पुस्तक-चर्चा : लेखन विधाओं में सोच, संवेदना और विवेक की प्रतिध्वनियां / कुमार बिन्दु की तीन कविताएं

 

पुस्तक-चर्चा : लेखन विधाओं में सोच, संवेदना और विवेक की प्रतिध्वनियां

1. चांदखोल पर थाप
पूर्व-मध्य रेल के दानापुर मंडल में राजभाषा अधिकारी के रूप में कार्यरत वरिष्ठ साहित्यकार राजमणि मिश्र की इस पुस्तक का प्रकाशन रश्मि प्रकाशन (लखनऊ) ने किया है। 174 पृष्ठों की इस पुस्तक की कीमत 225 रुपये है, जिसमें 51 छोटे-बड़े ललित निबंध संग्रहित हैं। इससे पहले भी इनका निबंध संग्रह (रात, नींद और सपने) प्रकाशित हो चुका है। विभिन्न विधाओं में लिखने वाले राजमणि मिश्र बिहार के वरिष्ठ साहित्य हस्ताक्षर हैं। वह कवि भी हैं और इनके कविता-संग्रह की पुस्तक (ताना है मैंने इंद्रधनुष) प्रकाशित हो चुकी है।
निबंध बंधी हुई, कसी हुई सुनियोजित रचना होती है। मगर राजमणि मिश्र ने बारिश में वेगवती नदी की तरह तटबंध तोड़कर लेखन-सृजन का नैबंधिक कार्य किया है। इस संग्रह की भूमिका (स्वगत : लिखि कागद कोरे) में लेखक का बयान लिपिबद्ध भी है कि निबंध की दुनिया उनके लिए जीवन की जटिलताओं से अलग अकूत समृद्धि और अपरिमित स्वतंत्रता भाव वाला सृजन संसार है। इस निबंध संग्रह के बारे में बिहार के प्रसिद्ध साहित्यकार श्रीरंजन सूरिदेव ने पुस्तक की आवरण-टिप्पणी में लिखा है कि निबंधकार की भाषिक अनियमितता में भी एक नियम है, उसकी वैचारिक अव्यवस्था में भी एक व्यवस्था है और स्वतंत्र अभिव्यक्ति में भी एक मर्यादा है। निबंधकार ने अपनी मौलिक पद्धति की स्वयं खोज की है और निबंध के नियम का खुद आविष्कार किया है। जबकि हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक डा. विश्वनाथ त्रिपाठी ने पुस्तक में पुरोवाक के रूप में प्रकाशित अति संक्षिप्त टिप्पणी में लिखा है, लेखक की संवेदनशीलता और विवेक का सुंदर मेल है निबंध संग्रह चांदखोल पर थाप।
‘चांदखोल पर थापÓ के साथ वक्रचंद्रमा, इस बार सेमल खूब फलेगा, हर शख्स परेशान-सा क्यों है, उस पार न जाने क्या होगा, ड्रेस कोड, संभवामि, आधाी आबादी अतीत और वर्तमान, ताकि बची रहें किताबें, बाडी लैंग्वेज, मैं तुम और आईना, बादलों में छुप रहा है चांद क्यों-क्यों, एक तुम ही तन्हा नहीं जैसे निबंध इस संग्रह की प्रतिनिधि रचनाएं मानी जा सकती हैं। इस संग्रह का ध्वज निबंध है चांदखोल पर थाप, जो संग्रह में 10वें स्थान पर है। पहला संग्रहित निबंध वक्रचंद्रमा है। वैसे पुस्तक का नाम किसी निबंध के शीर्षक नाम पर रखा जा सकता है। मगर ध्वज निबंध को लेखक ने 10वां क्रम क्यों दिया है, यह तो वही जानें। चांदखोल एक आंचलिक वाद्य है, जिसे पश्चिम बंगाल के कीर्तन करने वाले समुदाय बजाते हैं।
ललित निबंध में अभिव्यक्ति की बहुविध कला समाहित होती हैं और उसमें रचनाकार की सृजनात्मकता का बहुआयामी प्रतिबिंबन होता है। राजमणि मिश्र के ललित निबंधों में जीवन के अनुभवों के वर्णन के साथ विचार और बोध भी है। इनके निबंधों में व्यक्ति-समाज की समग्र चेतना का जो अंकन है, उसमें दार्शनिकता का पुट भी है। वास्तव में, इस संग्रह के कई निबंधों में कहानी पढऩे जैसा आनंद है, कविता जैसा झरझराता रस-वर्षण है और संगीत सुनने, गीत गुनगुनाने जैसा सुख भी है।

