समाप्त हो गईं डालमियानगर की समृद्ध सांस्कृतिक गतिविधियां

डालमियानगर (बिहार)-सोनमाटी समाचार। एक ओर जहां बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक के राजनीतिक खांचे में बांट दिए गए विविधतापूर्ण भारतीय समाज में धार्मिक सहिष्णुता के बजाय तनाव-टकराव की आशंका में लगातार वृद्धि होती हुई दिखाई दे रही है, वहींदूसरी ओर सामाजिक सौहाद्र्र व सांस्कृतिक सजगता के विस्तार की दृष्टि से दुर्गापूजा, मुहर्रम जैसे अवसरों पर आयोजित होने वाले कविसम्मेलन, मुशायरा, रामलीला, नाटक मंचन जैसी स्वस्थ पंरपरा लगभग खत्म होती जा रही है और फास्टफुड की तरह आर्केस्ट्रा जैसे कार्यक्रमों का चलन बढ़ता जा रहा है।
बिहार के रोहतास जिले के डालमियानगर स्थित रोहतास उद्योगसमूह (अब मृत) का विशाल परिसर तो राष्ट्रीय स्तर के रामलीला, पारसी थियेटर, कविसम्मेलन, नाटक मंचन, खेल प्रतियोगिता आदि के लिए बेहद प्रसिद्ध और दूर-दूर तक के इलाके के लिए आकर्षण का केेंद्र हुुआ करता था। कभी पूरे एशिया में प्रसिद्ध रहे आजादी के बाद देश के इस तीसरे बड़े औद्योगिक परिसर के 33 साल पहले 1984 में अचानक बंद हो जाने से यहां की अनेक समृद्ध सांस्कृतिक गतिविधियां बंद व लुप्त हो गईं। हालांकि रोहतास जिले के ग्रामीण अंचलों में नाटक मंचन और कविसम्मेलन के आयोजन की परंपरा अभी छिटपुट तौर पर जीवित बची हुई है।
डालमियानगर बंगाली क्लब में बंगाल की तरह सबसे पहले शुरू हुई दुर्गा प्रतिमा-पूजा के आकर्षण को देखने के लिए पास-पड़ोस से गांव-गांव के स्त्री-पुरुष देर रात तक पहुंचते थे। डालमियानगर बंगाली क्लब दुर्गोत्सव समिति के अध्यक्ष एवं रोहतास उद्योगसमूह परिसर (समापन में) के प्रभारी अधिकारी आरतराय वर्मा के अनुसार, सबसे पहले दुर्गा प्रतिमा स्थापना की शुरुआत 79 साल पहले 1938 में बंगाली क्लब में ही हुई।
भलुनीधाम में कविसम्मेलन
दशहरे के अवसर पर भलुनी धाम भोजपुरी साहित्य समिति की ओर से आयोजित कवि सम्मेलन में भोजपुरी के कई प्रसिद्ध कवियों डा. गुरुचरण सिंह, अनुराधाकृष्ण रस्तोगी, सिपाही पांडेय मनमौजी, रघुनाथ सिंह विकल, अनंत पांडेय, सरोज पंकज आदि ने भाग लिया और संयोजक कन्हैया पंडित की भोजपुरी पुस्तक (माई के ओरहन) का विमोचन किया गया।

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