पुस्तक समीक्षा : कृष्ण किसलय की साहित्यिक विरासत को सहेजती है ‘लाली’

विगत दिनों निशांत राज ने पटना में अपनी संपादित पुस्तक “लाली” भेंट की, तो मैं चमत्कृत रह गया। यह पुस्तक उनके दिवंगत पिता स्वर्गीय कृष्ण किसलय की स्मृति में उनकी रचनाओं का संकलन है। कृष्ण किसलय पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में हमारे गुरु एवं पथ-प्रदर्शक समान थे। उन्होंने अपने साप्ताहिक अखबार सोनमाटी में अनेक महत्वपूर्ण रचनाएँ प्रकाशित की थीं।

अस्सी के दशक में पत्र-पत्रिकाओं का अपना अलग ही प्रभाव था। उस दौर में भी उन्होंने अपने साप्ताहिक अखबार की सामग्री, प्रस्तुति और छपाई की गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखा। मुझे जानकारी थी कि उन्हें नाटक लेखन में विशेष रुचि थी। उनका नाटक “समाज ने हमें क्या दिया” धुंधली स्मृतियों में आज भी मौजूद है, हालांकि उसके मंचन को देखने का अवसर नहीं मिला। वे लगभग हर विधा में लिखते थे, किंतु विज्ञान लेखन के प्रति उनका विशेष समर्पण था।

इस पुस्तक को पढ़ने पर ज्ञात होता है कि कृष्ण किसलय कविता, कहानी, लघुकथा और नाटक जैसी विभिन्न विधाओं में सक्रिय थे। सच पूछा जाए तो उनकी विशेष रुचि नाटक में ही थी। मगर डेहरी जैसे छोटे शहर में रंगमंचीय गतिविधियों के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं थे। कोई स्थायी थिएटर भी नहीं था, इसलिए नाटक मंचन एक कठिन और खर्चीली प्रक्रिया थी। फिर भी उत्साही लोगों की कमी नहीं थी और उन्हीं समर्पित लोगों में कृष्ण किसलय का नाम उल्लेखनीय था।

पुस्तक की भूमिका में निशांत राज लिखते हैं— “हर रचना मनुष्य के हृदय की पीड़ा, संवेदना, वियोग और छटपटाहट की अभिव्यक्ति होती है। जब यह पीड़ा रचनाकार के भीतर से निकलकर दूसरे के लिए ग्राह्य हो जाती है, तभी वह कालजयी बनती है, और ‘लाली’ भी ऐसी ही कृति है।”

मैंने अपने समय में, विशेषकर 1978-80 के दौरान, उनके पत्रकार रूप को अधिक निकट से देखा। स्वाभाविक भी था, क्योंकि वे एक अखबार निकालते थे। किंतु इस पुस्तक में उनकी कई संवेदनशील कविताएँ भी संकलित हैं। अपनी एक क्षणिका में वे लिखते हैं— “मेरी जिंदगी बनकर मोमबत्ती जल रही है, तिल-तिल गल रही है, पर देखने वाले कहते हैं कि वह रोशनी में बदल रही है।” ऐसी सकारात्मक सोच रखने वाले कृष्ण किसलय वास्तव में मानवीय संवेदनाओं से भरपूर व्यक्ति थे। वे जाति और धर्म से ऊपर उठकर मनुष्य को महत्व देते थे। मीर हसनैन मुश्किल जैसे एक साधारण ट्रक पेंटर की ग़ज़लों को भी वे सोनमाटी में सम्मानपूर्वक प्रकाशित करते थे। वे अपनी पीड़ा स्वयं झेलते रहे। उनकी कविता “और सुनता रहता हूँ” की पंक्तियाँ इसका प्रमाण हैं— “किसे सुनाऊँ पीड़ा अपनी! किसको क्यों मैं दुखी बनाऊँ!”

