
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी दो दिनों 16 और 17 अगस्त को मनायी जाएगी। उदयकालिक अष्टमी की प्रधानता मानते हुए मुख्य आयोजन 16 अगस्त (शनिवार) की रात को होगा, जिसमें अर्धरात्रि 11:17 बजे चन्द्रोदय के बाद भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य उत्सव संपन्न होगा। हालांकि, रोहिणी नक्षत्र की प्रधानता मानने वाले वैष्णव भक्त 17 अगस्त (रविवार) को जन्मोत्सव एवं नन्दोत्सव मनायेंगे।
शास्त्री जी के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र के द्वितीय चरण में हुआ था और कुलगुरु गर्गाचार्य ने उनका गुप्त नाम वासुदेव रखा था। ग्रामीण क्षेत्रों में जन्माष्टमी पर डोल रखकर सामूहिक जयन्ती मनाने की परंपरा है।
व्रत एवं पूजा विधि
भक्तजन उपवास रखकर सन्ध्या में खीरे को दो भाग में काटकर उसमें शालग्राम या लड्डू गोपाल की प्रतिमा स्थापित करते हैं और मौली से बाँधकर देवस्थल में रखते हैं। पूजा सामग्री में सिंघाड़ा आटे का हलवा, पञ्चमेवा, पंजरी, नाशपाती, माखन-मिश्री, पञ्चामृत, तुलसी दल एवं पुष्प शामिल होते हैं।
रात 12 बजे खीरे से भगवान को निकालकर पञ्चामृत स्नान कराया जाता है, लोहे की चाकू से पीतल की थाली बजाकर जन्मोत्सव की घोषणा की जाती है, बाल गोपाल को पलने में झुलाकर महा आरती व सोहर गीत गाये जाते हैं।
नन्दोत्सव एवं छठी पूजा
अगले दिन सन्ध्या में दधी-हल्दी चढ़ाकर पञ्चमेवा व पंजरी का भोग लगाया जाता है और भक्तों को प्रसाद वितरित किया जाता है। जन्म से छठे दिन विशेष छठी पूजन में भगवान को स्नान, वस्त्राभूषण, नजर उतारना एवं अइपन सजाने की परंपरा निभायी जाती है। चावल के हलवे, गेहूँ के मोहनभोग, पंजरी, हल्दी एवं पञ्चमेवा का नैवेद्य अर्पित कर महाभोग भक्तों में बांटा जाता है।
सनातन संस्कृति का उत्सव
यह उत्सव केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि सत्य सनातन धर्म की संस्कृति और परंपराओं का जीवंत प्रदर्शन भी है।
“नन्द घर आनन्द भयो, जय कन्हैया लाल की… गऊअन चराने आये, जय हो गोपाल की…”
प्रस्तुति : आचार्य पं० लाल मोहन शास्त्री






