कबीरा गर्व न कीजिए, काल गहे कर केस

कबीर जयंती पर विशेष

KABIR DAS-sonemattee,com

प्रयागराज (सोनमाटी समाचार नेटवर्क)। सुप्रसिद्ध समाज सुधारक एवं संत कवि कबीर दास ने गर्व के बारे में अत्यंत सुंदर व्याख्या की है। उन्होंने कहा है कि गर्व नहीं करना चाहिए। गर्व अर्थात घमंड एक ऐसा अवगुण है जो प्रायः सभी में पाया जाता है। मनुष्य और देवताओं में कोई भी इससे अछूता नहीं है।

 प्रभुत्व अर्थात जब हम कहीं शीर्ष पर पहुंचते हैं तो अहंकार आना स्वाभाविक है। इसीलिए संत कबीर दास जी ने हमें  सचेत किया है कि गर्व करना उपयुक्त नहीं है। सभी काल के वशीभूत हैं और वह कभी देश या प्रदेश में कहीं भी किसी भी क्षण काल के गाल में जा सकते हैं। इसीलिए कबीर जी ने यह दर्शाया है कि सबका केस काल ने पकड़ रखा है। वह जब चाहे तब जहां चाहे जिस स्थिति में आप हैं। उसी दशा में वह आपको अपने अधीन कर सकता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी  श्री रामचरितमानस में कई स्थानों पर इस बात का उल्लेख किया है कि जब यह सुनिश्चित है कि जो जन्म लेता है। उसकी  मृत्यु  भी होती है तो हम किस बात का घमंड करें इसीलिए उन्होंने लिखा कि

 ” प्रभुता पाई काह मद नाही ”

हम अपने अहंकार को स्वयं पोषित करते हैं और उसके उपरांत विवेक खो बैठते हैं। जिससे सत्य असत्य का ज्ञान भी नहीं रह जाता और एक अविवेकी जीव कुछ भी कर सकता है।

 घमंडी का सिर हमेशा  नीचा  होता है और घमंड ईश्वर का आहार होता है इसीलिए समय-समय पर वह अपने अति प्रिय  भक्तों  को भी उनके घमंड का शमन करके उन्हें सदा सत्य मार्ग पर ले आता है। सभी योनियों में जो शक्तिशाली है कमजोर के समक्ष अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता है। इसलिए घमंड से दूर रहने की शिक्षा सभी मनीषियों ने दी है। कबीर दास जी ने लिखा है 

 “ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोय   औरन को शीतल करे आपहु शीतल होय”

इसी विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए फिर एक जगह कबीर दास जी और लिखते हैं कि 

 ” कबिरा कहा गरब्बियो ऊंचे देखि अवास  काल परे भुइं लेटणा ऊपर जामे घास”

   किंतु ज्ञान के अभाव में हम यह भूल जाते हैं कि हमारे जीवन की डोर किसी और के हाथ में बंधी है। ऐसा कोई कार्य न करें, जिससे हमारा अंत ठीक ना हो। कबीर दास जी ने समाज सुधार के क्षेत्र में अपने दोहों के माध्यम से बहुत सी बातें समाजोपयोगी रखी हैं। प्रत्येक  सामाजिक विसंगतियों पर लोगों को  सचेत  किया जो भी मानवीय दुर्गुण हैं। उनके प्रति प्रायः सभी समाज सुधारक और संत मनीषी  सचेत करते रहते हैं। फिर भी हम उनका पालन नहीं करते जीवन में हमें यदि कुछ सार्थक करना है और सही दिशा की ओर बढ़ना है तो हमें   अहंकार  को अपने पास नहीं आने देना है। हम यंत्र से दूर रहकर कुछ भी करेंगे तो उसका परिणाम सुखद ही होगा।

 डा० भगवान प्रसाद उपाध्याय प्रयागराज 8299280381

   ( इनपुट : निशांत राज

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