
डेहरी-ऑन-सोन (रोहतास)। वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का गान और राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने वाला मंत्र है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इसकी रचना की, जबकि श्रीअरविन्द ने इसके आध्यात्मिक और राष्ट्रीय महत्व को व्यापक रूप से उजागर किया। ये बातें श्रीअरविन्द आश्रम के वरिष्ठ साधक डॉ. चरण सिंह केदारखंडी ने श्रीअरविन्द सोसायटी हिंदी क्षेत्रीय समिति के 24वें वार्षिक सम्मेलन में कहीं।
रविवार को आयोजित सम्मेलन में ‘वंदे मातरम् : भारत की आत्मा का गान’ विषय पर व्याख्यान देते हुए डॉ. केदारखंडी ने कहा कि श्रीअरविन्द की दृष्टि में भारत केवल जमीन का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि एक जीवंत मां और शक्ति का स्वरूप है। वंदे मातरम् का उद्घोष इसी शक्ति का आवाहन है। उन्होंने कहा कि गीता के ‘सम्भवामि युगे युगे’ की तरह वंदे मातरम् भी भारत को युग-युग में जागृत करने वाला मंत्र है।
दूसरे वक्ता सूरज प्रताप सिंह राजावत ने कहा कि श्रीअरविन्द ने वर्ष 1907 में ‘वंदे मातरम्’ पत्रिका के माध्यम से देश में राष्ट्रवाद की नई चेतना जगाई। उनके लिए राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक विचार नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक धर्म था। जब हम वंदे मातरम् गाते हैं, तो हम केवल सुजलाम्-सुफलाम् धरती को ही नमन नहीं करते, बल्कि उसमें विद्यमान सनातन चेतना के प्रति भी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। यही भारत की आत्मा है।
राधा की तीर्थयात्रा में प्रेम और भक्ति का रहस्य
सम्मेलन में विद्वान वक्ता डॉ. रितम् उपाध्याय ने ‘राधा की तीर्थयात्रा’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि श्रीअरविन्द और श्रीमाँ ने राधा-भाव को महाशक्ति के रूप में देखा है। राधा के बिना कृष्ण अधूरे हैं और कृष्ण के बिना राधा की यात्रा अधूरी है। उन्होंने कहा कि ‘सम्भवामि युगे युगे’ का रहस्य भी इसी प्रेम में निहित है। भगवान भक्त के प्रेम के कारण ही बार-बार अवतरित होते हैं।

पूर्ण रूपांतरण का मार्ग है श्रीअरविन्द का योग
पुदुचेरी से आए डॉ. आलोक पाण्डेय ने श्रीअरविन्द के पूर्ण योग की अवधारणा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि श्रीअरविन्द का योग किसी एक सिद्धि की प्राप्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि मनुष्य के संपूर्ण रूपांतरण का मार्ग है। उनके अनुसार मनुष्य की वर्तमान मानसिक चेतना अभी अधूरी है। इससे ऊपर अधिमानस और अतिमानस की चेतना के स्तर हैं।
डॉ. पाण्डेय ने श्रीअरविन्द के सिद्धि दिवस 24 नवंबर 1926 के प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि उस दिन श्रीकृष्ण की चेतना के अवतरण और अधिमानस की उपलब्धि को श्रीअरविन्द की साधना परंपरा में विशेष महत्व दिया जाता है। उन्होंने कहा कि सिद्धि दिवस का आध्यात्मिक संदेश आज भी साधकों के लिए साधना का मार्ग प्रशस्त करता है।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने बांधा समां, हृतांभरा के नृत्य ने मोहा मन

सम्मेलन के दौरान आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में कला, संगीत और नृत्य की प्रस्तुतियों ने आयोजन को और भी आकर्षक बना दिया। सतना (मध्य प्रदेश) से आईं युवा कथक नृत्यांगना, कोरियोग्राफर एवं नृत्य शिक्षिका हृतांभरा कुशवाहा ने अपनी भावपूर्ण नृत्य प्रस्तुति से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी नृत्याभिव्यक्ति, भाव-भंगिमाओं और लयबद्ध प्रस्तुतिकरण ने कार्यक्रम में विशेष आकर्षण पैदा किया। दर्शकों ने उनकी प्रस्तुति की सराहना की।
कार्यक्रम में बाहर से आए कलाकारों के साथ शहर के बच्चों ने भी अपनी सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से प्रतिभा का परिचय दिया। बच्चों के उत्साह और कलाकारों की प्रस्तुतियों ने पूरे आयोजन को यादगार बना दिया। सांस्कृतिक कार्यक्रम के माध्यम से भारतीय कला और परंपरा के विविध रंग देखने को मिले।

सम्मेलन में उपस्थित साधकों ने व्याख्यानों को गहरी एकाग्रता और रुचि के साथ सुना। कार्यक्रम का संचालन आलोक तुलस्यान और डॉ. अनिल बाजपेई ने किया। दो दिवसीय सम्मेलन में भाग लेने वाले साधकों के प्रति शाखा अध्यक्ष डॉ. ज्योति उपाध्याय ने धन्यवाद ज्ञापित किया।





