आधुनिक परिप्रेक्ष्य में गुरु-शिष्य-परंपरा की विरासत

शिक्षक दिवस

-अंगद किशोर
इतिहासकार, शिक्षक एवं अध्यक्ष सोन घाटी पुरातत्व परिषद, जपला पलामू

Teacher Day

भारत में गुरु-शिष्य-परम्परा की समृद्ध विरासत प्राचीन काल से चली आ रही है। गुरु के प्रति श्रद्धा तथा शिष्य के प्रति स्नेह का भाव इस परंपरा की विरासत और प्राण है। प्राचीन काल में दोनों के मध्य रिश्ता का आधार एक दूसरे के प्रति अपनत्व और समर्पण का भाव था। परंपरागत गुरु-शिष्य-संबंध का आकलन करने पर हम पाते हैं कि भारतीय संस्कृति और परंपरागत व्यवहार में गुरु का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण और सम्माननीय है। गुरु को केवल ब्रह्मा, विष्णु और शिव ही नहीं, अपितु परब्रह्म के तुल्य माना गया है।यह बात कटु, किंतु यथार्थ है कि संप्रति शिक्षक और शिक्षार्थी का संबंध औपचारिक और व्यावसायिक हो गया है। बदलती परिस्थितियों में शिक्षा के स्तर और व्यवस्था में आई गिरावट ने शिक्षक-शिक्षार्थी -संबंध को काफी हद तक प्रभावित किया है। बावजूद इसके,देश में लाखों शिक्षार्थी ऐसे हैं, जिनके जीवन में क्रांतिकारी और स्वर्णिम बदलाव लाने में शिक्षकों की भूमिका अतुलनीय और श्लाघनीय रही है। यही कारण है कि बदलते शैक्षणिक परिवेश के बावजूद योग्य,कर्मठ और ईमानदार शिक्षकों का सम्मान और आकर्षण आज भी बरकरार और गौरवपूर्ण है। पटना के सुपर थर्टी के संचालक और गुरु डॉ आनंद का मिसाल हमारे सामने जीवंत है। डा आनंद ने अपने अहर्निश परिश्रम,त्याग  और प्रतिबद्धता से सैकड़ों गरीब एवं मेधावी विद्यार्थियों को मुकम्मल मंजिल दिलाने में सहायक रहें हैं।

    अतएव विश्व के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो भारत में हजारों वर्षों से चली आ रही गुरु-शिष्य की समृद्ध परंपरा उत्कृष्ट सभ्यता और संस्कृति की पहचान और धरोहर है। विभिन्न कालों में शिक्षा के उद्देश्य भिन्न-भिन्न हो सकते हैं,मगर अमूमन मानवीय मूल्यों से संपन्न एक सजग और जवाबदेह नागरिक- निर्माण करने का लक्ष्य हर युग में रहा है।

   

Teacher Day

भारत गुरुओं का देश रहा है। प्राचीन धार्मिक साहित्यों और इतिहास के पन्नों में ऐसे अनेक प्रख्यात गुरु हुए, जिनके भारतीय संस्कृति के उत्थान में अतुलनीय योगदान रहे हैैं।व्यापक हित में राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान का बीज शिष्यों के उर्वर मन-मस्तिष्क में सफलतापूर्वक बोने का कार्य, एक बेहतर गुरु ही कर सकता है। धार्मिक ग्रंथों में इसके अनेक मिसाल मौजूद हैं। रामायण के अनुसार,आसुरी शक्तियों  को परास्त करने के लिए विश्वामित्र ने राजा दशरथ से राम और लक्ष्मण को मांग कर लाया था।धनुर्विद्या का ज्ञान देने के लिए मुनि ने सर्वाधिक उपयुक्त शिष्य राम और लक्ष्मण को चुना। इसके मूल में महर्षि विश्वामित्र का उद्देश्य आततायी शक्तियों के आतंक से  त्राहि-त्राहि कर रहे ऋषि समुदाय को निजात दिलाना था। इसके लिए महर्षि ने राम और लक्ष्मण को कोई आदेश या उपदेश नहीं दिया, बल्कि दोनों राजकुमारों को वहां ले गये, जहां राक्षसों ने ऋषि-मुनियों को मारकर हड्डियों का पहाड़ खड़ा किया था। एक गुरु द्वारा हड्डियों के पहाड़ को TLM (शिक्षण अधिगम सामग्री) के रूप में प्रयोग किया जाना आधुनिक संदर्भ में आश्चर्य का विषय हो सकता है, मगर बिल्कुल सत्य है।इस हड्डियों के पहाड़ की सच्चाई से अवगत होते ही राम भड़क उठे। उन्होंने अन्याय का प्रतिकार करने के लिए तत्क्षण भुजा उठाकर शपथ ली- “निशिचर हीन करउं महि”। राम ने जनकल्याण हेतु आसुरी शक्तियों को परास्त कर न केवल अपनी शपथ को पूरा किया , अपितु अपने गुरु की इच्छा का भी सम्मान किया। उचित समय में उचित शिक्षण अधिगम सामग्री (TLM) का प्रयोग कर एक गुरु ने न केवल देश को अत्याचारी ताकतों से मुक्त किया,बल्कि  शिष्य राम को जनमानस की नज़रों में भगवान बनने का मार्ग भी प्रशस्त किया। चौदह वर्ष तक राम को  वनवास दिया जाना,तो  महज एक बहाना था, जबकि असली बात यह थी कि  राम को अपनी शपथ पूरी करनी थी।

