
वरिष्ठ लेखक व पत्रकार
- दिल्ली में बिल्डिंग नहीं गिरी, भ्रष्टाचार की पोल खुली
दिल्ली में सत्य निकेतन बिल्डिंग गिर गई। आधे दर्जन लोगों की मृत्यु हो गई। राजनीति गर्मा गई। प्रशासन भवन मालिक को इसका दोष देकर उसके खिलाफ करवाई करने पर उतारू है। सवाल है कि क्या मकान मालिक ही सिर्फ दोषी है? क्या वास्तव में सत्य निकेतन गिरा है या फिर सत्ता सरकार का इकबाल गिरने का यह परिणाम है? क्या सत्ता प्रतिष्ठान अगर ईमानदारी से कम करे तो ऐसी घटनाएं होती रह सकती हैं? ऐसी घटनाएं पहले भी दर्जनों बार हुई है और आगे भी होंगी और ऐसे ही घटना क्यों सिर्फ बिल्डिंग गिरने से मौतें थोड़े ही होती हैं, भवनों में आग लगने से भी मौतें होती रही हैं। सवाल है कि इसका उपाय क्या है? क्या वास्तव में सत्ता प्रतिष्ठान कभी ऐसी घटनाएं न हो इसका ठोस उपाय करना चाहती हैं? ऐसी घटनाओं पर रोक लगे इसे लेकर क्या सरकारें कभी दृढ़ निश्चायी रही हैं, नहीं।
दरअसल यह सत्य निकेतन नाम का एक बिल्डिंग गिरने और उससे कई मौतें हो जाने भर का बस मामला नहीं है। बिल्डिंग गिरती है तब भी भ्रष्टाचार होता है और बिल्डिंग में आग लगती है तब भी भ्रष्टाचार का ही वह परिणाम होता है। भ्रष्टाचार को समझने की जरूरत है। भ्रष्टाचार कैसे इन मौतों की जिम्मेदार होती है? भारत में शायद ही कोई ऐसा उदाहरण है कि जब भवन बन रहा हो और उसके निर्माण में धांधली ना हो। भले ही वह कोई एजेंसी करे, सरकार बनाए या व्यक्तिगत निर्माण ही क्यों ना हो। सक्षम अथॉरिटी से ना तो बिना रिश्वत के नक्शा पास होते हैं ना निर्माण की स्वीकृति मिलती है। न ही भवन बन जाने के बाद ऑडिट करने वाली संस्थाएं भौतिक सत्यापन करती हैं। वह बिना भौतिक सत्यापन किये ही, या कभी-कभी संबंधित भवन में भौतिक रूप से अधिकारी उपस्थित होकर भी सीधे निबंधन नियमितीकरण के लिए रिश्वत मांगते हैं। बिना रिश्वत लिए भवनों का निबंधन नियमितीकरण होता ही नहीं है। अब कोई ईमानदार हो और ऐसा वास्तव में बिना रिश्वत लिए पूरी तरह भौतिक सत्यापन करके एनओसी करता हो तो यह अद्भुत संयोग हो सकता है।
भवनों में आग लगने पर मौतें ना हो इसके लिए अग्निशमन विभाग द्वारा जांच कर एक योजना के तहत सुरक्षा उपकरण लगाए जाते हैं, शायद ही कोई ऐसा भवन होगा और अग्निशामालय का अधिकारी जहां रिश्वतखोरी ना होती हो। बिना रिश्वत लिए किसी भवन का अग्निशमन विभाग एनओसी नहीं देता। भवनों में बिना गए, बिना देखे, बिना निरीक्षण किये अग्निशामालय विभाग के अधिकारी मोटी रकम लेकर एनओसी देते हैं, यह खुला सच है। कभी कभी बड़े पैरवी, सामने वाले कि पहुंच व दबंगता के भय भी वजह होती है। लेकिन इस पर नियंत्रण नहीं किया जाता। सरकार इस दिशा में विचार नहीं करती और इसीलिए भवन गिरते हैं। मौतें होती हैं।
अगर वास्तव में सरकारी चाहती है, चाहे वह केंद्र की सरकार हो या राज्य की, कि किसी भवन में आग लगने से मौत ना हो, कोई भवन ध्वस्त ना हो, उसके गिरने से मौत ना हो तो उसके लिए जिम्मेदारी तय करनी होगी। संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी होगी। ऐसा करना बहुत मुश्किल वाला या बड़ा काम नहीं है, जिसे किया नहीं जा सकता। बस सत्ता प्रतिष्ठानों के दृढ़ निश्चायी होने भर का मामला है। यह कानून होना चाहिए कि अगर कोई भवन ध्वस्त होता है, किसी भवन में आग लगती है, जैसे सत्य निकेतन का ही मामला ले लें बतौर उदाहरण तो, सत्य निकेतन भवन का निर्माण क्या नक्शा के अनुसार हुआ है, क्या उसमें आग लगने, भुकंप आने पर ध्वस्त होने से मौत न हो इसके सुरक्षा उपाय मानक के अनुरूप हैं, इसकी जांच होनी चाहिए।
अगर इसमें कमी पाई जाती है तो नक्शा पास करने वाले (अगर वह सेवानिवृत्त हो गया हो तो उसके पेंशन से, उसकी अर्जित संपत्ति से) से, उसके निर्माण में गड़बड़ी होने या रहने के बावजूद भवन को असुरक्षित घोषित न करने वाले जिम्मेदार अधिकारी, अग्नि सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदार अधिकारी अर्थात निबंधन नियमितीकरण दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने वाले अधिकारी पर हत्या का मुकदमा दर्ज हो और जितनी भी क्षति हुई उसकी भरपाई उनके वेतन से किया जाए। यह संवैधानिक व्यवस्था होनी चाहिए। जब ऐसा होगा तो तय जानिए भविष्य में कभी भी बिल्डिंग नहीं ध्वस्त होगी, आग नहीं लगेगी, ऐसी घटनाओं में होने वाली मौत टाली जा सकेंगी।
रिश्वत लेकर गलत होने के बावजूद सही लिखने, बताने वाले अधिकारी अधिक दोषी हैं, बनिस्पत मकान मालिक के। जब ऐसे नियम बनेंगे, ऐसी कानूनी व्यवस्था होगी तो पैसा लेना तो छोड़िए मांगेंगे भी नहीं अधिकारी। यह नियम होना चाहिए कि अगर नियमितीकरण के लिए कोई मकान मालिक आवेदन देता है तो उसे 15 दिन या 30 दिन के अंदर (जो भी प्राविधान हो) संबंधित अथॉरिटी को लाइसेंस के नियमितीकरण का मामला निपटाना होगा। कारण बता कर उसे खारिज करे या स्वीकार करे। ऐसा होने पर रिश्वत लेनदेन का मामला कम होगा। अगर कोई रिश्वत के लिए जबरदस्ती कोई कमी निकाले तो उस तरह के अधिकारी के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए। जब तक अधिकारी ब्लैकमेल करते रहेंगे, पैसे लेकर निबंधनों का नियमितीकरण करते रहेंगे, भवन गलत तरीके से बनते रहेंगे, तब तक ऐसे हादसे होते रहेंगे और मकान मालिकों को पकड़ कर जेल भेज देने से कोई समस्या का समाधान नहीं होगा।
यह लिखने का उद्देश्य सही मुद्दे उठाना, सत्ता को स्थिति का भान कराना और भविष्य में ऐसी दुर्घटना ना हो यह तय करवाना है ना कि किसी मकान के मालिक को बचाना या उसका पक्ष रखना।
(लेखक का निजी विचार है)