2. प्रिसाइडिंग आफिसर की डायरी
यशराज पब्लिकेशन (पटना) से प्रकाशित यह कहानी संग्रह चितरंजन भारती की पांचवीं पुस्तक है। भारत सरकार के राजभाषा अनुभाग के अंतर्गत असम राज्य में अहिन्दीभाषी कार्मिकों के लिए निर्धारित हिन्दी पाठ्यक्रम शिक्षण का कार्य करने और राजभाषा कार्यशाला का संचालन करने वाले चितरंजन भारती कहानी कहने की कला के सिद्धहस्त वरिष्ठ कलमकार हैं। इनका पहला कहानी संग्रह 1987 (किस मोड़ तक) में प्रकाशित हुआ। फिर 1993 में लघुकथा संग्रह (आम जनता के लिए), 2001 में कहानी संग्रह (अब और नहीं), 2004 में उपन्यास (नई यात्रा) और 2019 में ही कहानी संग्रह (पूर्वोत्तर का दर्द) प्रकाशित हुआ।
पिछले माह प्रकाशित 80 पृष्ठ के कहानी संग्रह (कीमत 250 रुपये) में 10 कहानियां संकलित हैं। प्रिसाइंडिंग आफिसर की डायरी कहानी संग्रह की लीड कहानी है। इस संग्रह की अन्य कहानियां जख्मों के निशान, बुलाते हैं पहाड़, बदनसीब, बोझ, आत्महन्ता, काश ऐसा हो पाता, अर्धसत्या, कील, इच्छाशक्ति और छाता हैं। आत्मकथात्मक शैली में लिखी गई प्रिसाइडिंग आफिसर की डायरी और जख्मों के निशान संग्रह की दमदार कहानियां हैं। दोनों कहानियों में पूर्वोतर भारत के पहाड़ के जीवन का जीवंत विवरण-वर्णन है, जो किस्सागोई के बेहतर नमूने हैं। प्रिसाइडिंग आफिसर की डायरी में पढ़कर पाठक के मन में एक अनुत्तरित प्रश्न उठता है। एक पात्र चाय-बिस्कुट लेकर आने वाली पर्वतीय लावण्य से पूर्ण पहाड़ी लड़की है, जिसकी कहानी में सिर्फ एक बार जिक्र है। विकट पर्वतीय ग्राम्य और वहां दयनीय स्थिति में रहने-जीने वाले स्त्री-पुरुषों का चित्रण कहानी में है, तब फिर इस अपूर्ण पात्र की जरूरत क्यों पड़ी? इसके बिना कहानी का काम चल सकता था। कथ्य का माध्यम नाटक, कहानी, चाहे सिनेमा हो, कोई पात्र, कोई दृश्य, कोई संकेत, कोई वस्तु कथा के फ्रेम में अकारण नहीं होता। पाठक-मन के इस सहज सवाल का उत्तर तो कहानीकार ही दे सकता है कि ऐसा क्यों? बहरहाल, संग्रह की कहानियों में निर्धारित कथावस्तु है, पाठकों को बांध रखने वाला दृश्य चित्रण है, सटीक मनोदशा विश्लेषण है, रस प्रभाव है और अभिव्यक्ति का निर्वाध प्रवाह भी है।