        हम जानते हैं कि महाभारत में कैदी जीवन व्यतीत करते वसुदेव-देवकी के पुत्र कृष्ण किसी रियासत के स्वामी नहीं थे, बल्कि गाय चरानेवाले एक ग्वाला थे।कंस-बध के उपरांत कृष्ण और बलराम को विद्याध्ययन के लिए उज्जैन स्थित सांदिपनी ऋषि के आश्रम में भेजा गया था। अनगढ़ पत्थर सरीखे कृष्ण और बलराम सांदिपनी ऋषि का सानिध्य पाकर चमकते हीरे जैसे निखर गये। कलाओं के प्रति कृष्ण की जिज्ञासा इतनी प्रबल थी कि गुरु ने मात्र 64 दिनों में 64 कलाओं में पारंगत बना दिया था। महाभारत युद्ध में कृष्ण धनुर्धर अर्जुन के केवल सखा और सारथी ही नहीं ,प्रत्यूत एक प्रेरक गुरु भी थे। उन्होंने अर्जुन को गीता-ज्ञान बंद कमरे में नहीं,अपितु आमने-सामने खड़ी दोनों ओर की सेनाओं के मध्य दिया था। कृष्ण अंतर्यामी थे, जो गीता का ज्ञान पहले भी दे सकते थे, मगर कृष्ण ने सेनाओं का उपयोग शिक्षण अधिगम सामग्री (TLM) के रूप में किया और तब गीता का ज्ञान दिया। फलस्वरूप गीता-ज्ञान सहज,स्वीकार्य तथा तत्काल असरकारक हो सका। भारतीय वांग्मय में कृष्ण जैसा सर्वकलासंपन्न शख्सियत दूर-दूर तक देखने को नहीं मिलता है।आज भी ऐसे धनी प्रतिभा वाले शिक्षार्थियों की कमी नहीं है। हजारों प्रतिभावान हर साल विभिन्न क्षेत्रों में नेतृत्व प्रदान कर रहे हैं।उन मूर्धन्य प्रतिभाओं में गणितज्ञ रामानुजन,ए पी जे अब्दुल कलाम वशिष्ठ नारायण सिंह और तथागत तुलसी का नाम श्रद्धा से लिया जाता है।

       महाभारत में कौरव-पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य ऐसे गुरु हैं, जिनसे न केवल शिक्षकों को, बल्कि शिक्षार्थियों को भी सीख लेनी चाहिए। द्रोणाचार्य के प्रति जिसने असीम श्रद्धा, आस्था और विश्वास रखकर पूरी तन्मयता से धनुर्विद्या सीखी,वह  महान धनुर्धर के रूप में अर्जुन के नाम से दुनिया में ख्यात हुआ। महाभारत के युद्ध में पांडव-पक्ष को विजय दिलाने में अर्जुन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका रही। दूसरी ओर हम देखते हैं कि जिसने अहंकार में निमग्न होकर गुरु के प्रति श्रद्धा और विश्वास समर्पित करने का ढोंग किया,वह दुर्योधन युद्ध में पराजय को प्राप्त हुआ। बच्चों को सीख लेने के लिए यह सटिक दृष्टांत है। द्रोणाचार्य का एक अघोषित शिष्य एकलव्य था। एकलव्य द्रोणाचार्य से धनुर्विद्या सीखना चाहता था, मगर द्रोण ने राज्यसत्ता से बंधे होने का हवाला देकर धनुर्विद्या सिखाने से इंकार कर दिया। द्रोण की विवशता को देखते हुए एकलव्य ने मन ही मन उनको गुरु स्वीकार कर लिया और उनके प्रति श्रद्धा और विश्वास का भाव रखकर उसने धनुर्विद्या सीखने में दिन-रात एक कर दी। परिणाम यह निकला कि विश्व के श्रेष्ठ धनुर्धरों में उसका नाम भी शुमार हो गया। एकलव्य की यह उपलब्धि द्रोण को बेहद नागवार लगा। उन्होंने भील बालक की इस उपलब्धि को अपना अपमान समझा । उन्होंने बिना सोचे- विचारे गुरुदक्षिणा में एकलव्य से अंगूठा मांग लिया। एक शिष्य के पूरे जीवन की उपलब्धि क्षणभर में समाप्त हो गई। एक गुरु द्वारा छल से अपने शिष्य को धनुर्विद्या से वंचित कर दिया जाना, गुरु-पद के पतन की पराकाष्ठा थी। इतिहास किसी को माफ़ नहीं करता है।इस घोर अमानवीय कृत्य के कारण इतिहास ने द्रोण के बेदाग चरित्र पर कलंक का टीका लगा दिया। कहा जाता है कि जो जैसा करता है, वैसा ही पाता है। कदाचित इसी छल का परिणाम था कि महाभारत युद्ध में द्रोण छल से मारे गये।यह दृष्टांत आधुनिक संदर्भ में  शिक्षकों को आत्मनिरीक्षण करने के लिए प्रेरित करता है।आज सैकड़ों एकलव्यों  के अंगूठे रूपी भविष्य का कत्लेआम बदस्तूर जारी है,जिसकी जिम्मेदारी से शिक्षक नहीं बच सकते।आज युग की मांग है कि अपने दायित्वों का निर्वहन हम ईमानदारीपूर्वक करें।

