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तिल-तिल मरने की दास्तां (अंतिम किस्त 13)

वाट्सएप र प्रतिक्रिया : धारावाहिक तिल-तिल मरने की दास्तां बहुत सारगर्भित स्टोरी है, बहुत विस्तृत और शोधपूर्ण लेख है। यह आंख खोलने वाली समाचारकथा है। बधाई। मैंने भी जनसत्ता में एक बार इस मसले  (मृत रोहतास उद्योगसमूह, डालमियानगर, बिहार)     पर लिखा था।                                                                                          – कौशलेन्द्र प्रपन्न, वरिष्ठ लेखक-पत्रकार (दिल्ली)


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रोहतास उद्योगसमूह पर परोक्ष-अपरोक्ष रूप से आश्रित करीब 20 हजार परिवार अर्थात कम-से-कम एक लाख लोग तालाबंदी के कारण वक्त के कूड़ेदान में फेेंक दिए गए, जिनके जीने-मरने और अस्तित्व रक्षा के संघर्ष की करुण कहानी है ‘तिल-तिल मरने की दास्तांÓ

एशिया प्रसिद्ध रहे भारत के तीन बड़े औद्योगिक घरानों (टाटा, बिड़ला व डालमिया) में से एक के डालमियानगर में 85 साल पहले स्थापित रोहतास उद्योगसमूह पर आश्रित कर्मचारियों-कारोबारियों की दो पीढिय़ां बर्बाद हो चुकी हैं। 34 साल पहले 1984 में इस विशाल कारखाने को कबाड़ में तब्दील कर दिए जाने का असर रोहतास जिले (मुख्य तौर पर डेहरी-आन-सोन) के साथ एक हद तक बिहार के सोन अंचल के औरंगाबाद, कैमूर, भोजपुर, बक्सर, पलामू, पटना जिलों की भी आबादी व अर्थव्यवस्था पर वैसा ही हुआ, जैसा जापान के शहरों हिरोशिमा व नागासाकी पर परमाणु बम गिराने के बाद हुआ था। रोहतास उद्योगसमूह को भारतीय औद्योगिक इतिहास का हड़प्पा मोहनजोदड़ो बना दिया जाना विश्व में अपनी तरह की सबसे भीषण त्रासदी है। फिर भी यह न तो भोपाल गैस कांड की तरह राष्ट्रीय मीडिया में चर्चा का विषय बना, न ही राजनीतिक दलों ने गंभीरता से मुद्दा बनाया और न ही इसके दीर्घकालिक प्रभाव पर गंभीर समाजशास्त्रीय अध्ययन हुआ। इस उद्योगसमूह पर आश्रित कर्मचारियों-कारोबारियों और उनके बेटे-बेटियों को अभी तक न्यायालय से संपूर्ण न्याय नहीं मिला है। जबकि वे किसी इमदाद नहीं, उद्योगसमूह की संपत्ति में स्वाभाविक हकदार हैं।

आश्चर्यपूर्ण यह सवाल अभी भी खड़ा है कि आखिर इतना बड़ा उद्योगसमूह बंद कैसे हो गया? यह यक्ष प्रश्न आज भी पूरी तरह अनुत्तरित है। डालमियानगर जैसे औद्योगिक परिसर को जमीन पर उतरना हो तो आज 25-50 हजार करोड़ रुपये की पूंजी व बड़ी संख्या में दक्ष मानव संसाधन जुटाने के साथ दशकों तक क्रमबद्ध निर्माण कार्य करना होगा। इस उद्योगसमूह का खत्म हो जाना भारतीय समाज की मेधा, उद्यमिता, राजनीतिक व संस्थागत इच्छाशक्ति, व्यावसायिक योग्यता, ईमानदारी, सामाजिक सरोकार और लोकतंत्र के स्वरूप पर भी सवाल है, जिसके लिए व्यवस्था के अंग विधायिका (संसद व विधानसभा), न्यायपालिका व कार्यपालिका के साथ जनता, कारोबारी वर्ग सभी जिम्मेदार हैं। चिमनियों के चमन डालमियानगर औद्योगिक परिसर के मरघट के सन्नाटे में तब्दील कर दिए जाने के कई कारण हैं।
प्रस्तुत है, कृष्ण किसलय की कलम से दुर्लभ समाचारकथा।

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तिल-तिल मरने की दास्तां (अंतिम किस्त 13)

