
राष्ट्रीय शिक्षक दिवस विशेष : 5 सितंबर 2026
कहने को सभी शिक्षा को ज्ञान का मंदिर और शिक्षक के पेशे को पवित्र मानते हैं, लेकिन व्यापारीकरण के इस दौर में सवाल उठता है कि क्या शिक्षा व्यवस्था आज भी वही मंदिर रह गई है, जहां क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा की ज्ञान-ज्योति जलाने के लिए सामाजिक कुरीतियों और विरोधी विचारों से संघर्ष करते हुए अनेक कठिनाइयां सहन की थीं।
महात्मा ज्योतिराव फुले ने सामाजिक बहिष्कार, अपमान और विरोध की परवाह किए बिना शिक्षा को वंचितों की मुक्ति का माध्यम बनाया। राजर्षि शाहू महाराज ने शिक्षा में सामाजिक न्याय और अवसरों की समानता को राज्य की जिम्मेदारी माना। महर्षि धोंडो केशव कर्वे ने स्त्री-शिक्षा को अपने जीवन का ध्येय बनाया। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन और मुक्ति की आधारशिला माना। पद्मश्री डॉ. एस. आर. रंगनाथन ने पुस्तकालयों को ज्ञान तक समान पहुंच और बौद्धिक लोकतंत्र का माध्यम बनाया, वहीं डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने ज्ञान को विकसित और आत्मनिर्भर भारत की शक्ति के रूप में देखा।
इन सभी महापुरुषों और समाजसुधारकों की दृष्टि में शिक्षा कोई बिकाऊ वस्तु नहीं, बल्कि व्यक्ति और समाज को बेहतर बनाने वाली सार्वजनिक नैतिक जिम्मेदारी थी।
आज उसी व्यवस्था के सामने एक असहज प्रश्न खड़ा है—क्या शिक्षा धीरे-धीरे ज्ञान और सामाजिक परिवर्तन के मिशन से हटकर फीस, मुनाफा, ब्रांड, परीक्षा परिणाम और रोजगार के बाजार में बदलती जा रही है? यदि शिक्षा के नाम पर अनावश्यक आर्थिक बोझ, नियुक्तियों में कथित धनबल, राजनीतिक अथवा प्रशासनिक हस्तक्षेप और शिक्षकों की असुरक्षा जैसी प्रवृत्तियां बढ़ती हैं, तो संकट केवल संस्थागत व्यवस्था का नहीं, बल्कि शिक्षा के मूल नैतिक चरित्र का भी है।
ऐसी स्थिति में हमें पुनर्विचार करना होगा कि जिन महापुरुषों ने शिक्षा को समानता, स्वाभिमान, ज्ञान और सामाजिक मुक्ति का साधन बनाया था, क्या हम उसी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं या अनजाने में शिक्षा को ऐसी व्यवस्था में बदल रहे हैं, जहां विद्यार्थी ग्राहक, शिक्षक कर्मचारी और ज्ञान एक उत्पाद बनता जा रहा है?
आजकल सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों में शिक्षा संस्थानों के अनुचित व्यवहार से जुड़ी अनेक खबरें सामने आती रहती हैं। इससे शिक्षा व्यवस्था की पवित्रता पर सवाल उठते हैं। महाराष्ट्र के सरकारी अनुदानित महाविद्यालयों में पद भर्ती के नाम पर प्रोफेसरों के कथित ‘रेट’ की चर्चाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं। कुछ दिनों तक अखबारों में खबरें आती हैं और फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है। शिक्षकों के मानसिक उत्पीड़न और आत्महत्या की घटनाएं भी चिंता का विषय हैं।
शिक्षा व्यवस्था में भ्रष्टाचार, भर्ती घोटाले, डिग्री की खरीद-फरोख्त, परीक्षा प्रश्नपत्रों का लीक होना, उत्तर पुस्तिकाओं में हेरफेर, सरकारी खर्च में अनियमितता, सामग्री की खरीद-फरोख्त में गड़बड़ी और कमजोर वित्तीय जवाबदेही जैसी घटनाएं बताती हैं कि शिक्षा के कामकाज में कई स्तरों पर सुधार की जरूरत है।
हर क्षेत्र में कार्यरत कर्मचारियों को सामान्यतः पता होता है कि उनके विभाग में कहां अनुचित या भ्रष्ट गतिविधियां हो रही हैं, लेकिन अधिकांश लोग इसके खिलाफ आवाज उठाना पसंद नहीं करते। ‘जैसा चल रहा है, चलने दो’ का रवैया धीरे-धीरे पूरी व्यवस्था को कमजोर करता है। इसका सीधा प्रभाव व्यवस्था, समाज और देश पर पड़ता है और इसके गंभीर परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भुगतने पड़ सकते हैं।
विकसित देशों की शिक्षा व्यवस्था में समान गुणवत्ता और अवसरों पर विशेष जोर दिया जाता है। वहां शिक्षा को सामाजिक विकास का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। जिस देश ने गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, मजबूत स्वास्थ्य सुविधाओं और रोजगार सृजन को प्राथमिकता दी, वह विकास के पथ पर आगे बढ़ा। दुनिया में ऐसे कई छोटे देश भी हैं, जिनके पास सीमित प्राकृतिक संसाधन हैं, फिर भी उन्होंने बेहतर शिक्षा प्रणाली और उन्नत तकनीक के बल पर उल्लेखनीय प्रगति की है।
मनुष्य के संपूर्ण जीवन की आधारशिला उसकी शिक्षा पर निर्भर करती है। शिक्षा की गुणवत्ता और उससे प्राप्त कौशल व्यक्ति के भविष्य को दिशा देते हैं। इसका प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ता है। जीवन के लगभग हर क्षेत्र में शिक्षा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
