सोन घाटी में इतिहास का सफर : नागवंशियों के रोहतागढ़ से मुगलवंशियों के ताजमहल तक

वाट्सएप पर झारखंड के अध्यापक, लेखक और स्थानीय इतिहास के अन्वेषणकर्ता अंगद किशोर (जपला, हुसैनाबाद) ने टिप्पणी की है- बहुत सुन्दर आलेख।इनकी टिप्पणी के बाद याद आ गया दो दशक पहले का वह समय जब खोज की धुन सवार हुई।
याद आया कि बभनवदेवरी गांव से कूकही नदी के किनारे ढाई घंटा पैदल चलकर सोनघाटी पुरातत्व परिषद का दल कबराकलां पहुंचा था। शालिग्राम चौधरी के घर दाल-भात-भुंजिया खाने के बाद चौधरी जी की ही नाव पर सवार होकर परिषद का दल सोन और कोयल नदी के संगम के पानी को पारकर कबराकलां टिले तक गया था। उस दल में पुलिस इंस्पेक्टर डा. रामकिंकर सिन्हा (अध्यक्ष), उद्यमी तापस डे (सचिव), जपला के थानाध्ययक्ष किरण कुमार, अंगद किशोर, उद्यमी शेख सरफुद्दीन के साथ परिषद के सोन-पश्चिम क्षेत्र (अब बिहार) के संयोजक मैं (कृष्ण किसलय) और अन्य
शामिल थे। तब उस टिले को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीक्षक मोहम्मद केके की ओर से प्रेस विज्ञप्ति जारी कर 3500 साल पुराना बताया गया था। हर्ष है कि दो दशक बाद अब वहां भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से खुदाई चल रही है।
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= कृष्ण किसलय =

भारत के पर्वतीय गढ़ों में श्रेष्ठता प्राप्त बिहार के विश्वप्रसिद्ध रोहतासगढ़ पर वनवासी कल्याण आश्रम द्वारा इस वर्ष भी आदिवासी सम्मिलन कुंभ के रूप में रोहतासगढ़ तीर्थ महोत्सव का आयोजन (18, 19 फरवरी) को किया गया। आश्रम के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगदेव राम उरांव के अनुसार, रोहतासगढ़ यानी कैमूर से जुड़े मूल आदिवासियों के जातियों-उपजातियों (कोरवां, उरांव, नाग, चेरो, खरवार आदि) में बंटें 60 लाख वंशधर अंडमान-निकोबार, उड़ीसा, झारखंड, बिहार, असम, त्रिपुरा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश के अलावा विदेशों (नेपाल, बांग्लादेश, मारिशस आदि) में रहते हैं।

बिन्ध्य आदिवासियों की आदिम मातृदेवी और कैमूर बिन्ध्य पर्वतश्रृंखला की एक कडी

बेशक, भारत के दक्षिण बिहार में स्थित सोन नद और कैमूर पठार पर स्थित रोहतासगढ़ का इलाका प्राचीन इतिहास में विश्वविश्रुत और आाधुनिक इतिहास में भी इसका स्थान भू-विज्ञान, जीव-विज्ञान और नृ-विज्ञान की दृष्टि से वैश्विक आकर्षण का क्षेत्र बना हुआ है। कैमूर पठार बिन्ध्यपर्वत श्रृंखला की एक कड़ी है, जिसकी पूर्वी-उत्तरी छोर रोहतास गढ़ और डेहरी-आन-सोन (गोइड़ला खोह महादेव) में आकर खत्म होती है। बिन्ध्य आदिवासियों की आदिम मातृदेवी हैं। सोन के 784 किलोमीटर लंबे तट पर बसा डेहरी-आन-सोन सबसे बड़ा शहर है और इसके तट पर ही दीवार की तरह सीधा खड़ा रोहतासगढ़ पठार की ऊंचाई समुद्र तल से 2000 फीट से अधिक है। सोन नद की घाटी में पिछली सदी के आखिरी दशक में हुई नई खोज ने जीव विज्ञान के इतिहास को चुनौती दे रखी है, जिससे जीव विज्ञान के स्थापित इतिहास को करोड़ों साल पीछे ले जाने की गंभीर वैश्विक बौद्धिक बहस दुनिया में जारी है। सोन घाटी दुनिया के उन स्थलों में है, जहां आधुनिक आदमी (होमो सैपियन) हिमयुग खत्म होने के बाद कैमूर की गुफाओं से नंग-धड़ंग बाहर निकलता है और तन ढंकने की तमीज सीखता है। कैमूर की ढलान में आकर वह आपसी संपर्क के लिए अपनी वाणी (आरंभिक बोली) को विस्तार देता है, आरंभिक घर (झोंपड़ी) बनाना, खेती करना सीखता है और हजारों सालों के उपक्रमों के जरिये परिवार बनाकर हजारों सालों की यायावर जीवनशैली का त्यागकर स्थावर जीवनशैली वाली नई सभ्यता की नींव रखता है।

