तीस साल पहले रखी थी कलासंगम की नींव, अब बना सोन कला केेंद्र / बिजली में स्वावलंबी बनाने में एनटीपीसी की भूमिका अहम / नक्सलियों ने गांवों में बजाई डुगडुगी

रंगकर्म के कई उपक्रम शहर के इतिहास में पहली बार हुए

डालमियानगर (रोहतास)-कार्यालय प्रतिनिधि। बीसवीं सदी में जिन रंगकर्मियों ने कलासंगम की आधारशिला रखकर नए तरह की अखिल भारतीय लघु हिन्दी नाटक प्रतियोगिता की शुरुआत की थी, उसी टीम के वरिष्ठ रंगकर्मियों ने 21वीं सदी के युवाओं-कलाकारों के साथ 2019 में सोन कला केेंद्र की स्थापना की है। 20वीं सदी की संस्था कला संगम में संरक्षक डा. रागिनी सिन्हा, अरुण कुमार गुप्ता, उदय शंकर, अध्यक्ष कृष्ण किसलय, उपसचिव जीवन प्रकाश गुप्ता, कार्यकारिणी सदस्य सुरेंद्र प्रसाद चौरसिया, जगनारायण पांडेय वरिष्ठ अब सोन कला केेंद्र में हैं, जिस टीम में अध्यक्ष दयानिधि श्रीवास्तव, कार्यकारी अध्यक्ष जीवन प्रकाश, उपाध्यक्ष सुनील शरद, उपेन्द्र कश्यप, अरुण शर्मा, सचिव निशान्त राज, उपसचिव सत्येन्द्र गुप्ता, प्रीति सिन्हा, ओमप्रकाश सिंह ओम, कोषाध्यक्ष राजीव सिंह, उपकोषाध्यक्ष नंदकुमार सिंह हैं।
तीन दशक पहले नाटक प्रतियोगिता के साथ वरिष्ठ रंगकर्मी सम्मान, नाट्यकार्यशाला संयोजन, कलाकार रंगयात्रा और रंगकर्म केेंद्रित स्मारिका (सोनधारा) के संयोजन-प्रकाशन के साथ नाटक प्रतियोगिता को नए स्तर, नए महत्व और नई ऊंचाई के साथ स्थापित किया गया था। रंगकर्म से संबंधित ये उपक्रम शहर के इतिहास में पहली बार हुए थे। रंगकर्मी कुंजबिहारी सिन्हा कलासंगम के अध्यक्ष और नाटककार-पत्रकार कृष्ण किसलय इस संस्था द्वारा आयोजित नाटक प्रतियोगिता के अध्यक्ष थे। कलासंगम द्वारा आयोजित पहले वर्ष (1989) की प्रतियोगिता में चार राज्यों की 14 नाट्य संस्थाएं आई थीं। प्रो. अनिल ठाकुर सुमन (रांची), सरूर अली अंसारी (पटना), प्रेमशंकर प्रेम और उदयकुमार सिन्हा (दोनों डालमियानगर) निर्णायक थे। रंग-सम्मान उस समय के वरिष्ठ रंगकर्मियों डा. मुनीश्वर पाठक, अभयचंद मेहरा, एके शर्मा और एएन श्रीवास्तव को प्रदान किया गया था।
नाट्य कार्यशाला में नाट्यशास्त्र के अंतरराष्ट्रीय ख्याति के विद्वान डा. ब्रजवल्लभ मिश्र (मथुरा) ने भरतमुनि के नाट्यशास्त्र पर आधारित रंगकर्म के 11 मूल तत्वों पर और भारत सरकार के उत्तर-मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केेंद्र (इलाहाबाद) के वरिष्ठ कला अधिकारी विपिन शर्मा ने एक-एक सप्ताह के अभ्यास वर्ग का निर्देशन किया था। डा. ब्रजवल्लभ मिश्र (भरत का नाट्यशास्त्र), मोहन उप्रेती (रामलीला), सी. भास्कर राव, संजय कुंदन (ग्रामीण रंगमंच), अंकित राज (लोकनाटक डोमकच) के लेखों और बादल सरकार, जोहरा सहगल से शम्मसुल इस्लाम की, मोहन महर्षि से प्रमोद कौंसवाल की, पद्मश्री रामेश्वर सिंह कश्यप से कृष्ण किसलय की भेंटवार्ता से स्मारिका (सोनधारा-1992) राष्ट्रीय महत्व की संग्रहणीय बनी। 1990 में संस्था अभिनव कला संगम नाम से पंजीकृत हुई। कृष्ण किसलय इसके प्रथम अध्यक्ष हुए, जिनके नेतृत्व में प्रतियोगिता 5 वर्ष संचालित हुई।

