रेडियो श्रोता के रूप में मेरी यात्रा : लक्ष्मीकांत मुकुल

बचपन की स्मृतियों में एक हल्की-सी सरसराहट आज भी बज उठती है—जैसे किसी पुराने ट्रांजिस्टर के भीतर से निकलती हुई हवा में तैरती लहरें। वह लहरें केवल ध्वनि नहीं थीं, वे मेरे जीवन में एक नई चेतना की गूँज थीं। मेरे गाँव की रातें उस समय बिजली की चमक से नहीं, बल्कि चाँदनी, लालटेन और रेडियो के मद्धिम उजास से रोशन होती थीं। यही रेडियो मेरे बचपन का पहला ऐसा मित्र था, जिसने मेरे भीतर दूर-दूर की दुनिया का दरवाज़ा खोला।

मेरा गाँव उस समय पूरी तरह से एकांत में बसा था। चारों ओर फैले खेत, नदी की कछार, और बीच में कुछ बिखरे घर। पक्की सड़कें तीन-चार कोस दूर थीं। गाँव का जीवन सुबह की आरती, बैलों की घंटियों और शाम की चरनी में लौटती गायों की आवाज़ों के बीच सिमटा था। दुनिया की हलचल यहाँ तक बहुत देर से पहुँचती थी। समाचार का साधन अधिकतर डाकिया, हाट-बाज़ार या यात्रियों की जुबान हुआ करता था। लेकिन रेडियो ने इस दूरी को जैसे पलों में मिटा दिया।बचपन में जब पहली बार मैंने रेडियो को देखा, तो वह मुझे किसी जादुई डिब्बे से कम नहीं लगा। बेतार का बाजा—यह नाम भी अपने आप में अद्भुत था। बिना किसी तार के बोलने वाला यंत्र! हमारे घर में जब पहली बार किसी पड़ोसी के ट्रांजिस्टर की आवाज़ कानों में पड़ी, तो लगा जैसे कोई अदृश्य जीव भीतर से बोल रहा हो। वहाँ से निकलती विविध भाषाएँ, संगीत की धुनें और समाचार की गम्भीर आवाज़ें मुझे सम्मोहन की तरह खींच लेती थीं।

रेडियो के महत्व का पहला गहरा अनुभव मुझे अक्टूबर 1984 की उस भयावह शाम को हुआ। मैं गली में खेल रहा था। सूरज ढल रहा था, नदी के किनारे बच्चे गेंद खेल रहे थे, और गाँव की औरतें चूल्हा सुलगा रही थीं। तभी अचानक पड़ोसी के रेडियो से यह खबर गूँजी—प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को गोली मार दी गई है। मेरे लिए यह केवल एक समाचार नहीं, बल्कि दुनिया के बदलने का पहला अहसास था। गाँव में किसी को अभी पता भी नहीं था कि दिल्ली में क्या हुआ है, लेकिन रेडियो ने वह दूरी मिटा दी थी। जिस गाँव तक पक्की सड़क भी कई कोस दूर थी, वहाँ सत्ता के गलियारों की हलचल सबसे पहले रेडियो ने ही सुनाई। यही रेडियो मेरे लिए समय का पहला सच्चा दूत बना।

रेडियो केवल समाचारों तक सीमित नहीं था। वह संगीत, कविता, नाट्य और दुनिया के अद्भुत किस्सों का खजाना था। बीबीसी, विविध भारती, वॉयस ऑफ़ अमेरिका, रेडियो मॉस्को, रेडियो ताशकंद—इन सबके नाम ही जैसे रोमांचित कर देते थे। गाँव में जब कोई कहता कि उसने कोई खबर बीबीसी पर सुनी है, तो लोग बिना सवाल किए उसे सच मान लेते। इन प्रसारणों ने मेरी भाषा को नया आयाम दिया। अंग्रेज़ी लहजे की हिंदी, उर्दू की नफ़ासत और भोजपुरी की सहजता—ये सब एक साथ मेरे कानों में उतरते और मेरे शब्दकोश को समृद्ध करते रहे।विविध भारती पर बजने वाले फिल्मी गीत मेरी किशोर कल्पना को रंग देते थे। ‘हवा महल’ के नाटक, ‘संगीत सभा’ के कार्यक्रम और ‘युववाणी’ की चर्चाएँ मेरे भीतर धीरे-धीरे एक नई संवेदनशीलता को जन्म दे रही थीं। वह समय ऐसा था जब रेडियो न केवल मनोरंजन का साधन था, बल्कि वह शिक्षा, संवाद और विचार का भी मंच था।

