नवरात्र केवल देवी की आराधना का पर्व नहीं, बल्कि नारी की गरिमा, समानता और स्वतंत्रता पर आत्ममंथन का अवसर भी है। माँ दुर्गा की शक्ति के प्रति हमारी श्रद्धा तभी पूर्ण होगी, जब बेटियों को समान अवसर, महिलाओं को सम्मान और प्रत्येक स्त्री को अपने जीवन के निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलेगी। आस्था और सामाजिक सरोकारों को जोड़ते इसी विचारपरक आलेख में प्रस्तुत है— निशांत राज, संपादक, सोनमाटी की कलम से ‘नवरात्र : देवी की आराधना से नारी के सम्मान तक’।

शारदीय नवरात्र भारतीय संस्कृति का ऐसा पर्व है, जिसमें भक्ति, आस्था और शक्ति की आराधना एक साथ दिखाई देती है। घरों में कलश स्थापित होते हैं, मंदिरों में घंटियाँ गूँजती हैं और माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। कहीं गरबा और डांडिया की धूम होती है, तो कहीं दुर्गापूजा के पंडालों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। इन सबके केंद्र में एक ही भाव है—शक्ति के प्रति समर्पण और बुराई पर अच्छाई की विजय।
लेकिन इस उत्सव के बीच एक प्रश्न हमारे सामने खड़ा होता है—क्या देवी की आराधना करने वाला समाज अपनी बेटियों और महिलाओं को भी वही सम्मान देता है, जो वह देवी को देता है? क्या माँ दुर्गा को शक्ति का स्वरूप मानने वाला समाज अपनी बेटियों को शिक्षा, स्वतंत्रता और अपने सपनों को पूरा करने के समान अवसर दे पाता है? यह प्रश्न किसी की आस्था पर चोट करने के लिए नहीं, बल्कि उसके वास्तविक अर्थ को समझने के लिए आवश्यक है।
देवी में शक्ति, स्त्री में संकोच क्यों?
भारतीय परंपरा में नारी को सृजन, करुणा, धैर्य और शक्ति का प्रतीक माना गया है। माँ दुर्गा अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करती हैं, माँ सरस्वती ज्ञान की अधिष्ठात्री हैं और माँ लक्ष्मी समृद्धि की प्रतीक हैं। इन स्वरूपों के माध्यम से हमारी सांस्कृतिक चेतना स्त्री की विविध क्षमताओं को प्रतिष्ठित करती है। फिर भी सामाजिक व्यवहार में स्त्री की स्वतंत्रता को लेकर अनेक संकोच दिखाई देते हैं।
एक ओर कन्या पूजन की परंपरा है, तो दूसरी ओर कुछ परिवारों में बेटियों की शिक्षा, रोजगार, विवाह और जीवन से जुड़े निर्णयों में उनकी इच्छाओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता। कई बार उनकी प्रतिभा को सामाजिक रूढ़ियों और पारिवारिक प्रतिष्ठा की सीमाओं में बाँध दिया जाता है।
यह विरोधाभास विचारणीय है। जिस स्त्री-शक्ति की हम नौ दिनों तक आराधना करते हैं, उसी शक्ति को अपने जीवन में स्वतंत्र रूप से विकसित होने देने में हम क्यों हिचकते हैं?
नारी का सम्मान केवल प्रतीक नहीं, व्यवहार बने
नारी-सम्मान का अर्थ केवल उसे देवी कहना या विशेष अवसरों पर उसकी पूजा करना नहीं है। सम्मान का वास्तविक अर्थ है—उसकी गरिमा स्वीकार करना, उसकी बात सुनना, उसके निर्णयों का आदर करना और उसे समान अवसर उपलब्ध कराना।
बेटी को अच्छी शिक्षा देना, उसकी रुचियों और क्षमताओं को पहचानना, उसे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रोत्साहित करना तथा उसके जीवन से जुड़े निर्णयों में उसकी सहमति को महत्व देना नारी-सम्मान के ठोस उदाहरण हैं। इसी तरह महिलाओं के श्रम को महत्व देना, घरेलू जिम्मेदारियों को साझा करना और कार्यस्थल पर समानता का व्यवहार करना भी आवश्यक है।
स्त्री का सम्मान केवल पिता, भाई या पति की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। परिवार से लेकर विद्यालय, कार्यालय और सार्वजनिक जीवन तक ऐसा वातावरण बनाना होगा, जहाँ किसी महिला को अपनी योग्यता सिद्ध करने के लिए अतिरिक्त संघर्ष न करना पड़े।
शक्ति का अर्थ अन्याय सहना नहीं
अक्सर स्त्री की महानता को उसके त्याग, सहनशीलता और दूसरों के लिए स्वयं को समर्पित कर देने से जोड़ दिया जाता है। त्याग और संवेदनशीलता मानवीय गुण हैं, लेकिन किसी महिला से हर परिस्थिति में चुप रहने, अन्याय सहने या अपनी इच्छाओं का दमन करने की अपेक्षा करना उसके सम्मान के अनुकूल नहीं है।
