अनाम सिपाहियों का दस्तावेज : हमारे शिल्पकार

अनाम सिपाहियों का दस्तावेज : हमारे शिल्पकार
हसपुरा(औरंगाबाद)।  दुनिया के सामाजिक बदलाव का इतिहास बतलाता है कि बदलाव से उपजी हुवी ऊर्जा और उसका नेतृत्व समुह अपने इन अनाम नायकों को भूलता नही है बल्कि समय आने पर इनके कृतियाँ योगदान संघर्ष की कहानियाँ को संग्रह करती है और अपने भावी पीढ़ी को परोसती है। हसपुरा सोशल फोरम ने हमारे शिल्पकार नाम से एक पुस्तिका प्रकाशित की है। जिनका योगदान सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक और राजनीति के क्षेत्र में अहम योगदान रहा है, इनकी चर्चा इस पुस्तिका में की गयी है। इस पुस्तिका का संयोजन करने में आरीफ रिजवी, प्रो. अलखदेव प्रसाद अचल, इमरान, उपेन्द्र कश्यप, अनीश अंकुर, अयाज अहमद खान सहित मुख्य रूप से ग़ालिब साहब का योगदान रहा है।शब्द संयोजन अनुपम राज ने किया तो आवरण सज्जा सीताराम ने।
शाह अब्दुल वाशे
शाहनवाज खां ने शाह अब्दुल वाशे के जीवन चरित्र एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुवे लिखा है कि अगर उनके द्वारा हसपुरा उच्च विद्यालय का अगर नींव नही डाला जाता तो शैक्षिक,सामाजिक ,राजनीतिक और आर्थिक रूप से यह क्षेत्र पिछड़ा रह जाता। इस विद्यालय का ही देन है कि इस क्षेत्र के मंत्री, विधायक, डॉक्टर, इंजीनियर , प्रोफेसर, पत्रकार, साहित्यकार एवं आलाधिकारी बनकर इस क्षेत्र का नाम देश विदेश में रौशन कर रहे है। इस क्षेत्र के रघुनाथपुर ग्राम निवासी जाकिर खां आजाद हिन्द फ़ौज में भर्ती हो गए थे। घर वाले लोगो को पता नही था।घर वाले यही समझे की उनकी कही मृत्यु या हत्या हो गयी। उनकी पत्नी विधवा की तरह उजली साड़ी पहनने लगी और चूड़ी तोड़ दी, सिंदूर त्याग दी। लम्बे अर्से के बाद जब वे गांव लौटे और आजाद हिंद फौज की बाते बतायी तो लोग स्तब्ध रह गए। इनके सम्बन्ध में इमरान ने विस्तृत रूप से चर्चा की है।
डॉ अजीज अहमद रिजवी
डॉक्टर नही मसीहा शीर्षक से शम्भूशरण ने डॉ अजीज अहमद रिजवी के सम्बन्ध में लिखा है कि वे ग़रीबो के मसीहा थे। वे गरीब जरूरतमंद लोगो का तो मुफ्त इलाज करते ही थे।बहुत सारे ऐसे छात्र थे जो विद्यालय में फ़ीस चुकाने में असमर्थ थे। उन छात्रों को फ़ीस देते थे।जिनकी बेटी की शादी पैसे के अभाव में नही होती थी।वैसे लोगो को मदद कर शादी करवाते थे। डॉक्टर साहब के पास मरीजो की इतनी भीड़ होती थी कि अगर वो रुपया संजोकर रखते तो इस क्षेत्र के सबसे अमीर ब्यक्ति होते। उनके मृत्यु के बाद उनके पास महज दो-तीन हजार रूपये ही थे। सामाजिक कार्यो में वे बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे। आज भी इस क्षेत्र में वैसे लोग है जो डॉक्टर रिजवी को भगवान मानते है। उनके इलाज की वजह से वे आज भी जिन्दा है।
रामरूप मेहता
अनीश अंकुर ने इस क्षेत्र के समाजवादी आंदोलन के प्रणेता रामरूप मेहता के जीवन पर विस्तार से प्रकाश डालते हुवे लिखा है कि मेहता जी अन्याय,शोषण और जुल्म के खिलाफ जीवनपर्यंत संघर्ष करते रहे।उनके चहेतों ने उनके जन्मदिन पर हसपुरा उच्च विद्यालय के खेल मैदान में प्रति वर्ष दो जनवरी को जन महोत्सव सह फुलबाल मैच का आयोजन करते है।इस अवसर पर कला, खेल, पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में अमूल्य योगदान देने वाले लोगो को प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह एवं शॉल देकर सम्मानित किया जाता है।
रामनरेश सिह, रामबिलास सिंह
