विश्व स्तर पर प्रत्येक वर्ष 17 अक्टूबर को ‘अंतरराष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन दिवस’ मनाया जाता है। इसका उद्देश्य गरीबी के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाना और गरीबी-मुक्त समाज के निर्माण के लिए प्रयासों को प्रोत्साहित करना है।गरीबी केवल आर्थिक अभाव नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सम्मानजनक जीवन से जुड़ी अनेक समस्याओं का कारण भी है। विकास के तमाम दावों के बीच गरीबी से जूझते लोगों का संघर्ष आज भी एक गंभीर सामाजिक चुनौती है।इसी ज्वलंत विषय पर पढ़िए डॉ. प्रीतम भि. गेडाम का विशेष आलेख—गरीबी का दंश : विकास के दावों के बीच संघर्षरत जीवन

गरीबी एक गंभीर सामाजिक समस्या है, जो अपने साथ सैकड़ों दूसरी समस्याएँ लेकर आती है और जीवन स्तर तथा विकास की संभावनाओं को प्रभावित करती है। लगातार बढ़ती आर्थिक विषमता गरीबी-मुक्त देश के निर्माण में बाधा बनती है। वहीं, महँगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी गरीबी कम करने के प्रयासों को कमजोर करते हैं। हर क्षेत्र में राजनीतिक हस्तक्षेप और भाई-भतीजावाद का दबाव बना रहता है। मिलावटखोरी, प्रदूषण, कंक्रीट के बढ़ते जंगल और कटते वन वैश्विक तापवृद्धि को बढ़ावा देते हैं। इससे प्राकृतिक आपदाओं और बीमारियों का खतरा बढ़ता है तथा लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसकी सबसे बड़ी मार गरीब तबके को झेलनी पड़ती है। विभिन्न सरकारी योजनाओं के बावजूद गरीबों के लिए सम्मानजनक जीवन स्तर हासिल करना बेहद मुश्किल बना रहता है।
विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 के अनुसार, देश की शीर्ष 10 प्रतिशत आबादी के पास राष्ट्रीय आय का 58 प्रतिशत और राष्ट्रीय संपत्ति का 65 प्रतिशत हिस्सा है, जबकि निचले तबके की 50 प्रतिशत आबादी के पास राष्ट्रीय आय का केवल 15 प्रतिशत हिस्सा है। शीर्ष एक प्रतिशत आबादी के पास कुल राष्ट्रीय संपत्ति का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा है। विश्व आर्थिक मंच के अनुसार, वैश्विक लैंगिक अंतर सूचकांक 2026 में भारत 145 देशों में 131वें स्थान पर है। हर साल 17 अक्टूबर को गरीबी उन्मूलन के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से पूरी दुनिया में ‘अंतरराष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन दिवस’ मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 2026 के लिए निर्धारित विषय ‘सभी के लिए सुरक्षित घर’ है।
गरीबी में दो वक्त की रोटी जुटाने के संघर्ष में ही लोगों का अधिकांश समय बीत जाता है। वे अपने घर-परिवार और बच्चों के लिए पर्याप्त समय नहीं निकाल पाते। स्वास्थ्य, शिक्षा, भविष्य और जनकल्याणकारी योजनाओं के प्रति जागरूकता की कमी भी उनकी समस्याओं को बढ़ाती है। अधिकतर राजनीतिक दल भी चुनाव के समय गरीबों को याद करते हैं और उनसे किए गए बड़े-बड़े वादे समय बीतने के साथ भूल जाते हैं। गरीबी में जन्मा बच्चा स्वयं को इस दलदल से बाहर निकालने के लिए अनगिनत संघर्ष करता है, ताकि अगली पीढ़ी को बेहतर जीवन स्तर मिल सके। लेकिन ऐसे संघर्षों में सफलता कुछ ही लोगों को मिल पाती है।
