मो. इलियास हुसैन : जनतंत्र को रखा ठेंगे पर, सबको समझा रियाया

पटना/डेहरी-आन-सोन/सासाराम (विशेष प्रतिनिधि, सोनमाटी टीम)। बिहार में शासन चलाने के सामंतशाही अंदाज का करीब दो दशक पुराना एक मंजर देखिए। अवसर रोहतास जिला मुख्यालय सासाराम में प्रेक्षागृह के शिलान्यास का था। उस शाम सर्किट हाउस में हुजूर का अघोषित दरबार लगा। सासाराम के अनुमंडल पदाधिकारी तलब किए गए। जैसाकि चश्मदीदों ने बताया था, दरबारियों की भीड़ में हाजिर हुए एसडीओ को कुर्सी भी मयस्सर नहींहुई। सवाल दागा गया, क्या मेरे विरोध में नारा लगाने की साजिश का पता नहीं था? एसडीएम का जवाब था, सर मैंने डीएम साहब को बता दिया था। कड़क आवाज गूंजी, अगर (पदक्रम में) डीएम बाप हैं तो मैं ग्रैंड फादर हूं। एसडीओ किसने बनवाया? सर, आपने। तो फिर अपना बोरिया-बिस्तर बांध लो। वह हुजूर-ए-सरकार थे इलियास हुसैन, जो पथ निर्माण मंत्री थे और नारा लगाने का इंतजाम करने के आरोपी थे सांसद छेदी पासवान, जिनका तब यह कहना था कि उन्होंने जनता से जुड़े मुद्दे पर जनतांत्रिक तरीके से आवाज उठाई और किसी के विरोध या पक्ष की बात नहीं।
इलियास हुसैन हैं जेल में, मगर आज कहां है चाटुकार, अंधभक्ति दिखाने वाले वे लोग?
वह एक समय था। इलियास हुसैन की हैसियत थी कि बिना उनकी मर्जी के रोहतास में डीएम-एसपी का पदस्थापन नहीं होता था। उस वक्त वह पटना से रोहतास के दौरे पर आते थे तो उनके स्वागत में सासाराम और डेहरी-आन-सोन से दर्जनों गाडिय़ों में भरकर उनके चाटुकार लोग जिले की सीमा (मुख्यत: शिवपुर) के पास उन्हें फूल-माला से लादते थे। पूरी दबंगता से जनतंत्र को ठेंगे पर रखने का दुस्साहस रखने वाले और जनता को अपनी जमींदारी मानने वाले इलियास हुसैन चाटुकारों के बीच रहना पसंद करते थे और कहा करते थे कि हम-लोग तो राज करने के लिए पैदा हुए हैं। उन्हीं हुजूरे-ए-सरकार को अदालत ने ठग-जालसाज होने की मुहर लगा कर जेल भेज दिया है। हालांकि सवाल उठाया जा सकता है कि वे चाटुकार, अंधभक्ति दिखाने वाले लोग आज कहां हैं?
माई समीकरण में कुख्यात अभियुक्त को प्राथमिकता, जरूरतमंद नामचीन शायर नजरअंदाज
रोहतास जिले में डिहरी विधानसभा क्षेत्र भी उप प्रधानमंत्री जगजीवन राम के सासाराम संसदीय क्षेत्र की तरह या अब्दुल क्यूम अंसारी जैसे राष्ट्रवादी नेता के लिए एक तरह से अजेय रहा था। इलियास हुसैन की चाहत किसी भी तरह डिहरी विधानसभा क्षेत्र पर आजीवन वर्चस्व बनाए रखने की थी। एक हद तक येन-केन प्रकारेण मुस्लिम-यादव फैक्टर को उन्होंने साधा भी। इसका उदाहरण दारोगा यादव हत्याकांड है। हत्या, डाका व अन्य संगीन अपराध के कुख्यात अभियुक्त बसएजेंट दारोगा यादव की हत्या 1990 में एक बस मालिक से रंगदारी (एजेंटी) मांगने के कारण हुई थी। इलियास हुसैन हवाई जहाज से डेहरी-आन-सोन पहुंचे और दारोगा यादव के शव पर फूल चढ़ाकर उन्हें शहीद की संज्ञा दी। जबकि सड़क दुर्घटना में घायल शहर के नामचीन जरूरतमंद शायर मीर हसनैन मुश्किल के लिए मदद की बुद्धिजीवियों की अपील उन तक नहीं पहुंच पाई। शायर की मौत अभियुक्त दारोगा यादव से पहले हुई थी, मगर मजलूम शायर परिवार की सुध उन्होंने डेहरी-आन-सोन पहुंचने के बावजूद नहींली। आखिर ऐसा क्यों? यह सवाल डिहरी विधानसभा क्षेत्र के लोगों से भी मुखातिब है।


