मुुद्दा / आयुष्मान भारत : गरीबों तक बेहतर पहुंच की दरकार

देहरादून-दिल्ली कार्यालय से प्रकाशित-प्रसारित समय-सत्ता-संघर्ष की पाक्षिक पत्रिका चाणक्य मंत्र में बिहार से विशेष रिपोर्ट

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आयुष्मान भारत : गरीबों तक बेहतर पहुंच की दरकार

कृष्ण किसलय, पटना

बिहार दौरे पर नवम्बर में आए माइक्रोसाफ्ट के सह संस्थापक बिल गेट्स ने कहा था, बीते बीस सालों में बिहार ने गरीबी, बीमारी के मामलों में भारत के दूसरे कई राज्यों और दुनिया की दूसरी कई जगहों के मुकाबले बेशक तरक्की की है, मगर इस अवधि में बेहतर स्वास्थ्य के मामले में दूसरी कई जगहों ने बिहार से ज्यादा सुधार कर लिया है। इस कथन का आशय था कि अभी बिहार को बेहतर स्वास्थ्य की दिशा में लक्ष्य को हासिल करने के लिए लंबी दूरी तय करनी है, अधिक संसाधन जुटाना है और ज्यादा सघन श्रम करना है। बिल गेट्स ने आश्वासन दिया था कि बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन बिहार सरकार के साथ मिलकर राज्य में बेहतर स्वास्थ्य निर्माण की दिशा में कार्य करेगा। 21 जनवरी को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजधानी पटना में कहा कि बिहार के लिए जन स्वास्थ्य प्रबंधन आज भी बड़ी चुनौती है। नीतीश कुमार 01 अणे मार्ग (पटना) स्थित मुख्यमंत्री आवास कार्यालय में आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन स्वास्थ्य योजना को लेकर उच्च अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक कर रहे थे। उन्होंने राज्य के प्राथमिक स्वास्थ्य केेंद्रों को हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर के रूप में विकसित करने पर जोर दिया और कहा कि आयुष्मान भारत का लाभ अधिक-से-अधिक गरीबों को मिले, इसके लिए अधिकारी त्वरित, कारगर पहल करें। अस्पतालों में इस योजना के लाभार्थी मरीजों की संख्या हर हाल में बढा़ई जानी चाहिए।

स्वास्थ्य सर्वे रिपोर्ट में नासाज बिहार

बिहार में राजकीय चिकित्सा सुविधा की उपलब्धता और जनस्वास्थ्य की स्थिति को कुछ सरकारी आंकड़ों के आधार पर अनुमान लगाया जा सकता है। गुजरे साल 2019 में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम से सैकड़ों बच्चों की सिलसिलेवार हुई मौत और कैंसर, टीवी आदि से मौत में वृद्धि से भी बिहार की स्वास्थ्य-दशा को समझा जा सकता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, बिहार में पांच साल तक के 48.3 फीसदी बच्चे कुपोषण के कारण उम्र के अनुपात में लंबाई में वृद्धि नहींहोने से बौने हैं। बिहार के बौने अर्थात लंबाई में कम बच्चों की संख्या देश में सबसे से अधिक है। पांच साल के बच्चे की लंबाई 40 ईंच (100 सेन्टीमीटर) होनी चाहिए। गांवों में 40 फीसदी से अधिक और शहरों में 30 फीसदी से अधिक बच्चों का कद छोटा है। नेशनल न्यूट्रेशन सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक, 35 फीसदी बच्चे कम लंबाई के, 17 फीसदी बच्चे कम वजन के और 41 फीसदी बच्चे खून की कमी वाले पाए गए हैं। बिहार में शिशु (बच्चा) मृत्यु दर और जच्चा (मां) मृत्यु दर अधिक है।

राजकीय अस्पतालों में डाक्टर-नर्स कम

एनसेफ्लाइटिज सिंड्रोम से हर साल सैकड़ों बच्चों की मौत राज्य के लिए बड़ी त्रासदी है, जिसका अब तक सार्थक परिणामपरक निदान सामने नहींआ सका है। पैसे के अभाव में अधिकांश गरीब परिवार समुचित इलाज कराने में सक्षम नहीं हैं। ऐसे में सामाजिक-आर्थिक योजनाओं को जमीन पर उतारने के लिए बहुत कुछ करने की बड़ी चुनौती राज्य में लगातार बनी हुई है। बिहार में रोग का प्रसार करने वाले मच्छरों-मक्खियों का आतंक प्रसिद्ध है, जिनसे मलेरिया और कालाजार जैसी बीमारी का फैलाव होता है। पानी के निकासी के अभाव, गंदे पानी के जमाव और मिट्टी के घरों में नमी के कारण मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों और कालाजार फैलानी वाली मक्खियों का आसानी से प्रसार होता है। सभी प्राथमिक केेंद्रों पर मरीजों को जरूरी सुविधाएं नहींमिलती हैं। सर्दी के मौसम में तो कफ सीरप तक नहींहोता। डाक्टर कम और नर्सिग स्टाफ भी मानक के मुताबिक कम हैं। स्वास्थ्य सेवा की उपलब्धता के लिए चिकित्सकों की बड़ी कमी है। 12 करोड़ की आबादी वाले इस राज्य में एक हजार की आबादी पर एक चिकित्सक (सरकारी) नहींहैं। चिकित्सा महाविद्यालयों की संख्या कम होने से डाक्टरों की कमी है। 50 लाख की आबादी पर कम-से-कम एक मेडिकल कालेज होने का मानक है। इस हिसाब से 24 मेडिकल कालेज बिहार में होना चाहिए। राज्य में सरकारी क्षेत्र के 8 और स्वायत क्षेत्र के दो मेडिकल कालेज ही चल रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के अनुसार, प्रति 10 हजार की आबादी पर चिकित्सकीय मानव संसाधन (डाक्टर, नर्स आदि) की संख्या 23 होनी चाहिए, मगर बिहार में इनकी उपलब्धता की संख्या 20 से कम है और ग्रामीण क्षेत्र में तो स्थिति ज्यादा कमजोर है। 52 फीसदी से अधिक ग्रामीण क्षेत्रों में और शहरी क्षेत्रों में 62 फीसदी से अधिक निजी चिकित्सालय हैं। निजी चिकित्सालय में 31845 रुपये भर्ती हुए औसतन प्रति मरीज खर्च होता है और सरकारी चिकित्सालय में भर्ती हुए मरीज पर 4452 रुपये खर्च होता है।