3. तैंतीस करोड़ देवता : भ्रम या सत्य?
यह पुस्तक दो दशकों से हस्तशिल्प से जुड़े रहे मनोविज्ञान के स्नातक राकेश वर्मा ने लिखी है, जिसका प्रकाशन लेखक ने स्वयं किया है और वितरण नई दिल्ली के रसायन फार्मेसी के प्रकाशन विभाग ने किया है। 80 पृष्ठ की पुस्तक की कीमत सौ रुपये है। लेखक ने बताया है कि 33 कोटि देवता का आशय 33 करोड़ से नहीं, 33 प्रकार से हैं। सभ्यता की नींव रखने वालों में आदि पुरुष कश्यप ऋषि और आदि स्त्री अदिति हैं, जिनके 33 पुत्र ही प्रथम 33 देवता हैं, जो आदित्य (12), रुद्र (11), वसु (8) और अश्विनी (2) के रूप में वर्गीकृत हैं। इंद्र और प्रजापति को अश्विनी बताया गया है। लेखक ने अग्नि को प्रथम ज्ञात देवता, शंकर को दुनिया का प्रथम ज्ञात किसान और पार्वती को प्रथम ज्ञात पत्नी माना है। बताया है कि देवता और दानव आदमी के भयभीत मन की कल्पना हैं। धुएं के जरिये आकाश में देवलोक तक प्रार्थना पहुंचाने की विधि के रूप में यज्ञ कर्मकांड का विकास हुआ। हस्तशिल्प का विकास होने पर आदमी ने अपने-अपने मनोकुल देवता को गढ़ा और अपनी इच्छानुकुल हथियारों से लैस किया। पूजा के आरंभिक प्रतीक-चिह्न (मूर्ति) शिवलिंग (योनि सहित) प्रजनन का प्रतिबिंब है। आदिमानव बोली के विकास से पहले ध्वनि उच्चारण कर उसी तरह संवाद स्थापित करते थे, जिस तरह मूक-बधिर करते हैं।
पुस्तक को मानसिक कारावास से मुक्ति के उपक्रम के रूप में प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक में इस बात को स्थापित करने का प्रयास किया गया है कि चूंकि तर्क आदमी की योग्यता और विशेषाधिकार है, इसलिए तर्क नहींकर सकने वाला अयोग्य और हठधर्मी (कट्टर) है। जिसके पास तर्क करने का साहस नहीं है, वह अपना और दूसरों का मानसिक गुलाम बना रहता है। बहुत कम संख्या में लोग होते हैं, जो अपने भीतर विचार करने और चिंतन करने की सक्रियता को विकसित कर पाते हैं। पुस्तक में निश्चित क्रमिक व्याख्या और निर्धारित विषय-वस्तु पर केेंद्रित रहने का अभाव पठन गतिरोध पैदा करता है।

(फोटो : निशांतकुमार राज)

– समीक्षा : कृष्ण किसलय

(संपादक, सोनमाटी मीडिया समूह)

फोन 9708778136

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कुमार बिन्दु की तीन कविताएं

1. ठठाकर मत हंसो कवि

इस तरह ठठाकर मत हंसो कवि
क्या तुम नहीं जानते
महानगरीय जीवन में ठठाकर हंसना
पागलपन का लक्षण
गंवारूपन का द्योतक
असभ्यता का परिचायक होता है।
क्या तुम यह नहीं जानते कवि,
राजसत्ता के सांस्कृतिक इतिहास में
आम आदमी का इस तरह हंसना
राजसत्ता की सनातन संस्कृति की
पुरातन राजसत्ता के प्रति
जनविद्रोह का प्रतीकनाद है।
इसीलिए आम आदमी का हंसना
सांस्कृतिक-राजनीतिक अपराध है
और तुम हो कि
ठठाकर हंसे जा रहे हो,
शहर की शांति-व्यवस्था
भंग किए जा रहे हो,
अजीब आदमी हो तुम
जब शहर में आए हो
तो जीने का नया सलीका सीखो
रावण की तरह
ठठाकर हंसना अच्छा नहीं
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की तरह
मंद-मंद मुस्कराना सीखो
देखो कवि,
यह तुम्हारा गांव नहीं
यह रामभक्तों की नगरी है,
इसलिए सीताराम-सीताराम नहीं
जय श्रीराम कहना सीखो।

 

2. ओ देवताओं!

