सर्वाधिक महत्वपूर्ण है सावन का सोमवार

सनातन संस्कृति में वर्ष ‘ मास ‘ पक्ष और दिन का विशेष महत्व है। सावन मास में चन्द्र वासर (सोमवार ) को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है। ऐसे तो सावन मास भगवान् चन्द मौली – चन्द्रशेखर शिव को समर्पित है। संसार में रहने वाले जीव मात्र को अमृत और शितलता प्रदान करने वाले चन्द्र देव हैं , जिनका रंग उजला है और गोत्र अत्रि ऋषि हैं। चन्द्रमा में एक वंश परम्परा है ‘ जो चन्द्र वंशी कहे जाते है।

टेशू ( पलास ) पुष्प प्रिय है। भगवान् शंकर के जट्टा में गंगा की धारा बहती है और उनके साथ चन्द्र से अमृत टपकता है। माँ गंगा पितरों को उधार करती हुई किसानों के कृषि जगत में सफलता देती है । चन्द्र ने नम्रता – कोमलता जीवों को प्रदान करता है। सोम के आराध्य देव शंकर हैं इसीलिए द्वादश ज्योतिर्लिंग में प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ हैं। सावन का सोमवार भगवान् शंकर का अतिप्रिय है। इस दिन जलाभिषेक रुद्राभिषेक अन्यान्य तरल पदार्थो से भगवान् शिव का अभिषेक करने का शास्त्रों निर्देश प्राप्त होता है।

सोमवार व्रत करने से कुमारी को योग्य पति , रोगियों को रोग से छूटकारा , निर्धन को धन ‘ पति पत्नी को दाम्पत्य सुख प्रेम ‘ विद्यार्थी को विद्या ‘ नारिओं को अखण्ड सौभाग्य , अर्थात् भक्तों का प्रत्येक मनो कामानाए पूर्ण होती है। सावन महिना में ही पार्वती जी कठिन तपस्या कर भगवान् शंकर को पति रूप में प्राप्त किया है। अगर सम्पूर्ण सावन शिव पर जल विल्व नही चढ़ाते हैं तो सावन सोमवार को जरूर चढ़ाते हैं ।

सावन भगवान् शिव के सभी परिकरों की पूजा होती है , – यथा – गणेश गौरी, नन्दी ( बसहा बैल ) ‘कार्तिक, वीरभद्र, कुबेर , अशोक सुन्दरी, गंगा , चन्द्रमा ‘ त्रिशूल , डमल ‘ नाग (सर्प) और कृति मुख ईत्यादि । पार्थिव ( मिट्टी का शिव लिंग ) पूजा सावन में जरूर करना चाहिये जिससे घर वास्तु दोष समाप्त हो जाता है।

प्रस्तुति : आचार्य पं० लाल मोहन शास्त्री

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