एक दिन रेडियो पर यह समाचार सुनाई दिया कि हिंदी के महान कवि अज्ञेय का निधन हो गया है। यह नाम मेरे लिए बिल्कुल अपरिचित था। मैं चकित था कि आखिर अज्ञेय कौन थे। उत्सुकता में मैंने अपने हाई स्कूल के हिंदी शिक्षक से पूछा। उनका उत्तर मुझे भीतर तक चुभ गया। उन्होंने कहा—“कवि नामक जीव सूर, तुलसी और कबीर के समय में हुआ करते थे। छायावाद तक कुछ कवि हुए, लेकिन अब तो कवि प्रजाति विलुप्त हो चुकी है।”उनके इस कथन ने मेरे भीतर गहरी निराशा भर दी। मुझे लगा जैसे किसी ने कविता के दरवाज़े को मेरे सामने बंद कर दिया हो। पर इसी निराशा ने भीतर एक सवाल भी जगाया—क्या सचमुच कवि अब नहीं रहे? क्या कविता अब केवल इतिहास की वस्तु बन चुकी है?

इन्हीं दिनों मेरी मुलाक़ात बीबीसी हिंदी सेवा से हुई। रात में धीमी आवाज़ में प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों में पंकज सिंह जैसे कवियों की कविताएँ सुनने का अवसर मिला। उनकी आवाज़ में जो संवेदना थी, वह मेरे भीतर तक उतर गई। शब्दों की गरिमा और विचारों की तीव्रता ने मुझे यह यकीन दिलाया कि कविता आज भी जीवित है। कवि अब भी हमारे समय की साँसों में मौजूद हैं। यही वह क्षण था जब मैंने भी मन ही मन तय किया कि मैं भी इस परंपरा का हिस्सा बनूँगा।

रेडियो के प्रति दीवानगी इतनी बढ़ी कि मैंने अपने गाँव में ‘रेडियो मित्र मंडली’ बनाई। हम बच्चे और किशोर हर रविवार को इकट्ठा होते, नए कार्यक्रम सुनते और उस पर चर्चा करते। बीबीसी के समाचार विश्लेषण पर बहस होती, विविध भारती के गीतों की रैंकिंग तय होती, और कभी-कभी हम अपनी बनाई कविताएँ भी सुनाते। यह छोटा-सा मंच हमारे बौद्धिक विकास की पहली पाठशाला था। रेडियो ने न केवल जानकारी दी, बल्कि हमें विचार करने, सवाल उठाने और अभिव्यक्त होने का साहस भी दिया।

रेडियो ने हमारे पारिवारिक जीवन में भी नई ऊष्मा भरी। रात के खाने के बाद परिवार के सभी सदस्य रेडियो के चारों ओर इकट्ठा हो जाते। बुजुर्ग समाचार सुनते, औरतें गीत-संगीत का आनंद लेतीं, बच्चे कहानियों और नाटकों में खो जाते। यह साझा सुनना हमें एक-दूसरे के और करीब लाता। गाँव के लोग अक्सर अपने ट्रांजिस्टर लेकर दूसरों के घर आते और एक साथ कार्यक्रम सुनते। उस सामूहिकता में एक अद्भुत अपनापन था, जो आज के डिजिटल युग की व्यक्तिगत स्क्रीन में खो गया है।