उनकी कविता ‘कालखंडों का बोझ’ भी उल्लेखनीय है, जिसमें वे दिखाते हैं कि किस प्रकार युवा पीढ़ियाँ मशीनी व्यवस्था में झोंकी जाती रही हैं। वामपंथी दृष्टि से देखें तो यह पूंजीवादी व्यवस्था की आलोचना प्रतीत होती है, हालांकि व्यक्तिगत रूप से वे वामपंथ से सहमत नहीं थे।

युवा जीवन में प्रेम एक महत्वपूर्ण पड़ाव होता है। कविता ‘गर्म रेत पर तेज धूप में’ में कवि अपने प्रिय से अनेक प्रश्न करता है। इसी भावभूमि की कविता ‘प्रेम का तुलसी चौरा’ में वे लिखते हैं—। “तुम्हें तो पता ही होगा कि इसी ज़मीं पर बेजुबान भी समझते हैंप्यार की भाषाऔर महसूस करते हैंनेह-छोह की गंध को।”

उनकी आगे की कविताएँ प्रेम और रूमानियत से ओतप्रोत हैं। हालांकि बाद की रचनाओं में मोहभंग की स्थिति भी दिखाई देती है, विशेषकर ‘यादों की मजार’ जैसी कविताओं में।

अस्सी का दशक सामाजिक और वैचारिक संक्रमण का दौर था और उसकी छाया उनकी कविताओं में स्पष्ट दिखाई देती है।अस्सी के दशक में लघुकथा आंदोलन का उभार महत्वपूर्ण साहित्यिक घटना थी। युवा लेखक बड़ी संख्या में इस विधा की ओर आकर्षित हुए। कृष्ण किसलय भी इस बदलाव से अनभिज्ञ नहीं रहे होंगे। एक संपादक होने के नाते वे साहित्यिक परिवर्तनों को गहराई से देख रहे थे। हालांकि उन्होंने लघुकथाएँ अपेक्षाकृत कम लिखीं। संग्रह में शामिल लघुकथा ‘पहला उपदेश’ सामान्य प्रभाव छोड़ती है, किंतु ‘प्लेटफॉर्म पर’ अत्यंत सशक्त रचना है, जिसमें संपन्न वर्ग के काइयाँपन पर तीखा व्यंग्य किया गया है। इसे पढ़कर लगता है कि यदि वे इस विधा में निरंतर लिखते, तो उल्लेखनीय स्थान प्राप्त कर सकते थे।

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, वे विज्ञान लेखन के प्रति विशेष रूप से समर्पित थे। उनका मानना था कि भारत विज्ञान के माध्यम से ही वास्तविक प्रगति कर सकता है। विज्ञान विषयक उनके लेख विज्ञान प्रगति जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे। वर्ष 2021 में उनके विज्ञान लेखों का संकलन “सुनो, मैं समय हूँ” प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक में शामिल उनकी विज्ञान कथा ‘धरती का शैतान’ उनकी कल्पनाशीलता का प्रमाण है। यदि वे विज्ञान कथाएँ अधिक लिखते, तो भारतीय विज्ञान कथा साहित्य में उनका नाम प्रमुखता से लिया जाता।

सत्तर और अस्सी का दशक रूमानियत और देशभक्ति—दोनों भावनाओं का समय था। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम और भारत-पाक युद्ध के बाद युवाओं में देशभक्ति और जासूसी साहित्य का विशेष आकर्षण था। इसी पृष्ठभूमि में कृष्ण किसलय ने नाटक ‘आवाज़ गूंज उठी’ लिखा, जिसका कई बार मंचन हुआ। उनका दूसरा नाटक ‘समाज ने क्या दिया’ दहेज प्रथा और बेमेल विवाह की समस्या पर आधारित है। इसे पढ़ते हुए प्रेमचंद की याद आना स्वाभाविक है। स्पष्ट है कि वे प्रेमचंद साहित्य से प्रभावित थे। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1980 में उन्होंने डेहरी में प्रेमचंद जयंती का भव्य आयोजन भी किया था।

पूरी पुस्तक पढ़ने के बाद ऐसा लगता है कि यह कृष्ण किसलय के साहित्यिक व्यक्तित्व को सामने लाने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। हालांकि संपादक निशांत राज ने मुख्यतः उनकी साहित्यिक रचनाओं को केंद्र में रखा है। यदि सोनमाटी की पुरानी फाइलों को भी खंगाला जाता, तो उनके पत्रकारिता संबंधी योगदान का अधिक व्यापक चित्र सामने आता। उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया था, जिसका समुचित प्रतिनिधित्व इस संकलन में नहीं हो सका है। आशा है कि भविष्य में इस दिशा में भी गंभीर प्रयास होंगे।

फिलहाल, कृष्ण किसलय के व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने के लिए “लाली” एक महत्वपूर्ण और संग्रहणीय पुस्तक है।

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