शारदीय नवरात्र 22 सितम्बर से, दुर्गा पूजा महोत्सव की तैयारियां शुरू

शारदीय नवरात्र का शुभारंभ 22 सितम्बर (सोमवार) से होगा, जो 2 अक्टूबर (गुरुवार) तक चलेगा। इस वर्ष आश्विन शुक्ल पक्ष सोलह दिनों का होगा और चतुर्थी तिथि की वृद्धि के कारण इसे अत्यंत शुभ माना गया है।

आचार्य पं. लाल मोहन शास्त्री ने बताया कि पहले दिन प्रातः जलयात्रा, कलश में जलारोहण, शुभ मृतिका हरण, वेदी निर्माण, जौ-गेहूं वपन और शांति कलश स्थापना की जाएगी। पंचांगों के अनुसार इस वर्ष माता रानी का हाथी पर आगमन होगा, जिसे सुवृष्टि और समृद्धि का सूचक माना गया है।

बताया कि कलश स्थापना का सामान्य समय प्रातः 05:59 से सायं 06:01 बजे तक है, जबकि सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त प्रातः 05:59 से 07:47 बजे तथा मध्याह्न 11:25 से 12:10 बजे तक रहेगा। इस अवधि में हस्त नक्षत्र और सर्वार्थ सिद्धि योग का संयोग भी बन रहा है। इसके साथ ही चंडी दुर्गा सप्तशती पाठ की शुरुआत होगी।

उन्होंने ने बताया कि यह उत्सव 28 सितम्बर (रविवार) से शुरू होकर 2 अक्टूबर (गुरुवार) तक चलेगा। षष्ठी तिथि (28 सितम्बर): सुबह ज्येष्ठा नक्षत्र का संयोग रहेगा। शाम में बिल्वतरु बोधन, आमंत्रण और अधिवास होगा। सूर्यास्त के बाद कुलदेवता के पास दीपदान किया जाएगा रोल। इसी दिन पंडाल की प्रतिमा और आचार्य का रक्षासूत्र बंधन होगा।

सप्तमी तिथि (29 सितम्बर): सुबह नवपत्रिका स्नान और स्थापना होगी। 6:04 से 7:28 बजे तक मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा का आयोजन रहेगा। बंगाल परंपरा अनुसार इस बार माता रानी गज (हाथी) पर सवार होकर पधारेंगी, जिसे शुभ माना जाता है। शाम से तीन दिवसीय पुष्पांजलि शुरू होगी। मध्यरात्रि में माँ सिद्धेश्वरी काली की विशेष पूजा और तांत्रिक अनुष्ठान होंगे।

महाअष्टमी (30 सितम्बर): सुबह से विशेष पूजा होगी। संध्या में पंडाल में पुष्पांजलि अर्पित की जाएगी। रात को जागरण होगा। अष्टमी और नवमी के संधि काल में (1:21 से 2:09 बजे तक) संधि पूजा की जाएगी। इसके बाद महाआरती होगी।

महानवमी (1 अक्टूबर): दिनभर हवन, बलिदान और कुमारी पूजा का आयोजन होगा। शाम में आरती और पुष्पांजलि के साथ कार्यक्रम सम्पन्न होगा। रात में कलश विसर्जन किया जाएगा।

विजया दशमी (2 अक्टूबर): सुबह से उत्तर पूजा, अपराजिता शमी पूजा और शस्त्र पूजन होगा। इसके बाद नीलकंठ दर्शन की परंपरा निभाई जाएगी। माता रानी पालकी में प्रस्थान करेंगी और विजय यात्रा निकाली जाएगी।

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