इधर दक्षिण में ताकतवर चंद्रवंश और उधर सुदूर उत्तर में शक्तिशाली सूर्यवंश

ऋग्वैदिक काल के पूर्वाद्ध तक सोन नद की घाटी में उस पार पूरब-दक्षिण में झारखंड के गढ़वा-पलामू जिलों का अंचल हो या इस पार पश्चिम-दक्षिण में बिहार के रोहतास-कैमूर जिलों का अंचल हो, में आर्य संस्कृति यानी ब्राह्म्ïाण संस्कृति की दस्तक नहींहुई थी। शतपथ ब्राह्‍मण के अनुसार, इस क्षेत्र के गंगा नदी तक विस्तृत अति सघन जंगल वाले मैदानी भाग के गंगा उस पार उत्तर में अपने जत्थे के साथ सरस्वती नदी से चलकर आवास, खेती, पशुपालन आदि के लिए जंगल को जलाते हुए पहुंचने वाला जो पहला आर्य-जत्था गंगा से संगम करने वाले सदानीरा (गंडक) नदी तक पहुंचा था, उसके प्रमुख विदेध माधव और पुरोहित गौतम राहूगण थे। यह सोनघाटी, कैमूर बिन्ध्यपर्वत से ही हजारों साल पहले उत्तरापथ गए आदिमानवों की नई सभ्यता-संस्कृति से लैस होकर वापसी थी। जबकि सभ्यता के अति आरंभ में दक्षिण में महासागर के सिंहल द्वीप (श्रीलंका) से दक्षिण भारत, सोनघाटी (कैमूर, सतपुड़ा) से लेकर पर्वतराज हिमालय की दक्षिणी तलहटी तक और उससे भी आगे मोहनजोदड़ों हड़प्पा तक का विस्तृत भारतीय उपमहाद्वीप भूभाग शैव संस्कृति से आप्लावित था। दक्षिण भारत में शिव उपासक ताकतवर चंद्रवंशियों का उदय हुआ, जिसके वंशधर रावण, जरासंध आदि थे। उधर, हिमालय के उस पार उत्तरी छोर पर अफगानिस्तान की सीमा में शक्तिशाली सूर्यवंश का उदय हुआ, जिसने अपने को आर्य कहा और अपनी सत्ता, वर्चस्व का विस्तार संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप भू-भाग पर और इससे भी आगे इराक, ईरान, यूरोप तक किया।

शेरशाह काल में मुस्लिम सत्ता केेंद्र में बदला रोहतासगढ़ का अनार्य हिन्दू सत्ता केेंद्र

