सुभाष पंत: द्वंद्वों और संघर्षों का शानदार कथाकार

देहरादून (उत्तराखंड)-विशेष प्रतिनिधि। उत्तराखंड के साहित्यकारों ने हिंदी के प्रख्यात कथाकार सुभाष पंत को विशेष स्मृति समारोह और विमर्श के माध्यम से अनूठे ढंग से याद किया। राजपुर रोड स्थित एक होटल के सभागार में आयोजित “सुभाष पंत स्मृति एवं विमर्श समारोह” में उनके कथा साहित्य, जीवन संघर्षों और साहित्यिक प्रस्तुति पर गहन चर्चा हुई। इस अवसर पर साहित्य जगत के दिग्गजों ने उनके साहित्य के विभिन्न आयामों को उजागर करते हुए कहा कि उनकी रचनाओं में सामाजिक और सांस्कृतिक द्वंद्व और पीड़ा घनीभूत रूप से उभरकर सामने आती है।
समारोह की मुख्य आयोजक उत्तराखंड की पूर्व उच्च शिक्षा निदेशक और लेखिका प्रोफेसर सविता मोहन ने उद्घाटन वक्तव्य में कहा कि सुभाष पंत का समग्र साहित्य आम आदमी के संघर्षों को अभिव्यक्त करने वाला साहित्य है। उनकी रचनाएँ समाज के हाशिए पर जी रहे लोगों की आवाज को बुलंद करती हैं।” उन्होंने पंत के साहित्य को सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदनाओं का अनुपम संगम बताया।
मुख्य वक्ता प्रोफेसर नवीन चंद्र लोहनी ने सुभाष पंत के साहित्य को उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के संदर्भ में मूल्यांकन करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि पंत का साहित्य केवल कहानियाँ नहीं, बल्कि समाज का दस्तावेज है। उनकी रचनाएँ सामाजिक परिवर्तन और सांस्कृतिक मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित करती हैं।
विशिष्ट वक्ता प्रोफेसर कल्पना पंत ने सुभाष पंत की कहानियों में पात्रों के चित्रण पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि पंत के साहित्य में स्त्री पात्र न केवल संघर्ष करती हैं, बल्कि मानवीय गरिमा और स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में उभरती हैं। उनकी रचनाएँ स्त्री के मनुष्य होने की समझ को गहराई से प्रस्तुत करती हैं।
दूसरे विशिष्ट वक्ता, आईपीएस अधिकारी और साहित्यकार डॉ. अमित श्रीवास्तव ने पंत के कथ्य, उनकी भाषिक शैली और अनुभूतियों को प्रभावी ढंग से व्यक्त करने की कला पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पंत की भाषा में एक अनूठा प्रवाह और संवेदनशीलता है, जो पाठक को कहानी के भीतर ले जाती है। उनकी रचनाएँ भाषा के सौंदर्य और अर्थ की गहराई का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
उत्तराखंड के पूर्व पुलिस महानिदेशक और साहित्यकार अनिल रतूड़ी ने पंत के साहित्य को आम आदमी के द्वंद्वों और संघर्षों को गहनता से अभिव्यक्त करने वाला बताया। उन्होंने कहा कि पंत का साहित्य समाज के उन लोगों की कहानी कहता है, जिनकी आवाज अक्सर अनसुनी रह जाती है। उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं को गहरे तक अभिव्यक्त करती हैं।
लेखक डॉ. सुशील उपाध्याय ने सुभाष पंत के जीवन की विविध घटनाओं को उनके साहित्य के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि पंत के व्यक्तिगत अनुभव उनकी रचनाओं में कैसे झलकते हैं और कैसे ये अनुभव उनकी कहानियों को प्रामाणिकता प्रदान करते हैं।
समारोह में पूर्व कुलपति डॉ. सुधा पांडेय, डॉ. संजीव नेगी, डॉ. दिनेश शर्मा, और डॉ. भारती मिश्रा ने भी सुभाष पंत के साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर विचार साझा किए। इन वक्ताओं ने पंत की रचनाओं में सामाजिक यथार्थ, मनोवैज्ञानिक गहराई और सांस्कृतिक संदर्भों को रेखांकित किया।
इस अवसर पर पद्मश्री माधुरी बड़थ्वाल ने अपनी गीत प्रस्तुति के माध्यम से पंत जी का भावपूर्ण स्मरण किया।
इस अवसर पर उत्तराखंड की मुख्य सूचना आयुक्त राधा रतूड़ी, डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र, रुचि मोहन रयाल, डॉली डबराल, प्रोफेसर एन. महेश्वरी, प्रोफेसर जी.एस. रजवार, डॉ मुनिराम सकलानी, अंबर खरबंदा, डॉ. अनिल भारती, डॉ. नितिन उपाध्याय, डॉ विभूति भट्ट, गीतकार असीम शुक्ल, और आयोजन समिति के कुशल आदित्य, उपलब्धि मोहन सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

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