देखते-देखते खड़ा हुआ आलीशान मकान, लगा 63 केवीए का जेनरेटर
इलियास हुसैन के मंत्री बनने के बाद उनके रवैया से डिहरी विधानसभा क्षेत्र और रोहतास जिले में पार्टी में अंदरूनी गुटबंदी उभरने लगी। इसीलिए मार्च 1991 में उन्होंंने शिलान्यासी दौरा किया तो बांक नहर पुल (डिहरी प्रखंड) के शिलान्यास के वक्त काले झंडे दिखाए गए। मंत्री बनते ही मुकेरी परिवार के मोहम्मद फारूकी हुसैन के इस बेटे के पैतृक गांव मुंजी (काराकाट थाना) और पटना (सगुना मोड़) में आलाशीन मकान खड़े हो गए। तब मुंजी के भवन में 63 केवीए का जेनरेटर लगाया गया था। हुसैन परिवार ने मुंजी व पड़ोस के गांव, पटना व बिहार से बाहर भी तब कई भूखंड खरीदे थे। यह भी संदेह किया जाता है कि अलकतरा घोटाला की रकम असम में भी छुपाई गई, जहां इलियास हुसैन की दूसरी बीवी सलमा खातून के परिवार का विचित्र तरह का कारोबार था। सलमा खातून हिन्दू परिवार की हैं, जिन्होंने शादी के बाद घरेलू नाम (अनीता हजारिका) बदल लिया। इलियास हुसैन की पहली बीवी दाउदनगर (औरंगाबाद) की हैं।
छेदी पासवान से पहले से थी वर्चस्व की तनातनी, कांति सिंह के उभार से हुए असहज
बतौर मंत्री सत्ता की कमान संभालने के पांच साल बीतते-बीतते शहंशाह-हुक्मरान दिखने की अतृप्त कामनावश वह अलोकतांत्रिक तानाशाह बन गए थे। तब उनके रोहतास जिले के एकछत्र शहंशाह होने में डा. कांति सिंह ने सेन्ध लगा दी थी। डेहरी-आन-सोन की कांति सिंह 1995 में पीरो विधानसभा क्षेत्र से विधायक बनीं तो इलियास हुसैन असहज हो गए। वह महसूस करने लगे कि पार्टी में उनका कद पहले जैसा उतना ऊंचा नहीं रह गया। हुआ भी ऐसा। 1996 में काराकाट संसदीय क्षेत्र से सांसद रहे रामप्रसाद कुशवाहा के बजाय कांति सिंह को टिकट मिला। कांति सिंह जीतकर केेंद्र सरकार में कोयला राज्यमंत्री बनीं। कांति सिंह के अवतरण से पहले से ही इलियास हुसैन का सासंद छेदी पासवान से पार्टी और जिले की स्थानीय राजनीति में वर्चस्व की जंग जगजाहिर हो चुकी थी। इस सियासी जंग (अंतरसंघर्ष) की वजह से पार्टी में वक्र समीकरणबन गया था। तब मैंने (कृष्ण किसलय) ने अधिकृत जिला संवाददाता (रोहतास-कैमूर) के रूप में नवभारत टाइम्स (पटना, दिल्ली) में विश्लेषणात्मक रिपोर्ट स्तंभ (जिले की राजनीति) में सियासत के इस साइकोलाजिकल समीकरण पर लिखा था।
कांति सिंह के राजनीतिक अवतरण से असहज इलियास हुसैन नहीं प्रकट कर पाते थे अपनी कुंठा
इलियास हुसैन की आंतरिक इच्छा के विरुद्ध कांति सिंह का राजनीतिक अवतरण, जिले में उनके बढ़ते कद और डिहरी विधानसभा क्षेत्र में चुनावी जीत के लिए यादव वोट बैंक का बड़ा महत्व होने के कारण इलियास हुसैन अपनी कुंठा प्रकट नहीं कर पाते थे। कांति सिंह के मिलने-जुलने के अनकूल सरल रुख और उनके भाई डा. राजेंद्र प्रसाद सिंह के स्थानीय परिचय होने से कांति सिंह से संबंधित स्थानीय खबरें अखबार के पन्नों पर इलियास हुसैन से अधिक जगह पाती थीं। इससे इलियास हुसैन को लगता था कि स्थानीय पत्रकार उन्हें तुलनात्मक तौर पर अलोकप्रिय बनाने की मुहिम में हैं। यही वजह थी, 1995 में उनके प्रिय अफसर मो. सलाहुद्दीन खां ने राजकीय मान्यताप्राप्त संवाददाता होने के कारण चुनाव आयोग से जारी अनुमति-पत्र के बावजूद गड़बड़ी लिक होने के भयवश कृष्ण किसलय (मुझे) को मतगणनास्थल के भीतर जाने से रोकने की कोशिश यह कहकर की कि नवभारत टाइम्स, पटना तो बंद हो चुका।
जब कांति सिंह को जाना पड़ा इलियास हुसैन के आवास तक
1998 में इलियास हुसैन पार्टी में टिकट बांटने वाली कमेटी में थे। बिक्रमगंज से कांति सिंह के नाम की घोषणा अंतिम समय में रुक गई। कांति सिंह मायके (डिहरी-आन-सोन) में थीं। तब तक इलियास हुसैन के सामने होने या याचक की स्थिति से बचती रहने वाली कांति सिंह को इलियास हुसैन के आवास पर जाना पड़ा। तब रूका हुआ उनका टिकट उनके हाथ में मिला। इलियास हुसैन को यह बात खटकती थी कि स्थानीय पत्रकार उन्हें उतना तरजीह क्यों नहीं देते, जबकि पदक्रम में मुफस्सिल के पत्रकारों से बड़ा होने के बावजूद राजधानी के पत्रकार महत्व देते हैं? इस संबंध में यह नहीं माना जा सकता कि उन्हें इस बात का पता नहीं होगा कि अपने बीट (रिपोर्टिंग के विभाग) की खबरों के लिए वरिष्ठ संवाददाता के लिए संबंधित मंत्री और सीनियर अफसर से नियमित संपर्क में रहना रूटीन कार्य है। जबकि नौकरी नहीं करने वाले मुफ्फसिल रिपोर्टर के लिए अखबार के पन्नों पर तब स्पेस (जगह) के अभाव की वजह से हर खबर भेजने की बाध्यता नहींथी।
सुरेश बजाज से कहा था, हटाओ कृष्ण किसलय को
मैं (कृष्ण किसलय) वर्ष 1994-९८ की अवधि में झारखंड के डालटनगंज, रांची से प्रकाशित क्षेत्रीय हिन्दी दैनिक राष्ट्रीय नवीन मेल का बिहार के सोनघाटी अंचल (चार जिले रोहतास, औरंगाबाद, कैमूर, भोजपुर) का ब्यूरो प्रमुख था। राष्ट्रीय नवीन मेल के वार्षिक समारोह (1996) में इसके मालिक-प्रकाशक सुरेश बजाज ने मुझसे कहा, इलियास हुसैन का कहना है, कृष्ण किसलय को हटा दो, क्या हुसैन ने बहुत पैसा कमा लिया है? मैंने पूछा, मुझे क्या करना है, यह बताइए, दरबारी स्वभाव का नहीं हूं कि अकारण हाजिरी लगाऊं। सुरेश बजाज का उत्तर था, अपना काम करो।

