पुस्तक समीक्षा: युद्ध, पीड़ा और मनुष्य होने की कहानी- “इंसान का नसीबा”

एक समय ऐसा था जब सोवियत रूस की क्रांति से हमारे स्वाधीनता सेनानी, खासकर साहित्यकार, गहरे रूप से प्रेरित होते थे। यह परंपरा लंबे समय तक फलती-फूलती रही। लेकिन 1992 के घटनाक्रम, ‘ग्लास्नोस्त’ और ‘पेरेस्त्रोइका’ के बाद सोवियत संघ के विघटन तथा उसके स्वयं में सिमट जाने से उसके प्रभाव-क्षेत्र में कमी आई। इसके बावजूद रूसी साहित्य की लोकप्रियता और प्रासंगिकता भारत में आज भी बनी हुई है।

इसी क्रम में रूसी लेखक मिखाइल शोलोखोव के उपन्यास का हिंदी अनुवाद “इंसान का नसीबा” पढ़ने को मिला, जो अपने समय (1958) की विश्वविख्यात कृति मानी जाती है। यह उपन्यास अपने लघु कलेवर में युद्धजनित परेशानियों, मनोभावों और मानवीय संवेदनाओं को जिस प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है, वह अद्भुत है। करुणा और मनुष्यता से संयुक्त यह उपन्यास अपने आप में बेजोड़ है।कहानी छोटी-सी है। एक बुजुर्ग व्यक्ति एक बच्चे के साथ लेखक को मिलता है। लेखक का अनुमान है कि वे बाप-बेटे हैं, जबकि दोनों ही द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका के कारण अनाथ होकर अप्रत्याशित रूप से एक-दूसरे के सहारा बनते हैं। फ्लैशबैक में चलती कहानी के साथ युद्ध के भयावह दृश्य सामने आते जाते हैं और कथा अधिक रोचक तथा मार्मिक बनती जाती है।

सामान्यतः हम युद्ध की विभीषिका से प्रत्यक्ष परिचित नहीं होते। लेकिन यह उपन्यास बताता है कि युद्ध केवल पराजितों के लिए ही नहीं, विजेताओं के लिए भी पीड़ादायक होता है। सामान्य मनुष्य का जीवन वैसे ही संघर्षों और दुखों से भरा रहता है, किंतु जब उसमें युद्ध जैसी परिस्थितियाँ जुड़ जाती हैं, तब त्रासदी और भी भयावह हो उठती है। फिर भी जीवन में कुछ ऐसे संयोग बनते हैं, जिनके सहारे मनुष्य जीने की राह खोज लेता है।

रूस के बर्फीले इलाके में पला-बढ़ा अनाथ कथानायक एन्द्रेई सकालोफ विवाह कर ट्रक ड्राइवर के रूप में अपना घर बसाता है। पत्नी और बच्चों के साथ उसका जीवन सामान्य ढंग से चल रहा होता है कि तभी हिटलर की सेना रूस पर आक्रमण कर देती है। अनिवार्य सैन्य सेवा के अंतर्गत उसे भी सेना में शामिल होना पड़ता है। इसके बाद उसके जीवन का दूसरा और सबसे कठिन अध्याय आरंभ होता है।

गोला-बारूद से भरे ट्रकों को मोर्चे तक पहुँचाने का जोखिमभरा काम करते हुए वह युद्ध की विभीषिका का सामना करता है। अंततः वह जर्मनों द्वारा बंदी बना लिया जाता है और युद्धबंदी के रूप में जर्मनी भेज दिया जाता है। वहाँ भूख, ठंड, अपमान, श्रम और अमानवीय यातनाओं के बीच उसका जीवन नारकीय हो उठता है।

लेखक ने युद्धबंदी शिविरों का अत्यंत हृदयविदारक चित्रण किया है। कथानायक कभी पत्थर काटता है, कभी कोयला खदानों में काम करता है। लकड़ी के बुरादे मिली रोटी और पतले शोरबे पर जीवित रहने को मजबूर युद्धबंदियों की स्थिति पाठक को भीतर तक झकझोर देती है।

उपन्यास का एक अत्यंत प्रभावशाली प्रसंग वह है, जब जर्मन कमांडर कथानायक के स्वाभिमान और राष्ट्रप्रेम से प्रभावित होकर उसकी जान बख्श देता है। सकालोफ भूख से व्याकुल होने के बावजूद दुश्मन के सामने अपने आत्मसम्मान को टूटने नहीं देता। यह प्रसंग उपन्यास की मानवीय ऊँचाई को दर्शाता है।

युद्ध के दौरान कथानायक किसी तरह जर्मन सेना से बचकर रूसी सेना तक पहुँचता है। लेकिन वहाँ पहुँचने पर उसे पता चलता है कि बमबारी में उसकी पत्नी और बेटियाँ मारी जा चुकी हैं। बाद में उसका बेटा भी युद्ध में शहीद हो जाता है। बेटे की मृत्यु का वर्णन अत्यंत मार्मिक है और पाठक को भावुक कर देता है।इतनी त्रासदियों के बाद भी उपन्यास निराशा की कथा बनकर नहीं रह जाता। अंत में कथानायक को एक अनाथ बालक मिलता है, जिसे वह अपना पुत्र बना लेता है। यही इस उपन्यास का सबसे बड़ा संदेश है कि तमाम विनाश और पीड़ा के बाद भी मनुष्य प्रेम, संबंध और आशा के सहारे जीवन को फिर से अर्थ दे सकता है।

“इंसान का नसीबा” युद्ध, मानवीय संवेदना, राष्ट्रप्रेम और जीवन-संघर्ष का एक सशक्त दस्तावेज है। सरल भाषा, प्रभावशाली कथन शैली और गहरी मानवीय दृष्टि इसे अत्यंत पठनीय बनाती है। यही कारण है कि इस उपन्यास का अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ और विश्वभर में इसे व्यापक सराहना मिली।

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