गरीबी के कारण लोगों को भरपेट भोजन तक नहीं मिल पाता। पौष्टिक आहार, स्वच्छ पेयजल और पर्याप्त आवास जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव उनके जीवन को और कठिन बना देता है। मौसम में बदलाव के अनुरूप सुरक्षित जीवन जीना भी उनके लिए चुनौतीपूर्ण होता है। लंबे समय तक पर्याप्त भोजन, पौष्टिक आहार और स्वच्छ पेयजल उपलब्ध न होने से कुपोषण तथा गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। वायु प्रदूषण भी उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। बीमार पड़ने पर बेहतर इलाज, दवाइयों और स्वास्थ्य बीमा तक पहुँच न होने के कारण समय पर उपचार नहीं हो पाता। परिणामस्वरूप बीमारी गंभीर होती जाती है और जीवन प्रत्याशा पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है। परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण कई बार बच्चों को पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ती है और परिवार की आर्थिक मदद के लिए काम करना पड़ता है।
हमारे देश में बेरोजगारी की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। चतुर्थ श्रेणी के कुछ पदों के लिए भी लाखों उच्चशिक्षित उम्मीदवार आवेदन करते हैं, जिनमें अभियंता, प्रबंधन की पढ़ाई करने वाले और पीएचडी उपाधिधारक तक शामिल होते हैं। इन पदों के लिए आवेदन करने वाले बेरोजगार युवाओं से परीक्षा शुल्क के रूप में सरकार के पास करोड़ों रुपये जमा होते हैं। युवाओं की उम्र निकल जाती है, लेकिन उन्हें अपनी योग्यता के अनुरूप रोजगार नहीं मिल पाता। योग्यतानुसार नौकरी या रोजगार प्राप्त करना उनके लिए बेहद मुश्किल हो जाता है।
शिक्षा और रोजगार ही मनुष्य को गरीबी से उबरने के अवसर प्रदान करते हैं। यदि कोई व्यक्ति कड़ी मेहनत करके उच्च शिक्षा हासिल करता है और नौकरी या रोजगार के लिए आवश्यक योग्यता रखने के बावजूद अवसरों से वंचित रह जाता है, तो उसके साथ-साथ उसके परिवार के सपने भी चकनाचूर हो जाते हैं। नौकरी में भ्रष्टाचार, प्रश्नपत्र लीक होने और राजनीतिक दबाव की खबरें भी अक्सर सुर्खियों में रहती हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि व्यक्ति गरीबी की जंजीरों को तोड़कर बाहर कैसे निकले?
बढ़ती बेरोजगारी के कारण उच्चशिक्षित युवा भी उपलब्ध काम करने को तैयार हो जाते हैं। कम शिक्षित युवाओं को भी अक्सर कम आय वाले शारीरिक श्रम पर निर्भर रहना पड़ता है। कौशल, संसाधनों और रोजगार के पर्याप्त अवसरों की कमी भी बेरोजगारी बढ़ाती है। गरीबी के कारण लोगों को असुरक्षित आवासों, भीड़भाड़ वाली तंग गलियों, गंदी नालियों और झुग्गी-बस्तियों में रहने को मजबूर होना पड़ता है। कचरा, अस्वच्छता तथा मच्छर-मक्खियों का प्रकोप उनके जीवन को और कठिन बना देता है। अनधिकृत बस्तियों में रहने वाले और बेघर लोग पर्यावरण से जुड़े अनेक खतरों का सामना करते हैं। ऐसे दूषित और अस्वास्थ्यकर वातावरण में बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। नशे की समस्या और अपराध जैसी सामाजिक चुनौतियाँ भी इन परिस्थितियों को और जटिल बना सकती हैं।
