
आरा (भोजपुर)। रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते उपयोग से मिट्टी की उर्वरता पर पड़ रहे प्रभाव और खेती की बढ़ती लागत के बीच किसानों को प्राकृतिक खेती के प्रति जागरूक करने की पहल की गई है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना की ओर से गुरुवार को ‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत भोजपुर जिले के पकड़ी और सरैया गांवों में किसान जागरूकता एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए। संस्थान के निदेशक डॉ. अनुप दास के मार्गदर्शन में आयोजित इन कार्यक्रमों में कुल 117 किसानों ने भाग लिया। इनमें 36 महिला और 81 पुरुष किसान शामिल थे। विशेषज्ञों ने किसानों को मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, संतुलित उर्वरक उपयोग, प्राकृतिक खेती और समेकित कृषि प्रणाली की वैज्ञानिक तकनीकों की जानकारी दी।
प्राकृतिक खेती के कम लागत वाले विकल्प बताए
पकड़ी गांव में आयोजित कार्यक्रम में 53 किसानों ने हिस्सा लिया। कृषि विशेषज्ञों ने रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से मिट्टी की उर्वरता पर पड़ने वाले दीर्घकालिक दुष्प्रभावों के प्रति किसानों को आगाह किया। उन्होंने मृदा परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरकों के इस्तेमाल की सलाह दी। साथ ही अजोला आधारित एकीकृत कृषि प्रणाली तथा जीवामृत और नीमास्त्र जैसे कम लागत वाले प्राकृतिक विकल्पों की उपयोगिता समझाई। किसानों ने प्रशिक्षण को उपयोगी बताते हुए खेतों में नियमित प्रदर्शन आयोजित करने का अनुरोध किया, ताकि प्राकृतिक खेती की तकनीकों को व्यावहारिक रूप से अपनाया जा सके और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम हो।
महिला किसानों को दिया प्राकृतिक कृषि आदान तैयार करने का प्रशिक्षण
सरैया गांव में आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम में 64 किसानों ने भाग लिया। इनमें 36 महिला और 28 पुरुष किसान शामिल थे। यहां विशेषज्ञों ने महिला किसानों की सक्रिय भागीदारी के बीच जीवामृत, घनजीवामृत और नीमास्त्र तैयार करने की व्यावहारिक विधियां बताईं। किसानों को समझाया गया कि इन प्राकृतिक कृषि आदानों के उपयोग से मिट्टी की जैविक गतिविधियों को बढ़ावा देने, कीट प्रबंधन में रासायनिक साधनों पर निर्भरता घटाने और खेती की लागत कम करने में मदद मिल सकती है। प्रशिक्षण में शामिल किसानों ने प्रत्येक माह अनुवर्ती प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने का सामूहिक अनुरोध किया।
कृषि अपशिष्ट से खाद बनाने की बताई वैज्ञानिक विधि
दोनों गांवों में किसानों को कृषि एवं फसल अवशेषों तथा पशुओं के गोबर से केंचुआ खाद तैयार करने की वैज्ञानिक विधि की जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने बताया कि कृषि अपशिष्ट का पुनर्चक्रण कर उपयोगी जैविक खाद तैयार की जा सकती है। इससे मिट्टी की संरचना और उर्वरता सुधारने के साथ खेती की लागत कम करने में मदद मिलती है। अजोला के उपयोग और लाभों पर भी चर्चा की गई। किसानों को बताया गया कि अजोला पशुओं के लिए प्रोटीनयुक्त पूरक आहार के साथ धान की खेती में जैव उर्वरक के रूप में भी उपयोगी है।
एकीकृत कृषि प्रणाली से आय बढ़ाने पर जोर
प्रशिक्षण के दौरान फसल उत्पादन के साथ मत्स्य पालन और पशुपालन को जोड़कर एकीकृत कृषि प्रणाली अपनाने के लाभ बताए गए। विशेषज्ञों ने पशुधन प्रबंधन, तालाब प्रबंधन और उपलब्ध कृषि संसाधनों के बेहतर उपयोग पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि खेती के साथ अन्य कृषि गतिविधियों को जोड़ने से किसानों के लिए आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित किए जा सकते हैं और कृषि जोखिमों को कम करने में मदद मिल सकती है।
कार्यक्रम में आईसीएआर के पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना के पशुधन एवं मात्स्यिकी प्रबंधन प्रभाग के प्रमुख डॉ. कमल शर्मा और मुख्य तकनीकी अधिकारी डॉ. काशी नाथ उपस्थित रहे। कृषि विज्ञान केंद्र, भोजपुर के विषय वस्तु विशेषज्ञ डॉ. सच्चिदानंद सिंह एवं प्रखंड तकनीकी प्रबंधक राज अभिनंदन सिंह ने भी भाग लिया और तकनीकी सत्रों के संचालन एवं समन्वय में सहयोग किया।