– कृष्ण किसलय

वास्तव में, 19वी सदी के पूर्वाद्ध में स्थापित संपूर्ण सोन अंचल और बिहार ही नहीं, भारत के भी औद्योगिक ध्वज रहे डालमियानगर रोहतास उद्योगसमूह का मृत होना ऐसी दर्दभरी कथा है, जिसके असर को बिना अपराध किए ही हजारों परिवारों की पीढियों को भुगतना पड़ा। यह आने वाली पाढिय़ों के लिए सर्द मौसम की टिस बनकर उभरते रहने वाली हकीकत है।

हालांकि यह भी माना जा सकता है कि अशोक जैन ने पूर्व नियोजित योजना के तहत कारखानों को बंद नहीं किया, बल्कि भारी निराशा-हताशा की स्थिति में ही रोहतास इंडस्ट्रीज से हाथ खींच लेने का फैसला लिया था। अन्यथा पूंजी जुटाने के लिए वे बांक फार्म, सूअरा हवाई अड्डा की जमीन व अन्य संपत्ति बेच सकते थे। पूर्व योजना होती तो वह धीरे-धीरे संपत्ति का निष्पादन करते और अंत में फैक्ट्री बंद करते। जीवन के अप्रत्याशित विकट समय में ही लिए निर्णय से उन्होंने अपना हाथ डालमियानगर से काट लिया।

तालाबंदी के बाद स्थिति को अपने पक्ष में करने के लिए अशोक जैन ने कई स्तरों पर शीर्ष प्रयास भी किए थे। इसी क्रम में सहकारिता सम्राट एवं तत्कालीन स्थानीय सांसद तपेश्वर सिंह अशोक जैन के साथ प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से अक्टूबर 1984 में मिले थे, मगर इसी महीने (31 अक्टूबर) इंदिरागांधी की हत्या कर दी गई। जब सुप्रीम कोर्ट की ओर से पुनर्वास आयुक्त की नियुक्ति बिहार सरकार ने की, तब टाइम्स आफ इंडिया में बड़े कारपोरेट अधिकारी के रूप में कार्यरत गोपाल मोहन डालमियानगर गेस्ट हाउस में आकर रुके थे। जाहिर है, वह अशोक जैन या जैन परिवार के वरिष्ठ सदस्य द्वारा जरूरतवश भेजे गए होंगे।

गोपाल मोहन डालमियानगर में तालाबंदी से पहले कंपनी सचिव के पद पर कार्यरत थे। तब उन्होंने इस लेखक (कृष्ण किसलय) से बातचीत में कहा था कि रोहतास उद्योगसमूह इस देश का औद्योगिक हाथी है। हाथी जमीन पर गिर पड़े तो फिर उसका उठना बेहद मुश्किल होता है। गोपाल मोहन आज भी टाइम्स आफ इंडिया में वरिष्ठ महाप्रबंधक स्तर के पद पर हैं।

… और रो उठे थे अशोक जैन !
एक और उदाहरण है, जब अशोक जैन लगभग रो उठे थे। दिल्ली एयरपोर्ट पर अशोक जैन की मुलाकात डालमियानगर के प्रसिद्ध समाजवादी श्रमिक नेता व बिहार के उद्योग मंत्री बसावन सिंह की पत्नी कमला सिन्हा (सांसद) से हुई थी। तब अशोक जैन डालमियानगर का नाम आते ही सुबक उठे थे। जाहिर है कि अशोक जैन जिस डालमियानगर में बचपन से पले-बढ़े, खेले-कूदे, वहां की न जाने कितनी स्मृतियां उनके दिल-दिमाग में होंगी? डालमियानगर के श्रमिक नेता नागेश्वर बताते हैं, उन्होंने दिल्ली एयरपोर्ट के वीआईपी लाउंज में अशोक जैन को दूसरी बार देखा था। नागेश्वर ने इससे पहले अशोक जैन को पहली बार कमला सिन्हा के सरकारी सांसद आवास पर देखा था। वह अशोक जैन को नहीं पहचानते थे।