आयुष्मान भारत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण

जाहिर है, नासाज स्वास्थ्य और चिकित्सकीय संसाधन की कम पहुंच वाले बिहार में आयुष्मान भारत जैसी योजना की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। यह योजना राज्य में बेहतर सार्थक रोल अदा कर सकती है। मगर इससे लाभ प्राप्ति की प्रगति काफी धीमी है और हर जरूरतमंद गरीब तक इसकी पहुंच नहींहो पाई है। गरीब परिवार को सालाना पांच लाख रुपये तक की चिकित्सा सुविधा मुहैया कराने वाली केेंद्र सरकार की महात्वाकांक्षी स्वास्थ्य कार्यक्रम प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (आयुष्मान भारत) के अंतर्गत लाभार्थी चयन का पैमाना 2011 की जातिगत जनगणना को बनाया गया है। सामाजिक-आर्थिक-जातीय जनगणना (एसईसीसी) के हिसाब से आयुष्मान भारत का लाभ देश के 8.03 करोड़ ग्रामीण परिवारों और 2.33 करोड़ शहरी परिवारों को मिलना है। आयुष्मान भारत के लिए बिहार के 570 सरकारी और 194 निजी अस्पतालों को सूचीबद्ध किया गया है, जिसमें जांच, दवा और उपचार की सुविधा दी जा रही है। हालांकि इस योजना का स्याह पक्ष भी है। एक तरफ बड़ी संख्या में वैसे लोगों के गोल्डन कार्ड नहींबन सके हैं, जो वास्तव में जरूरतमंद हैं। दूसरी तरफ उन लोगों के भी गोल्डन कार्ड बनाए गए जो इसके दायरे में नहीं आते। इसके अलावा राज्य में जगह-जगह से यह खबर भी आती हैं कि अनेक अस्पतालों ने इसे कमाई का नाजायज जरिया भी बनाया है। मरीज की जांच और इलाज के नाम पर गोल्डन कार्ड की सुविधा अस्पतालों द्वारा झटक ली जाती है। इसकी निगरानी का बेहतर तंत्र अभी विकसित नहींहो सका है। कई मामलों में गोल्डन कार्ड धारक की भी मिलीभगत होती है।

सभी जरूरतमंदों तक नहीं पहुंचा है गोल्डन कार्ड

आयुष्मान भारत योजना का लक्ष्य निम्न और निम्न-मध्यम वर्ग के परिवारों को महंगे चिकित्सा खर्च की सुविधा स्वास्थ्य बीमा के जरिये उपलब्ध करना है। इसके दायरे में गरीब, वंचित ग्रामीण परिवार और शहरी श्रमिकों की पेशेवर श्रेणियों को रखा गया है। माना जा रहा है कि आयुष्मान भारत योजना में तेजी लाने के लिए और इसका लाभ अधिक-से-अधिक जरूरतमंद लोगों को मिल सके, इसके नियमित जागरुकता कार्यक्रम चलाए जाने की जरूरत है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के लिए अनुमंडल स्तर पर प्रशिक्षण शिविर लगाने और पंचायत स्तर पर लाभार्थियों का गोल्डन कार्ड बनाने के लिए शिविर लगाने की योजना बनाई गई है। आरटीपीएस द्वारा लाभुकों के लिए मुफ्त में कार्ड बनाए जाने की बात है, जबकि कामन सर्विस देने वालों द्वारा गोल्डन कार्ड के लिए 30 रुपये का शुल्क निर्धारित है। राज्य के सबसे बड़े अस्पताल पटना मेडिकल कालेज एंड हास्पिटल (पीएमसीएच) में आयुष्मान भारत योजना की हर सप्ताह समीक्षा करने की व्यवस्था बनाई गई है, ताकि यह पता चल सके कि किस विभाग में कितने मरीजों को योजना का लाभ मिला? अभी तक राज्य के इस बड़े अस्पताल में गोल्डन कार्ड धारक वार्ड स्थापित नहींकिया जा सका है।


  • कृष्ण किसलय,
    आवास : सोनमाटी प्रेस गली, जोड़ा मंदिर, न्यूएरिया, डालमियानगर-821305,
    डेहरी-आन-सोन, जिला रोहतास (बिहार) Ph. 9708778136

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