ज्ञात इतिहास के आईने में देखा जाए तो मौर्य काल के समय तक भारत की उत्तर-पश्चिम सीमा से पाटलिपुत्र (पटना) के आगे श्रीलंका तक पैदल मार्ग तीन हजार किलोमीटर लंबा था, जो मौजूदा रोहतासगढ़ (तब रोहित वस्तु) की कैमूर पहाड़ से होकर गुजरता था। इसके नीचे सोन नदी घाटी से गंगा के मैदान तक इतना सघन जंगल था कि 19वीं सदी के आरंभ तक पैदल प्रवेश और यात्रा बेहद कठिन थी। रोहतासगढ़ के अति प्राचीन शैवसंस्कृति से ही निकली एक धारा नागपूजकों की और फिर दूसरी धारा बौद्धधर्मियों की थी। हालांकि कैमूर पर्वत पर और इसकी तलहटी में सोन घाटी की मैदानी भूमि पर अनार्यों की अनेक धाराएं भी आती-जाती रहीं और हजारों सालों तक कब्जा-विस्थापन के उत्कर्ष-अपकर्ष का क्रम जारी रहा। जैसाकि उनके लोकगीतों से पता चलता है कि आदिवासियों की प्राचीन धाराएं छत्तीसगढ़ के सुरगुजा क्षेत्र से नंदनगढ़, पिपरीगढ़, हरदीनगर से भी आई थीं और सोनभद्र, चुनारगढ़, मिर्जापुर होते हुए उत्तर भारत की ओर गई थीं। ईसा की पहली सदी में रोहतासगढ़ से ही अर्थात बड़े नागपुर से विस्थापित होने के बाद सोन नद पार कर नागवंशियों ने पूरब-उत्तर में अपने राजा फणीमुक्ता राय का राज्याभिषेक छोटा नागपुर बसाकर किया था। रोहतासगढ़ पर अनार्य बौद्ध संस्कृति के विस्थापन और ब्राह्म्ïाण संस्कृति के वर्चस्व का प्रथम ऐतिहासिक साक्ष्य गौड़ (बंगाल) के हिन्दू शासक शशांक का है।ï मगर हजार साल पहले तुर्कों के आगमन के बाद उथल-पुथल ज्यादा तेजी से हुआ और शेरशाह काल में अनार्य हिन्दू सत्ता केेंद्र पूरी तरह मुस्लिम सत्ता केेंद्र में बदल गया, जब 1939 में शेरशाह ने हिन्दू राजा से रोहतासगढ़ को हथिया लिया।

रोहतासगढ़ पर सालों तक शरण लिया था शाहजहां और मुमताज ने

आज यह बहुत कम लोगों को पता है कि रोहतासगढ़ पर मुगल सल्तनत के एक बादशाह शाहजहां को अपने प्रिय बेगम मुमताज महल के साथ सालों शरण लेनी पड़ी थी। यहींशाहजहां के विद्वान बेटे दारा शिकोह ने जन्म लिया था। रोहतासगढ़ के नीचे सोन किनारे का गांव दारानगर दारा शिकोह के नाम पर और सासाराम के निकट खुर्माबाद शाहजहां के छोटे बेटे मुराद बख्श के नाम पर बसाया गया। शाहजहां तब बादशाह नहींबना था और बतौर शाहजादा उसका नाम खुर्रम था। खुर्रम ने बादशाह जहांगीर और अपनी मां बेगम नूरजहां से विद्रोह किया था। अकबर के मुख्य सेनापति मानसिंह ने भी यहां अपना स्थाई आवास, सत्ता केेंद्र बनाया था और आज के बांग्लादेश (पूवी बंगाल), पश्चिम बंगााल, झारखंड और बिहार पर बतौर दिल्ली सल्तनत के सूबेदार शासन किया था। दरअसल, सोन नद के इस अंचल का ज्ञात और ज्ञात-पूर्व का आदिवासियों का, अनार्यों का, अनार्य-आर्य संघर्ष का और मुस्लिम काल से अंग्रेजी काल की सत्ता-विरोध का इतिहास इतना विराट, इतना महत्वपूर्ण है कि शंकर (अब, सासाराम के संपादक) की पंक्तियां याद आती हैं- अरी क्रांति की धरती, सुनकर तेरी गौरव-गाथा। उठ जाते हैं स्वयं हाथ दो, झुक जाता है माथा।।

(तस्वीर संयोजन : भूपेंद्रनारायण सिंह, निशांत राज)

-0-  कृष्ण किसलय, सचिव, सोनघाटी पुरातत्व परिषद

सोनमाटी-प्रेस गली, जोड़ा मंंदिर, न्यूएरिया,

पो. डालमियानगर-821305, जिला रोहतास (बिहार)

फोन 9708778136

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