माँ दुर्गा का स्वरूप हमें यह भी सिखाता है कि शक्ति का अर्थ अन्याय के सामने झुकना नहीं, बल्कि उसके विरुद्ध खड़े होने का साहस है। स्त्री की शक्ति उसके आत्मविश्वास, ज्ञान, विवेक और निर्णय क्षमता में भी प्रकट होती है।
जब कोई लड़की अपनी बात रखती है, अनुचित व्यवहार का विरोध करती है या अपने जीवन के लिए अलग राह चुनती है, तो उसे विद्रोही कहकर खारिज करने के बजाय उसकी बात समझनी चाहिए। स्वतंत्र विचार और आत्मनिर्णय का अधिकार हर व्यक्ति की गरिमा का अभिन्न हिस्सा है।
बदलता समाज और अधूरी चुनौती
आज शिक्षा, विज्ञान, खेल, राजनीति, प्रशासन, साहित्य और उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में महिलाएँ अपनी प्रतिभा का परिचय दे रही हैं। उन्होंने अनेक रूढ़ धारणाओं को चुनौती दी है और समाज की प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। फिर भी महिलाओं की सुरक्षा, समान अवसर और सामाजिक स्वतंत्रता से जुड़ी चुनौतियाँ समाप्त नहीं हुई हैं।
इनका समाधान केवल कानून बनाने या जागरूकता के नारे लगाने से नहीं होगा। कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन, संवेदनशील शिक्षा, परिवारों की सकारात्मक भूमिका और सामाजिक सोच में बदलाव भी जरूरी है। बच्चों को बचपन से सिखाना होगा कि लड़का और लड़की होने के आधार पर किसी की क्षमता या अधिकारों का निर्धारण नहीं किया जा सकता।
घर में बेटों और बेटियों को समान अवसर देना, घरेलू कार्यों में सभी की भागीदारी सुनिश्चित करना तथा सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के लिए सुरक्षित वातावरण बनाना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। परिवर्तन तभी स्थायी होगा, जब समानता भाषण का विषय न रहकर रोजमर्रा के व्यवहार का हिस्सा बनेगी।
नवरात्र का संदेश : भीतर की शक्ति को पहचानें
नवरात्र आत्मशुद्धि, अनुशासन, साधना और आत्ममंथन का अवसर भी है। इन नौ दिनों में हम अपने भीतर की नकारात्मक प्रवृत्तियों को दूर करने और सद्गुणों को अपनाने का संकल्प लेते हैं। यदि यह संकल्प सामाजिक जीवन तक पहुँचे, तो नवरात्र का संदेश और व्यापक हो सकता है।
महिषासुर पर देवी दुर्गा की विजय को प्रतीकात्मक रूप में देखें, तो यह अन्याय, अहंकार और दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा देती है। आज इस प्रेरणा को महिलाओं के प्रति भेदभाव, अपमानजनक व्यवहार और असमानता के विरुद्ध सामाजिक संकल्प में बदला जा सकता है।
कन्या पूजन के साथ बेटियों की शिक्षा का संकल्प, देवी की आरती के साथ महिलाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी और शक्ति की उपासना के साथ स्त्रियों की स्वतंत्रता के प्रति सम्मान—यही वे कदम हैं, जो धार्मिक आस्था को सामाजिक संवेदना से जोड़ते हैं।
आस्था की पूर्णता सम्मान में
नवरात्र हमें शक्ति के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर देता है। लेकिन किसी भी परंपरा की सार्थकता इस बात से तय होती है कि वह हमारे जीवन और व्यवहार को कितना बेहतर बनाती है। यदि देवी की प्रतिमा के सामने सिर झुकाने के बाद हम किसी स्त्री की गरिमा को ठेस पहुँचाते हैं, उसकी आवाज दबाते हैं या उसके अधिकारों की उपेक्षा करते हैं, तो हमें अपनी आस्था के अर्थ पर विचार करना चाहिए।
देवी की पूजा और नारी का सम्मान एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक होने चाहिए। पूजा हमें विनम्रता सिखाए, भक्ति हमें संवेदनशील बनाए और शक्ति की आराधना हमें अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस दे।
नवरात्र की सच्ची सार्थकता तभी है, जब माँ दुर्गा के प्रति हमारी श्रद्धा बेटियों के प्रति विश्वास, महिलाओं के प्रति सम्मान और समाज में समानता के संकल्प में बदल जाए। देवी के चरणों में अर्पित पुष्प तभी अर्थवान होंगे, जब हमारे व्यवहार में स्त्री की गरिमा सुरक्षित होगी।




