सरस्वती पूजनोत्सव: विद्या, संस्कार और बसंत उल्लास का पावन संगम

माघ शुक्ल पंचमी के पावन अवसर पर शुक्रवार को सरस्वती पूजनोत्सव पूरे श्रद्धा, आस्था और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। इस अवसर पर भारतीय विद्या प्रतिष्ठानों में छात्र-छात्राएं एवं शिक्षकगण सामूहिक रूप से मिट्टी की प्रतिमा या पट-चित्र स्थापित कर माता सरस्वती की आराधना-अर्चना करेंगे।

सरस्वती पूजा के अवसर पर माघीय श्री गुप्त नवरात्र के पांचवें दिन बच्चों का विद्यारंभ संस्कार कराया जाता है। आचार्य के निर्देशन में बालक-बालिकाएं श्याम पट (स्लेट) पर चौक (खड़िया) से

लिखकर एवं उच्चारण कर अक्षर पूजन करते हैं। यह संस्कार ज्ञानार्जन की शुभ शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।

माता सरस्वती को नैवेद्य स्वरूप चावल, गुड़, आम्र मंजरी, बेर, मिश्री कंद एवं पायस (खीर) अर्पित किया जाता है। बसंत पंचमी को सात्विक भाव से बसंती वस्त्र धारण कर सनातन परंपरा के अनुसार पर्व मनाया जाता है।

इसी दिन संध्या काल में भगवान शिव को तिलक अर्पित करने की परंपरा है। रात्रि से बसंतोत्सव का शुभारंभ होता है, जिसमें साज-आवाज, वाद्य यंत्रों की पूजा तथा होली गायन प्रारंभ किया जाता है। ढोलक-झाल की मधुर ध्वनि के साथ अबीर-गुलाल उड़ाए जाते हैं।

इस अवसर पर गुरुदेव आचार्य पं. लालमोहन शास्त्री ने बताया कि यह सनातन परंपरा रही है कि “जहाँ तीन नारियाँ मिलती हैं, वहाँ एक दिखाई नहीं देती—जैसे गंगा, यमुना और सरस्वती।” गंगा-यमुना दिखाई देती हैं, किंतु सरस्वती को हृदय में जागृत करना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि जैसे नारी तीन लटों से चोटी बांधती है पर दो ही रेखाएँ दिखाई देती हैं, उसी प्रकार प्रत्येक जीव के हृदय में माँ सरस्वती विराजमान हैं। उन्होंने चिंता जताई कि पुराना होली गायन धीरे-धीरे लुप्त होता जा रहा है, जिसे संरक्षित करने की आवश्यकता है।

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