कई देशों में सामाजिक समरसता और जीवन-कौशल की शिक्षा बच्चों को विद्यालय स्तर से ही दी जाती है। पढ़ाई के विभिन्न विषयों के साथ घर की साफ-सफाई, बुजुर्गों की मदद, अपना काम स्वयं करना, अभिभावकों के कार्यों में सहयोग करना, महिलाओं का सम्मान, असहाय लोगों की मदद, सामाजिक कार्य, पौधारोपण, पर्यावरण संरक्षण, हस्तकला, शिल्पकला और छोटे उपकरणों की मरम्मत जैसे व्यावहारिक कौशल भी सिखाए जाते हैं।
इसमें बच्चों को यह समझाया जाता है कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता, बल्कि हर काम का अपना महत्व है। इस प्रकार की शिक्षा विद्यार्थियों को कौशलपूर्ण, जिम्मेदार, संस्कारी और आत्मनिर्भर नागरिक बनाने पर जोर देती है। आज जब अनेक बच्चे सोशल मीडिया और रील देखने में अपना काफी समय गंवा रहे हैं, ऐसे में शिक्षा को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित रखने के बजाय व्यावहारिक कौशल से जोड़ना जरूरी हो गया है।
देश में अनेक सरकारी कर्मचारी भी अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए महंगे निजी शिक्षण संस्थानों को प्राथमिकता देते हैं। बेहतर वेतन पाने वाले सरकारी स्कूलों के कुछ शिक्षक भी अपने बच्चों को अपने ही विद्यालय में पढ़ाना पसंद नहीं करते। दूसरी ओर, अनेक निजी स्कूलों के शिक्षक अपेक्षाकृत कम वेतन पर काम करते हुए भी अच्छे परिणाम देने का प्रयास करते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि सरकारी शिक्षण संस्थानों की व्यवस्था में सुधार क्यों नहीं हो पा रहा है?
केंद्रीय विद्यालय और जवाहर नवोदय विद्यालय जैसे संस्थान शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन करते हैं, लेकिन इनकी संख्या सीमित है। इन संस्थानों में शिक्षक चयन, कार्यप्रणाली और शैक्षणिक गतिविधियों को अपेक्षाकृत व्यवस्थित तरीके से संचालित किया जाता है। इसके मुकाबले कई राज्यों के सरकारी विद्यालयों में आधारभूत सुविधाओं, शिक्षकों की उपलब्धता और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को लेकर चुनौतियां बनी हुई हैं।
ग्रामीण, दुर्गम और पिछड़े क्षेत्रों के अनेक सरकारी विद्यालयों की स्थिति विशेष चिंता का विषय है। बारिश के मौसम में कई जगह विद्यार्थियों को कीचड़, झाड़ियों और खराब सड़कों से गुजरकर विद्यालय पहुंचना पड़ता है। कुछ क्षेत्रों में उन्हें उफनती नदियों और नालों को पार करने का जोखिम भी उठाना पड़ता है। कई विद्यालयों में भवन और आधारभूत सुविधाओं की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है।
शिक्षा व्यवस्था की एक बड़ी चुनौती विद्यार्थियों का विद्यालयी शिक्षा के दौरान बीच में ही पढ़ाई छोड़ देना भी है। वहीं, सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की कमी भी लंबे समय से चिंता का विषय रही है। ऐसी परिस्थितियों में शिक्षा के अधिकार और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लक्ष्य को हासिल करना कठिन हो जाता है।
शिक्षक कभी साधारण नहीं होता। प्रलय और निर्माण दोनों उनकी गोद में पलते हैं। शिक्षक अपने ज्ञान, कलागुणों और शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों में सशक्त और विकसित समाज की नींव रखते हुए देश के भविष्य के शिल्पकार की भूमिका निभाता है।
शिक्षा केवल अंक, रैंक, डिग्री और रोजगार प्राप्त करने का माध्यम नहीं है। चरित्र निर्माण, सुजान और सुसंस्कृत नागरिक का निर्माण, रचनात्मक एवं आलोचनात्मक चिंतन तथा सामाजिक जिम्मेदारी का बोध भी शिक्षा के महत्वपूर्ण उद्देश्य हैं। यही शिक्षा की मूल नैतिकता है।
यदि शिक्षा व्यवस्था विद्यार्थी की क्षमताओं और रुचियों को पहचानकर उसके कौशल को विकसित करने तथा जीवन के लिए सक्षम बनाने में कमजोर पड़ती है, तो ऐसी शिक्षा केवल डिग्रीधारियों की संख्या बढ़ाने तक सीमित रह जाएगी। आज रोजगार बाजार में डिग्री और कौशल के बीच का अंतर एक गंभीर चुनौती के रूप में सामने है।
इसलिए शिक्षा को केवल बाजार का उत्पाद मानने के बजाय सामाजिक अधिकार और सार्वजनिक जिम्मेदारी के रूप में देखने की जरूरत है। शिक्षक दिवस के अवसर पर यह आत्ममंथन जरूरी है कि हम कैसी शिक्षा व्यवस्था आने वाली पीढ़ी को सौंपना चाहते हैं—ऐसी व्यवस्था जो केवल डिग्री दे या ऐसी शिक्षा जो ज्ञान, कौशल, चरित्र, संवेदना और जिम्मेदारी से युक्त नागरिक तैयार करे।
- लेखक : डॉ. प्रितम भि. गेडाम
(महाराष्ट्र सरकार से सम्मानित लेखक)
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