औरंगाबाद : मतदाताओं के मन से क्या टूटेगा मिनी चितौडग़ढ़ के मनोवैज्ञानिक दुर्ग का तिलस्म?

औरंगाबाद (बिहार)- कृष्ण किसलय। आजादी के बाद कांग्रेस उम्मीदवार की अनुपस्थिति में पहली बार हो रहे औरंगाबाद संसदीय क्षेत्र के चुनाव में क्या मतदाताओं के मन से मिनी चितौडग़ढ़ के रूप में स्थापित मनोवैज्ञानिक दुर्ग का तिलस्म ध्वस्त होगा? औरंगाबाद संसदीय क्षेत्र राजपूतों की अधिक मत-संख्या होने से जम्हूरियत की सियासी जंग में बिहार में मिनी चितौडग़ढ़ के नाम से चर्चित रहा है। इसलिए कि यहां मुकाबला चाहे पक्ष हो या विपक्ष, राजपूत उम्मीदवारों के बीच ही होता रहा है। मगर 2009 के परिसीमन के बाद यहां यादव और कुशवाहा मतदाताओं की संख्या का जोड़ भी राजपूतों के बराबर हो चुका है। यहां राजपूत मतदाता कुल मतदाता (1737821) का 17.5 फीसदी हैं, जबकि यादव वोटर करीब 10 फीसदी, कुशवाहा वोटर 8.5 फीसदी और मुस्लिम वोटर भी करीब 8.5 फीसदी हैं। अनुसूचित जाति और महादलित मतदाता 19 फीसदी हैं।
सभा करने नहीं पहुंचा कांग्रेस का कोई दिग्गज नेता
छोटे साहब के नाम से लोकप्रिय रहे भूतपूर्व मुख्यमंत्री सत्येन्द्रनारायण सिंह के परिवार को या फिर कांग्रेस पार्टी को टिकट नहीं दिए जाने के कारण इस क्षेत्र के कांग्रेस कार्यकर्ताओं की नाराजगी के मद्देनजर यहां कांग्रेस का कोई दिग्गज नेता महागठबंधन की ओर से सभा करने नहीं पहुंचा। छोटे साहब ने इस संसदीय सीट से छह बार चुनाव जीता था। उनके पुत्र पूर्व आईपीएस अधिकारी निखिल कुमार, जो नगालैंड और केरल के राज्यपाल भी रह चुके हैं, ने एक बार और पुत्रवधू श्यामा सिंह भी एक बार चुनाव जीत चुकी हैं। औरंगाबाद लोकसभा क्षेत्र आजादी के बाद लंबे समय तक कांग्रेस का गढ़ बना रहा। सत्येन्द्रनारायण सिंह के पिता डा. अनुग्रहनारायण सिंह बिहार में कांग्रेस के बड़े नेता और प्रख्यात स्वाधीनता सेनानी थे, जो ‘विहार विभूतिÓ के नाम से लोकप्रिय थे और जिनके नाम पर अनुग्रहनारायण रेलवे स्टेशन है। उनकी प्रतिष्ठा की वजह से उनके परिवार का भी राजनीति में सम्मानजनक दखल रहा। जब 1961 में सत्येंद्र नारायण सिंह बिहार के मंत्री बनाए गए, तब यहां से उपचुनाव में कांग्रेस के ही रमेश प्रसाद सिंह सांसद चुने गए थे, जिनकी स्मृति में औरंगाबाद के मुख्य चौक को रमेश चौक नाम दिया गया।

