3. तिल-तिल मरने की दास्तां (किस्त-3)

डालमियानगर पर,तिल तिल मरने की दास्तां धारावाहिक पढ़ा। डालमियानगर पर यह धारावाहिक मील का पत्थर सिद्ध होगा। यह धारावाहिक संग्रहणीय है।अतित के गर्त में दबे हुए, डालमियानगर के इतिहास को जनमानस के सामने प्रस्तुत करने के लिए आपको कोटिश धन्यवाद एवं आभार प्रकट करता हूं। आशा है आगे की प्रस्तुति इससे भी अधिक संग्रहणीय होगी।

 अवधेशकुमार सिंह, 

कृषि वैज्ञानिक, स.सचिव : सोनघाटी पुरातत्व परिषद, बिहार 

– by Awadesh Kumar Singh e-mail

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on FaceBook  kumud singh  — हम लोग 10 वर्षों से मैथिली मे अखबार निकाल रहे हैं..उसमें आपका ये आलेख अनुवाद कर लगाना चाहते हैं…हमने चीनी और जूट पर स्टोेरी की है..डालमियानगर पर नहीं कर पायी हूं…आप अनुमति दे तो लगाने का विचार था…

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3. तिल-तिल मरने की दास्तां (किस्त-3)

एक झटके में अर्श से फर्श पर फेेंक दिए गए लाखों लोग, 85 साल पहले डाली गई थी एशिया के सबसे बड़े उद्योगसमूह की नींव, सुभाषचंद्र बोस व डा. राजेंद्र प्रसाद ने किया था उद्घाटन, भारतीय राजनीति के चरित्र व चेहरे को आईना दिखाता है रोहतास इंडस्ट्रीज का खत्म हो जाना, टाइम्स इंडिया के विस्तार में रोहतास इंडस्ट्रीज का मुनाफा भी                                                                   मोहनजोदड़ो-हड़प्पा बन चुका चिमनियों का चमन, सोन अंचल की बड़ी आबादी पर हिरोशिमा-नागासाकी जैसा हुआ असर


डेहरी-आन-सोन (बिहार) – कृष्ण किसलय। बिहार के सबसे बड़े औद्योगिक परिसर डालमियानगर (रोहतास इंडस्ट्रीज) के प्रबंधन ने 09 जुलाई 1984 को अचानक रातोरात फैसला लेकर तालाबंदी की सूचना टांग दी। इससे पहले शायद ही किसी ने कल्पना की हो कि तालाबंदी के एक ही झटके में आवश्यक वस्तुओं का निर्माण करने वाला इतना बड़ा उद्योगसमूह खत्म हो जाएगा और इस पर आश्रित करीब 20 हजारों लोगों का लाखो परिवार अर्श से फर्श पर फेेंक दिया जाएगा।
भारतीय राजनीति के चरित्र व चेहरे को आईना
किसी सरकार के स्थानीय विधायक-सांसद ने रोहतास उद्योगसमूह के मुद्दे को विधानसभा या संसद में नहीं उठाया था और न ही इन विधायकों-सांसदों के जाति-धर्म आधारित भक्तों (फालोवरों) ने अपने नेता पर दबाव बनाने की जरूरत समझी थी। राष्ट्रीय मीडिया में भी यह मुद्दा उपेक्षित रहा। पटना में बैठे पत्रकारों को इसकी ओर न ध्यान रहा, न वाजिब फिक्र। वे राजनीतिक रिपोर्टिंग में ही उलझे रहे। डालमियानगर के कर्मचारियो के पोस्टकार्ड पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा संज्ञान लिए जाने के कारण मामला कोर्ट मेंं एक दशक तक चला। तब किसी राजनीतिक दल के लिए यह रुचि का विषय नहीं रह गया, क्योंकि उन्हें दलगत-व्यक्तिगत लाभ अर्जित नहीं होना था। रोहतास उद्योग का हश्र व इसका इतिहास बन जाना भारतीय राजनीति के चरित्र व चेहरे को आईना दिखाता है।
जनता की अंध दलीय भक्ति का बैरोमीटर भी
कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में इसमें तालाबंदी हुई। राजद सरकार के कार्यकाल में रोहतास इंडस्ट्रीज के संचालक (प्रमोटर) अशोक जैन के कारखाना चलाने से अपना हाथ खींच लेने के कारण और सरकार की ओर से किसी अन्य कारखाना संचालक के लिए माहौल तैयार नहींकिए जाने के कारण कोर्ट के आदेश से रोहतास उद्योगसमूह समापन (वाइंड-अप) में डाल दिया गया और 10 साल पहले रेलवे ने इसके कारखाना परिसर (चीनी मिल परिसर छोड़कर 219 एकड़) को कबाड़ के भाव 140 करोड़ रुपये में खरीद लिया। इसके बाद जदयू और भाजपा की सरकारें आईं, जिनके पास यह बहाना था कि कोर्ट के आदेश में कुछ नहीं किया जा सकता। मृत्युशैय्या पर पड़ा मृत उद्योगसमूह इस राज्य और देश की ढपोरशंख राजनीति का प्रमाणित पैमाना और जनता की अंध दलीय राजनीतिक भक्ति वाली मानसिकता का बैरोमीटर है। जबकि रोहतास इंडस्ट्रीज का मुद्दा सभी जाति, सभी धर्म, सभी वर्ग व सभी दलों से जुड़ा मुद्दा था।
विफल चंद्रशेखर सरकार
रोहतास इंडस्ट्रीज के प्रबंधन के तलाबंदी को राज्य सरकार के श्रम विभाग ने 03 सितम्बर 1984 को अवैध करार दिया और नोटिस भेजकर यह कहा कि सरकार से अनुमति प्राप्त किए बिना व तीन महीने पूर्व सूचना दिए बगैर कंपनी तालाबंदी नहींकर सकती। प्रबंधन तालाबंदी के अपने फैसले पर अड़ा रहा और अंतत: सरकार को सूचना देने के तीन महीने की अवधि पूरा करते हुए 19 सितम्बर 1984 को दूसरी सूचना निकालकर तालाबंदी पर अपनी मुहर लगा दी। तब प्रिंट मीडिया के शहंशाह अशोक जैन से तालाबंदी के फैसले को वापस लेने और मजदूरों व अन्य बकाएदारों का भुगतान कराने में बिहार की चंद्रशेखर सिंह की सरकार विफल रही। और, बाद में रोहतास उद्योगसमूह का मामला कोर्ट की प्रक्रिया में खिंचता चला गया।