रेडियो ने मुझे शिक्षा का ऐसा पाठ पढ़ाया, जो किसी किताब में नहीं था। विभिन्न देशों की राजनीति, विज्ञान की नई खोजें, अंतरिक्ष यात्राएँ, साहित्यिक बहसें—सब मेरे भीतर जिज्ञासा और जागरूकता का बीज बोते रहे। वॉयस ऑफ़ अमेरिका के कार्यक्रमों ने मुझे अंतरराष्ट्रीय संबंधों की समझ दी, जबकि रेडियो मॉस्को ने समाजवाद और श्रमिक आंदोलनों की खबरों से मेरे राजनीतिक दृष्टिकोण को गढ़ा। बीबीसी ने वस्तुनिष्ठ पत्रकारिता का मानक सिखाया।

रेडियो पर सुनी कविताएँ मेरे लिए किसी खिड़की की तरह थीं, जिससे मैं अपने भीतर की आवाज़ को पहचानने लगा। पंकज सिंह, रघुवीर सहाय, धूमिल—इन सबकी कविताओं ने मेरे भीतर छुपे कवि को जगाया। धीरे-धीरे मैंने लिखना शुरू किया। खेतों की महक, गाँव की लय, समाज की विसंगतियाँ—सब मेरे शब्दों में उतरने लगे। अगर रेडियो न होता, तो शायद मेरे भीतर यह कवि कभी जन्म ही न ले पाता।

समय के साथ तकनीक बदली। टेलीविज़न आया, फिर मोबाइल और इंटरनेट। रेडियो की लोकप्रियता धीरे-धीरे घटती गई। अब समाचार मिनटों में मोबाइल पर आ जाते हैं। संगीत स्ट्रीमिंग ऐप्स ने विविध भारती की जगह ले ली। लेकिन मेरे भीतर रेडियो का स्थान आज भी अडिग है। उसकी धीमी खरखराहट, स्टेशन बदलते समय की सीटी जैसी आवाज़ और उद्घोषक की स्पष्ट हिंदी—यह सब आज भी मेरे मन में जीवंत है।

आज जब मैं डिजिटल स्क्रीन पर खबरें पढ़ता हूँ या यूट्यूब पर संगीत सुनता हूँ, तो अक्सर वह कसक महसूस होती है। वह सामूहिकता, वह धैर्य, वह साझा आनंद अब कहीं खो गया है। रेडियो सुनने में जो प्रतीक्षा का आनंद था, वह आज की तत्क्षणता में नहीं मिल पाता। पहले हम कार्यक्रम के समय का इंतजार करते, संकेतों की लहरों के साथ ध्वनि पकड़ते, कभी-कभी एंटीना को घुमाते। यह सब एक अनुष्ठान जैसा था, जो आज की मशीनों की सुविधा में गायब हो चुका है।

रेडियो ने मेरे जीवन को दिशा दी। उसने मुझे कवि बनाया, समाज के प्रति सजग किया और दुनिया से जोड़े रखा। उसने मुझे सिखाया कि शब्दों की ताक़त कितनी गहरी होती है। बीबीसी की रात की ख़ामोश प्रसारण से लेकर विविध भारती के सुबह के गीतों तक, हर लहर ने मुझे नया विचार दिया, नई संवेदना दी।

आज जब मैं अपने लिखे शब्दों को देखता हूँ, तो पाता हूँ कि उनमें कहीं न कहीं रेडियो की ध्वनियाँ अब भी गूँज रही हैं। वह मेरी कविता के लय में, मेरी भाषा की सरलता में और मेरे विचारों की व्यापकता में मौजूद है। रेडियो ने मुझे केवल समाचार नहीं दिया, उसने मुझे सोचने का तरीका दिया, दुनिया को देखने की दृष्टि दी।रेडियो का वह युग शायद अब लौटकर नहीं आएगा, लेकिन उसकी स्मृति मेरे भीतर हमेशा जीवित रहेगी। वह केवल एक तकनीक नहीं, बल्कि मेरे बचपन की धड़कन, मेरे यौवन की प्रेरणा और मेरे कवि बनने की पहली सीढ़ी है। आज भी जब कभी रात के सन्नाटे में दूर से किसी पुराने ट्रांजिस्टर की हल्की-सी आवाज़ आती है, तो मुझे लगता है जैसे समय की लहरें फिर से मेरे बचपन तक पहुँच रही हों—जहाँ रेडियो सिर्फ़ एक यंत्र नहीं, बल्कि जीवन की सबसे सजीव कविता था।

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