सांसद कमला सिन्हा से मिलने आई देश की वह औद्योगिक हस्ती
राज्यसभा सांसद कमला सिन्हा से मिलने आए अशोक जैन कमला सिन्हा के बाहर निकलने तक गेस्ट रूम में बैठे नहीं, सिर्फ चक्कर लगाते रहे थे। कमला सिन्हा के राजदूत बनने पर नागेश्वर उनके आप्त सचिव बन सपरिवार विदेश में भी रहे थे। कमला सिन्हा के सांसद आवास पर अशोक जैन ने नागेश्वर से पूछा था कि कहां के रहने वाले हैं? नागेश्वर ने डालमियानगर बताया तो अशोक जैन ने डालमियानगर के बारे में कई सवाल किए। नागेश्वर समझ गए कि इस आदमी को डालमियानगर के बारे ईंच-ईंच जमीन जैसी जानकारी है। उन्होंने पूछा, आप कौन? उत्तर मिला, मुझे अशोक कहते हैं। तब नागेश्वर ने आदर के साथ हाथ जोड़ लिए। उनके सामने डालमियानगर ही नहीं, देश की औद्योगिक हस्ती खड़ी थी।
फिर कभी मुलाकात-बात नहीं हुई
कमला सिन्हा के आते ही नागेश्वर कमरे से बाहर निकल गए। कमला सिन्हा से बातकर बाहर आने पर अशोक जैन ने नागेश्वर से कहा था, आपसे बात करेंगे। मगर उनकी फिर कभी अशोक जैन से बात-मुलाकात नहींहुई। वह जमाना मोबाइल फोन का नहींथा और नागेश्वर तब रोहतास उद्योगसमूह की इकाई पाश्र्वाप्रापर्टी लिमिटेड (पिपराडिह) में देवकीनंदनप्रसाद के नेतृत्व वाले श्रमिक संगठन से नए-नए जुड़े थे। अशोक जैन ने नागेश्वर से श्रमिक नेताओं युदवंश सिंह, सिद्धनाथ सिंह के बारे में भी पूछा था, जिनकी विश्वसनीयता श्रमिकों के बीच बेहद कम हो गई थी।
10 वर्ष पहले क्यों आकार नहीं ग्रहण कर सका रेल कारखाना ?
तालाबंदी के 24 साल बाद कांग्रेस के साथ केेंद्र सरकार में रेल मंत्री रहे लालू प्रसाद द्वारा 22 नवम्बर 2008 को वैगन बोगी व कप्लर बनाने के लिए रेल कारखाने का शिलान्यास डालमियानगर फुटबाल मैदान में किए जाने से डेढ़ साल पहले रेलवे ने डालमियानगर परिसर की 219 एकड़ जमीन (कागज, सीमेंट, एसबेस्टस, वनस्पति, स्टील फाउंड्री, पावर हाउस आदि कारखानों की स्क्रैप मशीनों सहित शुगर मिल परिसर छोड़कर) खरीदी था, जिसका कागजात व चाबियां डालमियानगर स्पेशल गेस्ट हाउस में 11 अप्रैल 2007 को शासकीय समापक गुलाबचंद यादव ने मुगलसराय मंडल के एडीआरएम एच. राव को सौंपी थीं। लालू प्रसाद का रेल कारखाना शिलान्यास आखिर क्यों अमली आकार ग्रहण नहीं कर सका?

इसलिए नहीं हो पा रहा भरोसा
इस सवाल पर लालू प्रसाद के दल (राजद) से विधायक (ओबरा, औरंगाबाद) रहे सत्यनारायण सिंह (अब वरिष्ठ भाजपा नेता) कहते हैं कि इस क्षेत्र से कई बार सांसद रहीं राजद की डा. कांति सिंह ही इसका बेहतर जवाब दे सकती हैं। इस क्षेत्र व डालमियानगर परिसर में विकास की व्यापक संभावनाएं हैं। डेहरी चेस क्लब के संस्थापक संयोजक दयानिधि श्रीवास्तव (भरत लाल) का कहना है कि लालू प्रसाद का शिलान्यास राजनीतिक हवाबाजी साबित हुई। इसीलिए रेलवे द्वारा नया प्रोजेक्ट लगाने की बात पर लोगों को भरोसा नहींहो पा रहा है। हाई कोर्ट में वैधानिक व तकनीकी अवरोध दूर कर डालमियानगर जेनरल आफिस व अस्पताल भवन परिसर का उपयोग मेडिकल कालेज बनाने के लिए किया जा सकता है, जिसका बिहार में भारी अभाव भी है। इस दिशा में किसी राजनीतिक दल ने पहल नहींकी है।
डेहरी के पूर्व विधायक एवं राष्ट्र सेवा दल के अध्यक्ष प्रदीप जोशी भी मानते हैं कि दृष्टि स्पष्ट,नीयत साफ हो तो डालमियानगर परिसर का उपयोग देश-प्रदेश व स्थानीय लोगों की बेहतरी के लिए आज भी किया जा सकता है। जैसाकि बांक फार्म खरीद कर कारखाना लगाने और लोगों को रोजगार देने का काम किया गया।
मध्य बिहार लघु उद्योग संघ के उपाध्यक्ष व रोहतास री-रोलिंग मिल के संचालक रहे कारपोरेट कारोबारी अरुणकुमार गुप्ता मानते हैं कि डालमियानगर के बंद होने में प्रबंधकीय विफलता के साथ रा-मैटेरियल, बड़ी पूंजी का अभाव, तकनीकी पिछड़ापन, वन पार्यवरण कानून आदि बड़े कारण रहे हैं। दक्ष मानव संसाधन जुटाने के लिए तो डालमियानगर के संस्थापक रामकृष्ण डालमिया ने अपने पुश्तैनी गांव चिरांवा (राजस्थान) से जुड़े काबिल लोगों को बुलाया था, जिनमें विष्णु प्रसाद पोद्दार, ओंकारमल डालमिया, शिवहरि सिंघानिया (भगवती वस्त्रालय, रहमत मार्केट) के पिता, गंगादयाल शर्मा (ठेकेदार संत शर्मा के पिता) जैसे लोग थे। देश की आजादी के बाद डालमियानगर की कमान संभालने वाले शांतिप्रसाद जैन ने भी बिजनौर (पश्चिमी उत्तर प्रदेश) के अपने इलाके से तेजतर्रार लोगों को डालमियानगर में नौकरी दी, जिनमें उनके पिता बाबूलाल शर्मा आदि थे।