कांग्रेस के विरोध में भी रहे छोटे साहब
1962 के चुनाव में रमेश प्रसाद सिंह स्वतंत्र पार्टी की ललिताराजे लक्ष्मी से हार गए थे, जिनके बाद 1967 में कांगेस के उम्मीदवार मुद्रिका सिंह की जीत हुई थी। 1971 में सत्येंद्र नारायण सिंह ने संगठन कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ा और कांगेस के मुद्रिका सिंह को पराजित किया। इसके बाद 1977 और 1980 के लोकसभा चुनाव में भी सत्येन्द्र नारायण सिंह जीते और 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस के प्रति सहानुभूति की आंधी के बावजूद वह कांग्रेस के डा. शंकरदयाल सिंह को पराजित करने में कामयाब रहे। सत्येंद्र नारायण सिंह 1989 में बिहार के मुख्यमंत्री बने तो कांग्रेस ने उनकी पुत्रवधू श्यामा सिंह को उम्मीदवार बनाया, जो जनता दल के रामनरेश सिंह उर्फ लूटन सिंह से करीब 57 हजार मतों से हार गईं। लूटन सिंह सत्येंद्रनारायण सिंह के ही एक चर्चित चुनावी सेनानायक थे।
मतदान पहले चरण में 11 अप्रैल को
इस संसदीय क्षेत्र में पहले चरण में ही चुनाव 11 अप्रैल को होना है। मुख्य मुकाबला एनडीए के भाजपा सांसद सुशील कुमार सिंह और महागठबंधन के ‘हमÓ प्रत्याशी उपेंद्र प्रसाद के बीच माना जा रहा है। इन दोनों उम्मीदवारों के अलावा औंरंगाबाद संसदीय क्षेत्र से बसपा के नरेश यादव, स्वराज पार्टी (लोकतांत्रिक) के सोमप्रकाश सिंह (पूर्व विधायक), अखिल हिन्द फारवर्ड ब्लाक (क्रांतिकारी) के डा. धर्मेन्द्र कुमार, पीपुल्स पार्टी आफ इंडिया (डेमोक्रेटिक) के अविनाश कुमार और निर्दलीय संतोष कुमार सिंह, धीरेंद्रकुमार सिंह, योगेन्द्र राम चुनाव के मैदान में हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के सुशील कुमार सिंह ने 307941 मत प्राप्त कर विजय हासिल की थी। कांग्रेस के निखिल कुमार को 241594 मत मिले थे। 2014 में सुशील कुमार सिंह को 20 फीसदी, निखिल कुमार (कांग्रेस) को 15 फीसदी और बागी कुमार वर्मा (जदयू) को आठ फीसदी मत मिले थे। 2004 में समता पार्टी के उम्मीदवार रहे सुशील कुमार सिंह कांग्रेस के निखिल कुमार से हार गए थे, जबकि 2009 में जदयू के प्रतिनिधि के रूप में राजद के सकील अहमद खां को हराया था। इस तरह 1952 से 1984 तक इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कांग्रेस के सत्येन्द्र नारायण सिंह ने और इसके बाद 1989, 1991 में रामनरेश सिंह उर्फ लूटन सिंह (जनता दल), 1996 में वीरेंद्र सिंह (जनता दल), 1998 में सुशील कुमार सिंह (समता पार्टी), 1999 में श्यामा सिंह (कांग्रेस) ने संसद में किया। भाजपा उम्मीदवार सुशील कुमार सिंह राजपूत जाति से हैं, जबकि उपेंद्र प्रसाद कुशवाहा जाति से हैं और चुनाव से ठीक पहले जदयू को छोड़कर हम के टिकट पर औरंगबाद लोकसभा क्षेत्र से पहली बार लड़ रहे हैं। इस कारण भी इस बार का चुनाव अत्यन्त दिलचस्प माना जा रहा है।

लालू प्रसाद की सोची-समझी रणनीति !
माना जा रहा है कि कांग्रेस के गढ़ रहे औरंगाबाद सीट पर कांग्रेस को तरजीह नहीं देने के पीछे लालू प्रसाद यादव की सोची-समझी रणनीति है। कन्हैया कुमार को महागठबंधन की ओर से टिकट नहीं देने के पीछे यह धारणा मानी गई है कि लालू प्रसाद पुत्र तेजस्वी यादव के युवा नेतृत्व की चमक की राह निष्कंटक बनाए रखना चाहते हैं। समझा जा रहा है कि कुछ वैसी ही सोच कांग्रेस को टिकट नहीं देने को लेकर रही है कि यदि सत्येन्द्र नारायण सिन्हा के पुत्र निखिल कुमार जीत गए तो तेजस्वी यादव के निष्कंटक मुख्यमंत्री बने रहने के भविष्य के लिए बाधा पैदा हो सकती है। इसीलिए लालू प्रसाद ने कांग्रेस को राज्यसभा के लिए एक सीट देने का आश्वासन दिया है। यह घोषित नहीं है कि किसे दिया जाएगा, पर माना जा रहा है कि यह निखिल कुमार के लिए हो सकता है। लालू प्रसाद की बड़ी बेटी मीसा भारती इस बार चुनाव लड़ रही हैं, जबकि वह राज्यसभा सदस्य हैं और उनका कार्यकाल 2022 में खत्म होना है। जाहिर है, वह लोकसभा चुनाव जीतीं तो उनकी राज्यसभा सीट खाली होगी और राजद किसी क्षतिपूर्ति का समायोजन करेगा। बहरहाल, औरंगाबाद लोकसभा क्षेत्र के मतदाता 17वीं लोकसभा में किसे प्रतिनिधि चुुनकर भेजा जाए, यह फैसला अपने मन में ले चुके हैं। इंतजार 11 अप्रैल के मतदान और 29 मई को होने वाली मतगणना का है।
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