85 साल पहले डाली गई थी नींव
आज से 85 साल पहले रामकृष्ण डालमिया ने अपने छोटे भाई जयदयाल डालमिया के साथ मिलकर सोन नद तट के शहर डेहरी-आन-सोन के पाश्र्व में मथुरी, मकराईं, सिधौली, बांक आदि गांवों से जमीन लेनी शुरू की और रोहतास इंडस्ट्रीज (पहले चीनी मिल) की नींव रखी थी और बिहार का सबसे खूबसूरत उपनगर बसाया डालमियानगर, जिसका आवासीय और कारखाना परिसर धीरे-धीरे विस्तार पाता गया। डालमियानगर आने से एक साल पहले रामकृष्ण डालमिया ने आरा के जमींदार निर्मल कुमार जैन के साथ मिलकर दानापुर के निकट बिहटा में साउथ बिहार शुगर मिल लिमिटेड की स्थापान की थी, जो तब देश की सबसे बड़ी चीनी मिल थी।
सुभाषचंद्र बोस व डा. राजेंद्र प्रसाद ने किया था उद्घाटन
1933 में 30 लाख रुपये की अधिकृत पूंजी और 16 लाख रुपये से अधिक की रकम पब्लिक इंश्यू के जरिये जुटाकर डालमियानगर परिसर में रोहतास शुगर लिमिटेड की स्थापना हुई थी, जिसका कार्यालय रेलवे स्टेशन से सटे मजदूर सेवा संघ के नन्हें भवन में शुरू किया गया था। इसके एक हजार टन प्रति दिन ईंख पेरने वाली मिल (मशीन) का उद्घाटन कांग्रेस के प्रथम राज्य अध्यक्ष सर सुलतान अहमद ने किया था। तीन साल में इस चीनी कारखाने की क्षमता प्रति दिन 1800 टन ईख पेरने की हो गई। 1936 में कंपनी का नाम बदलकर रोहतास इंडस्ट्रीज कर दिया गया, क्योंकि परिसर में कई तरह के कारखाने लगाने की योजना डालमिया और जैन बंधुओं ने बनाई। 1938 में सीमेंट कारखाने का उद्घाटन स्वाधीनता संग्राम के सुप्रसिद्ध योद्धा सुभाषचंद्र बोस (आजाद हिंद फौज के संस्थापक) ने और 1939 में प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी डा. राजेन्द्र प्रसाद (भारत के प्रथम राष्ट्रपति) ने कागज कारखाने का उद्घाटन किया था। 1939 में ही रासायनिक कारखाना और 1944 में वनस्पति (हनुमान ब्रांड) व एस्बेस्टस कारखाना की स्थापना हुई।

टाइम्स इंडिया के विस्तार में रोहतास इंडस्ट्रीज का मुनाफा भी

1946 में रामकृष्ण डालमिया ने दो करोड़ रुपये में दुनिया के सर्वाधिक प्रसारित अंग्रेजी अखबार टाइम्स इंडिया की प्रकाशक कंपनी बेनेट कोलमैन एंड कंपनी को खरीदा और 2.5 करोड़ में अपने दामाद शांति प्रसाद जैन को 1948 में बेच दिया। टाइम्स इंडिया समूह के विस्तार में रोहतास इंडस्ट्रीज का मुनाफा भी लगाया जाता रहा। 1838 में विदेशी प्रकाशक द्वारा स्थापित 11 हजार कर्मचारियों वाली इस कंपनी का सालान टर्नओवर 12 हजार करोड़ रुपये से ऊपर है और शांति प्रसाद जैन की बड़ी बहू (अशोक जैन की पत्नी) इसकी अध्यक्ष, इनके बेटे समीर जैन उपाध्यक्ष हैं।
(अगली किस्त में जारी रोहतास उद्योगसमूह के स्थापित होने से मृत होने तक की कहानी)

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