इंडिया में नौकरी की और वर्ष 1984 में इन्होंने पत्रकारिता में वापसी की और 1989 अक्तूबर तक आनंद बाजार पत्रिका समूह से प्रकाशित रविवार साप्ताहिक पत्रिका में सहायक संपादक रहे। हरिवंश काफी लंबे समय तक प्रभात खबर अखबार के प्रधान संपादक रहे और इस अखबार को देश के टॉप टेन अखबार तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।

 

 

हरिवंश ने लिखा सासंद आदर्श ग्राम योजना के तहत गांव के चयन में अपनी ओर से विलम्ब होने पर जिलाधिकारी को पत्र

सेवा में,
जिलाधिकारी, पटना
विषय : आपका पत्र दिनांक 08.01.2015, सांसद आदर्श ग्राम योजना के अंतर्गत ग्राम पंचायत के चयन-निर्धारण के संबंध में

प्रिय महोदय,
गांव के चयन में विलंब हुआ क्यों कि मेरी इच्छा उस गांव के चयन की थी जिसका हमारे राष्ट्रीयए सामाजिक जीवन में महत्व रहा हो, परंतु आज वह अति उपेक्षित होऐसा ही एक गांव तेंदुनी बहुआरा है यह करीब 150 घरों की बस्ती है, जिसमें लगभग 80 घर दलित, 40 घर राजपूत, शेष तांती, बढ़ई, लुहार आदि हैं ग्राम पंचायत बकसना, प्रखण्ड करहगर, वि.स. क्षेत्र करहगर, लोकसभा क्षेत्र सासाराम, जिला रोहतास

हमारी सूचना के अनुसार, भारत सरकार द्वारा आदर्श ग्राम के लिए तय कसौटियों पर इस गांव का चयन हो सकता हैइस गांव का महत्व यह है कि इस गांव के एक जयराम सिंह थे, जो दक्षिण अफ्रीका चले गये उनके एक पुत्र हुए बाबू भवानी दयाल संन्यासी संन्यासी तीन भाई थे तीनों भाइयों का जन्म दक्षिण अफ्रीका में हुआ बाबू भवानी दयाल संन्यासी, गांधी जी के अत्यन्त निकट थे उनके बारे में कुछ और प्रेरक तथ्य हैं

दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी से पहले ही संन्यासी जी ने सत्याग्रह का इतिहास लिखावहीं रहते हुए इन्होंने अपनी पत्नी जगरानी देवी के साथ जगरानी प्रेस की शुरुआत की, जिसके जरिये अफ्रीका में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए हिंदी पत्रिका निकलने की शुरुआत हुई थी
राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान देश के चर्चित नेताओं के साथ हजारीबाग जेल में वह बंद रहे और यहां उन्होंने करीब 1000 पन्ने का सत्याग्रह का अंक तैयार कियाआज भी अफ्रीका में इनके नाम पर कई संस्थाएं चलती हैं कालांतर में वे अपने गांव (बिहार) रहने आये उनके एक भाई को अश्वेत आंदोलन में दक्षिण अफ्रीका में मार डाला गया तीसरे भाई दक्षिण अफ्रीका में प्रोफेसर थे कुछ वर्षों पहले तक उनका गांव से संपर्क था, परंतु अब वह टूट गया हैभवानी दयाल संन्यासी देश में आये, फिर अपने गांव लौटे देश की आजादी की लड़ाई में बड़ा काम किया बिहार की पावन मिट्टी के वह अचर्चित और अनजाने नायक हैं उन्होंने अपने प्रयास से अपने गांव में बाबू राजेंद्र प्रसाद, सरोजनी नायडू एवं एंडरसन को आमंत्रित किया था यह सभी लोग कुदरा से बैलगाड़ी से आये थे उस समय संन्यासी जी ने यहां खरदूषण पाठशाला की नींव रखी, जिसका शिलान्यास राजेंद्र बाबू एवं सरोजनी नायडू ने किया संन्यासी जी द्वारा स्थापित इस पाठशाला का मकसद स्कूल चलाने के साथ ही लाइब्रेरी चलाना एवं गांव के किसानों को खेती की उन्नत तकनीक की जानकारी देना और इलाके में संगीत की शिक्षा देना भी था संन्यासी जी इसे चलाते रहे और बाद में इसका नामकरण उन्होंने प्रवासी भवन किया परंतु संन्यासी जी के राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल होने और गांव में न रहने के कारण पाठशाला बंद हो गयी गांधी जी के करीबी सहयोगी होने के अतिरिक्त आजादी की लड़ाई में उनका बहुत बड़ा योगदान है परंतुए उनके गांव में प्राथमिक विद्यालय और स्वास्थ्य केंद्र नहीं हैं और भी अनेक समस्याएं हैं

इस गांव को ही सांसद आदर्श गांव बनाने की मेरी योजना है भारत सरकार ने आदर्श ग्राम के लिए जो कसौटियां तय की हैं, उसके अनुरूप यह गांव सही है या नहीं, इसकी सूचना आप सरकारी जांचोपरांत प्रदान करें यदि यह गांव केंद्र सरकार की तय कसौटी पर आदर्श गांव के चयन के लिए उपयुक्त है तो मैं इसी गांव को सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत चयन करने की अनुशंसा करता हूं
भवदीय,
हरिवंश
सांसद (राज्यसभा)


(इनपुट व तस्वीर : सोनमाटी संपादकीय टीम उपेन्द्र कश्यप, मिथिलेश दीपक, अवधेशकुमार सिंह, निशांत राज)

 

 

 

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