अब उम्मीद की नई किरण !
बहरहाल, डालमियानगर के कारखाना परिसर वाले हिस्से की आरंभिक मालिक अब रेलवे है। रेलवे की जोनल उपभोक्ता सलाहकार समिति के सदस्य व डेहरी-आन-सोन के वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र मिश्र और डेहरी चैंबर्स आफ कामर्स के सचिव अमितकुमार कश्यप बबल का कहना है कि रेल कारखाने के लिए केेंद्रीय मानव संसाधन राज्यमंत्री (स्थानीय सांसद काराकाट क्षेत्र, बिहार) उपेन्द्र कुशवाहा की पहल सकारात्मक दिशा में है।

बबल कश्यप बताते हैं, रेलवे के वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष उन्होंने शहर की भावना व दर्द को तार्किक तरीके से रखा था। शहर के कारोबारी होने के नाते डालमियानगर की व्यथा से वह गहरे जुड़े रहे हैं। डेहरी-आन-सोन का विकास उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा है, जिसके लिए वह बतौर डेहरी विकास मोर्चा अध्यक्ष आवाज उठाते रहे हैं।

उपेन्द्र मिश्र के अनुसार, बीते वर्ष 25 अगस्त को पूर्व-मध्य रेल (सीएमई अनिल शर्मा) और राइट्स (समूह महाप्रबंधक अनिल विज) के बीच मेमोरेंडम आफ अंडरस्टैंडिंग पर हस्ताक्षर के बाद 10 नवम्बर को कारखानों के स्क्रैप को हटाने की निविदा भी निकाली गई। रेलवे प्रोजेक्ट अपनी दिशा की ओर है, जिसकी जिम्मेदारी रेलवे के वाणिज्यिक उपक्रम राइट्स को दी गई है। जैसी वस्तुस्थिति सामने ह ै, इस बार हश्र लालू प्रसाद के शिलान्यास जैसा नहीं होना चाहिए। (समाप्त)

– कृष्ण किसलय,

  समूह संपादक,

सोनमाटी मीडिया समूह

 

डालमिया बंधुओं द्वारा स्थापित और जैन बंधुओं द्वारा विस्तारित डालमियानगर (डेहरी-आन-सोन, बिहार) स्थित एशिया प्रसिद्ध भारत के विशाल उद्योगसमूह रोहतास इंडस्ट्रीज लिमिटेड के काल-कवलित होने की शोधपूर्ण प्रामाणिक कहानी (तिल-तिल मरने की दास्तां) सोनमाटीडाटकाम में इस 13वीं किस्त के साथ समाप्त होती है। तिल-तिल मरने की दास्तां सोनमाटी मीडिया समूह के प्रिंट संस्करण (सोनमाटी, 5+20 feb.) में 12 पेज के विशेष खंंड के रूप में भी प्रकाशित हो चुकी है।       -समूह संपादक

तस्वीरें व समन्वय : सोनमाटी मीडियासमूह के  प्रबंध संपादक निशांत राज  व संपादकीय समन्वय मंडल (उपेन्द्र कश्यप, मिथिलेश दीपक,  अवधेशकुमार सिंह)

 

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