ऐसी परिस्थितियों में जीवन बिताने से व्यक्ति की सोच, समझ और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता है। हमेशा पैसों की तंगी की चिंता में डूबे रहने, अपनी इच्छाओं और आकांक्षाओं का त्याग करने तथा कर्ज के बोझ तले दबे रहने से उनका जीवन तनावपूर्ण हो जाता है। सामाजिक बदनामी, पारिवारिक कलह, बेचैनी और मानसिक तनाव उनके शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। गरीबों को अक्सर सामाजिक और जातिगत भेदभाव का भी सामना करना पड़ता है। राजनीतिक प्रतिनिधित्व में उनकी भागीदारी कई बार सीमित रह जाती है। जागरूकता और सामाजिक सुरक्षा के अभाव में वे अपराध, शोषण तथा अन्य प्रकार के अन्याय का शिकार होने के जोखिम में जीने को मजबूर होते हैं।
जिस देश में उन्नत स्वास्थ्य सुविधाएँ, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और योग्यता के अनुरूप रोजगार उपलब्ध हों तथा इन बुनियादी सेवाओं के लिए लोगों को आर्थिक तंगी के कारण वंचित न रहना पड़े, वहाँ विकास की संभावनाएँ अधिक मजबूत होती हैं। यदि भारत में भी प्रत्येक व्यक्ति को बिना भेदभाव के समान अवसरों के साथ गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ, शिक्षा और रोजगार उपलब्ध हो सकें, तो गरीबी को जड़ से मिटाने की दिशा में बड़ी सफलता हासिल की जा सकती है। गरीबी से निपटने में स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की अहम भूमिका है। यदि ये तीनों सुविधाएँ प्रत्येक व्यक्ति को सुलभ और आर्थिक रूप से वहनीय हों, तो वह अधिक सक्षम, आत्मनिर्भर और जिम्मेदार बन सकता है तथा अपने जीवन स्तर को बेहतर बनाने में योगदान दे सकता है। ऐसी स्थिति में मुफ्त अनाज, बिजली और पानी जैसी सहायता पर निर्भरता भी कम हो सकती है, क्योंकि व्यक्ति अपनी बुनियादी जरूरतों और अन्य खर्चों को स्वयं पूरा करने में सक्षम होगा। हालाँकि, जरूरतमंदों के लिए सामाजिक सुरक्षा और आवश्यक सहायता की व्यवस्था बनाए रखना भी जरूरी है।
शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार तक पहुँच बनाने में कई पीढ़ियों का जीवन संघर्ष करते हुए बीत जाता है, फिर भी इन सुविधाओं तक उनकी सहज पहुँच सुनिश्चित नहीं हो पाती। देश में गरीबों को सामाजिक समरसता की मुख्यधारा में शामिल करने के लिए उन्हें सक्षम बनाना बेहद जरूरी है, ताकि वे स्वयं अपने विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकें। सरकार को भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाते हुए स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के क्षेत्रों को प्राथमिकता देनी चाहिए तथा इनके लिए पर्याप्त बजट का प्रावधान करना चाहिए। हर हाथ को कौशल विकास के अवसर और योग्यता के अनुरूप काम मिलना चाहिए। इलाज के लिए पैसों की कमी के कारण किसी गरीब की जान नहीं जानी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को पौष्टिक आहार, स्वच्छ पेयजल और स्वच्छ हवा उपलब्ध होनी चाहिए।
गरीबी उन्मूलन का वास्तविक उद्देश्य केवल लोगों को आर्थिक सहायता देना नहीं, बल्कि उन्हें इस योग्य बनाना है कि वे सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें और अपने भविष्य का निर्माण स्वयं कर सकें। देश के विकास का आकलन केवल आर्थिक वृद्धि के आँकड़ों से नहीं, बल्कि इस बात से भी होना चाहिए कि समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति के जीवन में कितना सकारात्मक बदलाव आया है। जब प्रत्येक नागरिक को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और समान अवसर उपलब्ध होंगे, तभी विकास के दावे वास्तविकता में बदलेंगे और गरीबी के दंश से मुक्ति का सपना साकार हो सकेगा।