        प्राचीन भारत के इतिहास में चाणक्य और चन्द्रगुप्त की जोड़ी ने नंदवंश की सत्ता का मूलोच्छेद कर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की थी। कहा जाता है कि एक चरवाहा अपने चरवाहे साथियों के साथ मवेशी चराते हुए राजा-प्रजा का एक खेल खेल रहा था, जिसमें वह चरवाहा खुद राजा बना था।उसी राह से गुजरते हुए चाणक्य ने उस चरवाहा बच्चे को राजा के रूप में न्याय करते हुए बड़े गौर से देखा। उसकी हाज़िर जवाबी से चाणक्य इतने प्रभावित हुए कि उस बच्चे को उसकी मां से आज्ञा लेकर तक्षशिला ले गए। अपने सानिध्य में रखकर उस बच्चे को न केवल राजनीति की शिक्षा दी, बल्कि एक बहादुर योद्धा भी बनाया।बड़ा होकर यही बच्चा मौर्य साम्राज्य का संस्थापक  चंद्रगुप्त बना, जिसने नंदवंश को समाप्त कर अपने गुरु के अपमान का बदला लिया।एक गुरु का साकारात्मक दृष्टिकोण और प्रयास ने एक चरवाहे को महान राजा बना दिया।महान ग्रीक दार्शनिक अरस्तु के साथ भी चाणक्य जैसी घटना घटी थी। उसने भी सिकंदर जैसे महान योद्धा का निर्माण किया । यह है,एक शिक्षक की जादुई ताकत का चमत्कार।वस्तुत: एक शिक्षक की अहमियत और सफलता, उसके विद्यार्थियों के निर्माण में सन्निहित है।

         मध्यकालीन इतिहास में शिवाजी का नाम बड़े ही आदर के साथ लिया जाता है।अत्याचारी शासन से जनता को मुक्ति दिलाने के लिए गुरु समर्थ रामदास ने वीर शिवाजी को एक साधारण छत्रप से क्षत्रपति शिवाजी महाराज बना दिया। रोजमर्रे की ज़िंदगी से जूझता एक बुद्धिवादी युवा नरेंद्र को शिष्य बना लेना,आसान नहीं था। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ही ऐसे गुरु थे, जिसने होनहार शिष्य की पहचान की और अपने साथ जोड़ने में सफल रहे।योग्य गुरु का योग्य शिष्य ने स्वामी विवेकानंद के रूप में हिंदू दर्शन का डंका पूरे विश्व में बजाया। 

       भारतीय वांग्मय में ऐसे हजारों गुरु और शिष्य हैं , जिन्होंने भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति को समृद्ध, उत्कृष्ट तथा जीवनोपयोगी बनाया। हमें अपनी गुरु-शिष्य परंपरा की विरासत का आत्मावलोकन करना चाहिए। भारत की भावी पीढ़ी को अनुशासित, विनम्र,कर्मठ तथा चरित्रवान बनाने के लिए आवश्यक है कि उनमें अपने शिक्षकों के प्रति आदर एवं श्रद्धा का भाव जगाया जाए। शिक्षकों और शिक्षार्थियों के मध्य जो दूरियां बढ़ रही हैं, उसके मूल में दोनों हैं। शिक्षकों को अपनी गरिमा को समझते हुए शिक्षार्थियों के प्रति स्नेह तथा शिक्षार्थियों को भी शिक्षकों के प्रति सम्मान का भाव जगाना होगा, तभी हम श्रेष्ठ और समर्थ भारत का निर्माण कर सकते हैं। हजारों वर्ष पुरानी गुरु-शिष्य परंपरा की विरासत को यथार्थ की धरातल पर उतारने के लिए सामूहिक रूप से प्रयास करना,आज समय,समाज और समग्र राष्ट्र की मांग है। आइए, अपनी स्वर्णिम विरासत से हम संकल्प लें कि बच्चों के सर्वांगीण विकास रूपी यज्ञ में पूरी ईमानदारीपूर्वक अपने शिक्षकीय सत्कर्म की आहूति प्रदान करें, ताकि राष्ट्र का उन्नत मस्तक विश्व में देदिप्यमान रहे।

संपर्क : 8540975076

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