एनटीपीसी की बदौलत खत्म होगी बाजार पर निर्भरता

बारुन/नवीनगर (औरंगाबाद)-मिथिलेश दीपक/निशांत राज। बिहार के तीन बिजलीघरों नवीनगर, बाढ़ और बरौनी की पांच यूनिटों के निर्माण का कार्य अब करीब-करीब अपने अंतिम चरण में है। इनसे आने वाले दिनों में बिहार को 2000 मेगावाट बिजली मिलने लगेगी। इन तीनों बिजलीघरों में एनटीपीसी की बदौलत बिहार का बिजली के लिए बाजार पर निर्भरता खत्म हो जाएगी। वर्ष 2020 में सौर, पनबिजली और अन्य पारंपरिक स्रोतों से भी बिहार को 300 मेगावाट बिजली उपलब्ध होने लगेगी। कांटी, बरौनी और नवीनगर के बिजलीघर बिहार (राज्य सरकार) के अपने हैं, जिन्हें राज्य सरकार ने संचालन के लिए एनटीपीसी को सौंप दिया है। इस समय बिहार को अपनी जरूरत की पूर्ति के लिए करीब औसतन 1000 मेगावाट बिजली बाजार से खरीदनी पड़ती है। इसके लिए राज्य को केेंद्र सरकार के भरोसे रहना पड़ता है। फिर बाजार में बिजली की जो कीमत प्रति यूनिट होती है, उसी महंगी दर पर बिजली खरीदनी पड़ती है, क्योंकि बिजली पहले से भंडारित नहींहो सकती और जरूरत तत्काल आपूर्ति की होती है।
ऐसी उम्मीद है, मुख्य कार्यकारी अधिकारी विजय सिंह के नेतृत्व में नवीनगर पावर जेनरेटिंग कंपनी से वर्ष 2020 में ही 1000 मेगावाट की आपूर्ति होने लगेगी। नवीनगर बिजली घर की पहली यूनिट ०६ सितम्बर को चालू हो चुकी है। यहां 660 मेगावाट बिजली उत्पादन की तीन इकाइयां हैं। पहली चालू इकाई से 518 मेगावाट बिजली बिहार को मिलने और छह-छह महीनों के अंतराल पर दूसरी, तीसरी इकाई के चालू होने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इन तीनों बिजली इकाइयों से बिहार को कुल 1678 मेगावाट बिजली मिलेगी। पहले 1553 मेगावाट बिजली ही इनसे राज्य को मिलना तय किया गया था। बाढ़ में 660 मेगावाट की पहली इकाई से 341 मेगावाट बिजली बिहार को मिलेगी। इसका शिलान्यास 1999 में हुआ था। इसे 2009 में पूरा होना था। इसका निर्माण रूस की कंपनी द्वारा किया जा रहा था। अब इसके निर्माण का कार्य एनटीपीसी को सौंपा गया है। इसमें भी 2020 के अंत तक उत्पादन लक्ष्य तय हुआ है। 14 अगस्त को इसका निर्माण पूरा हो चुका है, मगर अभी बिजली उत्पादन का परीक्षण बाकी है। बिहार की बरौनी बिजली घर की कुल उत्पादन क्षमता 720 मेगावाट की है। वहां पहले चरण में दो इकाइयों को और दूसरे चरण में चार इकाइयों को चालू किया जाएगा। दो इकाइयां निर्माण के अंतिम चरण में हैं, जिनमें 220 मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा। बरौनी बिजली घर में बिजली उत्पादन की नौ इकाइयां हैं। इनकी क्षमता 55 मेगावाट से लेकर 250 मेगावाट तक बिजली उत्पादन करने की है।

गांवों में डुगडुगी बजाकर घर-घर से मांगा बेटा-बेटी

बिहार में नक्सली सिद्धांत की मुख्य धारा दशकों पीछे छूट चुकी है और नक्सलबाड़ी से निकला संगठन अराजकता, टूूट-फूट, अपराधीकरण से गुजरता रहा है। फिर भी आदिवासियों को संगठित कर प्रतिरोधात्मक कार्रवाई की नक्सली मुहिम जारी है। मुगेर, जमुई और लखीसराय जिलो में नक्सली संगठन की पूर्वी बिहार एवं पूर्वोत्तर झारखंड स्पेशल एरिया कमेटी ने डुगडुगी बजा आदिवासी परिवारों के घरों से एक बेटा और एक बेटी की मांग की है। जमुई, लखीसराय और मुंगेर जिलों के दर्जनों गांवों में डुगडुगी बजाकर यह संदेश दिया गया है। बरमसिया गांव मेंं हुई बैठक में 14-18 वर्ष के किशोरों-युवाओं को जोडऩे की अपील की गई और 162 युवाओं की सूची बनाई गई। नक्सली संगठन ने फौजी दस्ता के लिए युवक की लंबाई पांच फीट पांच ईंच और युवती की चार फीट आठ ईंच रखा है। नक्सल विरोधी अभियान ‘आपरेशन कोबराÓ में संलग्न सीआरपीएफ टीम को लखीसराय जिला से बरामद एक डायरी से यह सब खुलासा हुआ है। डायरी मेंसबके नाम दर्ज हैं। डायरी से ही पता चला है कि नक्सली संगठन आदिवासी समुदाय को आकर्षित करने के लिए सहयोगी बैंक भी चला रहा है, जो कारोबार या जरूरत के लिए कर्ज देता है और समय पर कर्ज भुगतान करने वालों का सूद भी माफ कर देता है।
(सोनमाटी समाचार नेटवर्क)

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