जनमानस में प्रचलित वह काव्यात्मक वक्रोक्ति, जो दो दशक बाद सिद्ध हुई
उन दिनों जनतंत्र को ठेंगे पर रखने की अपनी मानसिकता और आम लोगों को हथजोड़ रियाया समझने के सामंती चरित्र के कारण इलियास हुसैन की छवि कई तरीकों से उकेरी जाने लगी थी। बीती सदी के आखिरी में भोजपुरी भाषा की यह काव्यात्मक वक्रोक्ति डेहरी-आन-सोन और पास-पड़ोस के सार्वजनिक मंचों से पटना तक के राजनीतिक गलियारों में भी चलन-कहन में आ चुकी थी- ‘ए भईया, तोहार पेट ह कि ड्राम, पत्थर खा ल, अलकतरा पीये ल, तू कइसे जिये ल, ए भईया…Ó। मैंने (कृष्ण किसलय) इस पंक्ति को पहली बार पत्रकार-पुत्र मधुर कुमार श्रीवास्तव द्वारा तिलौथू (रोहतास) में जमींदार बाबू राधाप्रसाद सिन्हा स्मृति कवि सम्मेलन के मंच पर 1998 में सुनी थी।

(आगे भी जारी)
नोट : यह प्रसंग मेरी लेखनाधीन पुस्तक (समय लिखेगा इतिहास) का भी हिस्सा है, जिसमें स्थानीय (डेहरी-आन-सोन, रोहतास, औरंगाबाद) के साथ मेरे कार्य-स्थलों देहरादून (उत्तराखंड), वाराणसी. आगरा (उत्तर प्रदेश) और चंहीगढ़ (पंजाब) अंत में मेरठ (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) से संबंधित पत्रकारिता-लेखन के अनुभवों-परिस्थितियों की सविस्तार चर्चाएं होंगी।)

विशेष रिपोर्ट : कृष्ण किसलय (समूह संपादक, सोनमाटी मीडिया समूह),

तस्वीर : अखिलेश कुमार

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