उपेंद्र कश्यप ने स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़ चढ़कर भाग लेने वाले रामनरेश सिह के सम्बन्ध में लिखा है कि वे आंदोलन के दौरान जेल भी गये।जेल से भागे भी  इसकी वजह से इनपर कई मुकदमे चले फल यह हुवा की आजादी के बाद ही ये जेल से रिहा हुवे। इनके संघर्ष को देखकर दाउदनगर क्षेत्र के लोगो ने इन्हें विधायक बनाया और तत्कालीन राज्य सरकार ने इन्हें मंत्री के पद से सुशोभित किया।
सामाजिक न्याय का योद्धा रामबिलास सिंह लोहिया से प्रभावित राजनैतिक चेतना से लैस एक समाजवादी नेता थे। उनके ब्यक्तित्व और संघर्ष से प्रभावित होकर दाउदनगर विधानसभा से कई बार विधायक बने और बिहार सरकार में पुलिस मंत्री, कारा मंत्री, सहाय एवं पुनर्वास मंत्री जैसे पदों को सुशोभित किया।
रामशरण यादव, महबुब अंसारी 
अलखदेव प्रसाद अचल ने हाशिये से बना हाकिम शीर्षक से का रामशरण यादव जिन्होंने शिक्षक की नॉकरी से अपने संघर्ष के बल पर लाल झंडा थामे गोह विधानसभा क्षेत्र से पाँच बार विधायक बने। किसान मजदूरों के हक के लिए वो जीवनपर्यंत संघर्ष करते रहे। सादा जीवन ऊंच विचार के धनी ब्यक्तित्व के वे मालिक थे।
एक वामपंथी फकीर शीर्षक से का महबुब अंसारी के सम्बन्ध में अचल जी ने लिखा है कि इस कम्युनिस्ट नेता ने घूम-घूम कर लोगों के बीच कम्युनिस्ट विचारधारा का प्रचार किया।
तस्वीर व रिपोर्ट : शम्भूशरण सत्यार्थी
आखिर किशोर ने क्यों की आत्महत्या ?
दाउदनगर (औरंगाबाद) के संसा टोला रामेश्वर बिगहा के निवासी बाल्मिकी गिरी ने  आत्महत्या कर ली। पुलिस अनुसंधान से ही सामने आ सकेगा कि आखिर इस किशोर ने आत्महत्या क्यों की? क्या सचमुच ताना मारने के कारण ही उसने आत्महत्या करने का फैसला किया या इसके पीछे और कोई वजह थी?
बताया जाता है कि मैट्रिक की गणित की परीक्षा में वह कदाचार के आरोप में निष्काषित किया गया था और किसी ने ताना मारा था कि एक साल बर्बाद कर दिया। साथ ही रुपए भी खर्च हुआ। सवाल यह है कि किसी ने क्यों ताना मारा था? अगर वास्तव में एक निर्धन परिवार के किशोर उम्र वाल्मिकी गिरि ने ताना मारने के कारण ही आत्महत्या की तो यह गंभीर सामाजिक चिंता का विषय का है और समाजशाएत्रीय अध्ययन का विषय भी।
पाँच भाई, तीन बहन,  पिता बटाईदार किसान
बाल्मिकी के पिता देवदीप गिरी बटाईदार किसान हैं। वे दो बीघा जमीन जोतते हैं। यह उनके भाई ने बताया। इनके अनुसार बाल्मिकी के पांच भाई और तीन बहन हैं। एक भाई और एक बहन की शादी हो चुकी है। बटाई की खेती ही आजीविका का मुख्य साधन है।
ट्रेन से गया कट 
उसके चाचा जितेंद्र गिरी के अनुसार अचानक शनिवार को शाम 5 बजे की शाम वह घर से निकला और फिर नहीं लौटा। उसने सासाराम में ट्रेन से कटकर आत्महत्या कर ली। किसी ने उसे उलाहना नहीं दी, ताना नहीं मारा। बाल्मिकी गिरी मैट्रिक पास करना चाहता था ताकि अपना ड्राइवरी लाइसेंस बनवा सके। उसे स्कार्पियो चलाने का शौक था। चाचा ने उसे समझाया था कि डीएल के लिए मैट्रिक पास होना आवश्यक नहीं है।
शव नहीं ले गए परिजन, डेहरी में किया दाह-संस्कार
बाल्मिकी गिरी के शव को देखने का मौका उसके महिला रिश्तेदारों और गांव के परिचितों को नहीं मिला। उसके परिजन उसके शव को गांव नहीं ले गए। डेहरी में ही सोन पुल के नीचे उसका दाह संस्कार कर दिया गया। उसके चाचा जितेंद्र गिरी ने बताया कि यह बात सासाराम में प्रशासन को भी बता दी गई थी। कहा कि घर ले जाने पर महिला रिश्तेदारों की हालत खराब हो जाती। सबको संभालना मुश्किल होता। पिता देवदीप गिरी, चाचा नंदकिशोर गिरी एवं जितेंद्र गिरी समेत डेढ़ दर्जन पुरुष रिश्तेदार अंतिम संस्कार में शामिल हुए।
तस्वीर व रिपोर्ट : उपेन्द्र कश्यप

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