

कुमार बिंदु की कविता : मेरा ज़मीर
हर हत्यारे का
हर अपराधी का
हर आतंकवादी का भी
एक भरा- पूरा परिवार होता है
उसकी एक पुश्तैनी जाति
और उसका एक महान धर्म भी होता है
इसीलिए हर हिंदू हत्यारा
अपने देवी देवता के मंदिर में करता है पूजन
तो हर क्रिश्चियन क्रिमिनल
गिरजाघर में करता है पवित्र बाइबल का पाठ
जबकि हर मुस्लिम अपराधी
मस्जिद में पूरी अकीदत से अदा करता है नमाज़
हर सिख आतंकी भी गुरुद्वारा में टेकता है मत्था
और गुरुग्रंथ साहिब के समक्ष करता है अरदास
एक दिन एक बड़े शहर में
एक धर्म विशेष के हत्यारों ने
देश के एक लोकप्रिय राजनेता की कर दी हत्या
राजनेता और हत्यारों का धर्म था अलग- अलग
हत्यारों और राजनेता की जाति भी थी ज़ुदा- ज़ुदा
इसीलिए मेरे कस्बाई शहर में
राजनेता की हत्या के विरोध में
उसके समर्थकों की भीड़ उबल पड़ी
हत्यारों की जाति- धर्म के लोगों पर बाज़ सा झपट पड़ी
देखते ही देखते
लूट ली उनकी दुकानें
पुरुषों को मारा- पीटा
स्त्रियों से छीन लिए गहने
मैं मोहनदास करमचंद गांधी नहीं था
मैं जवाहर लाल नेहरु भी नहीं था
इसीलिए पीटे जाने के डर से
उन उन्मत्त जनों के हाथों मारे जाने के भय से
मौन साधे देखता रहा उनका हर कुकृत्य
चुपचाप सहता रहा उनका हर अन्याय
जबकि मुझे करना था
कुकृत्य का सख्त विरोध
अन्याय का पुरजोर प्रतिकार
आज मैं जिंदा हूं जरूर
मगर मर चुका है मेरा ज़मीर
◆ संपर्क: डेहरी ऑन सोन, रोहतास, बिहार 09939388474