ओ देवताओं,
तुम कहां हो, आओ
मेरे घर के आंगन में आओ
मैंने तुम्हारे स्वागत में
खाट बिछा रखी है
एक कटोरी में गुड़
एक लोटा पानी भी है,
पहले गुड़ खाना फिर पानी पीना
तब कुछ अपनी कहना
कुछ मेरी भी सुनना।
ओ देवताओं,
मैं जानना चाहता हूं
तुम्हारे देवलोक में राजतंत्र है,
एक लोकतांत्रिक गणराज्य
बन चुका है इंद्रलोक।
ओ देवताओं,
देवलोक की उर्वशी, मेनका, रंभा ने
पौराणिक इंद्रसभा की परंपरा
पुरुषों के स्वामित्व और सत्ता
भोग-विलास की अदम्य लालसा के विरुद्ध
कभी रोषपूर्ण धरना-प्रदर्शन
या अनिश्चितकालीन अनशन
गांधी बाबा की तरह शांतिपूर्ण सत्याग्रह
या समाजवादियों की तरह संसद का घेराव किया,
इंकलाबी नारे लगाए।
ओ देवताओं,
मुझे बताओ तुम्हारा राष्ट्रगान क्या है
क्या तुम सब भी गणतंत्र दिवस मनाते हो
राष्ट्रध्वज फहराकर समवेत रूप से गाते हो
जन-गण-मन अधिनायक जय हो।
ओ देवताओं,
मैं जानना चाहता हूं
तुम्हारे देवलोक का
मेरे मानुसलोक से
राजनीतिक संबंध है कैसा,
अमेरिका और भारत की भांति
या कि भारत और पाकिस्तान जैसा
कहीं तुम्हारे देवलोक और
दानवों के पाताल लोक के बीच
मानुषलोक की स्थिति
कश्मीर जैसी तो नहीं है!

 

3. तथागत से सवाल

तथागत !
क्या तुमको कभी
यह चिंता सतायी थी
कि घर में सांझ को
कैसे जलेगा चूल्हा,
रात में क्या खाकर
सोयेंगे बाल-बच्चे,
क्या बरसात से पहले
घर का छप्पर छाने के लिए
पूस में बर्फ बनी धरती पर
अलाव जलाने के लिए
घास-फूस और बांस का
सर्द रात में ओढऩे के लिए
नंगी खाट पर बिछाने के लिए
क्या तुम्हें कपड़े-लत्ते का कभी अभाव खला था भंते,
तुम तो बुद्ध हो, ज्ञानी महात्मा हो
बताओ इस संसार में
कुछ लोग अमीर
सारे मेहनतकश भूखे-नंगे
और गरीब क्यों हैं,
चंद घरों में स्वर्ग के वैभव-विलास
किसानों, कारीगरों और मजदूरों के घरों में
सदियों से भुखमरी और गरीबी का तांडव क्यों है
उनकी अमीरी का राज क्या है
हमारी गरीबी का फांस क्या है?
मैं यह सोच रहा हूं
अगर तुम कुलीन परिवार के राजकुमार नहीं
एक मामूली किसान के बेटे होते
खेत-खलिहानों में दिनभर हाड़-तोड़ मेहनत करने पड़ते
सुबह में रोटी-गुड़, रात में माड़-भात खाने को मिलते
तब तुम्हारे कोमल हृदय को कौन-कौन सा दु:ख सालता
तब तुम्हारे चिंतन-मनन का
क्या विषय होता भंते,
मैं यह भी जानना चाहता हूं
तुम्हारे निजी जीवन में आध्यात्मिक चिंतन में
सौंदर्य की प्रतिमूर्ति नारी अछूत क्यों है
शहर के सेठ-साहूकारों को
भारत के राजे-राजवाड़े को
तुम्हारा धम्म अधिक पसंद क्यों है?

संपर्क :

पाली, डेहरी-आन-सोन, जिला रोहतास (बिहार)

फोन 9939388474

 

 

One thought on “पुस्तक-चर्चा : लेखन विधाओं में सोच, संवेदना और विवेक की प्रतिध्वनियां / कुमार बिन्दु की तीन कविताएं

  • October 4, 2019 at 11:41 am
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    Kumar Bindu ki Kavitayein- ZABARDAST

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