वालेंटिना मोरोशानु समकालीन रोमानियाई साहित्य की कवयित्री की दो कविता


अनुवादक _ लक्ष्मीकांत मुकुल, हिन्दी कवि, भारत

विचारों का भी अपना एक रंग होता है
कभी आसमान-सा गहरा,
कभी बरसाती बादलों-सा बेचैन,
कभी सफ़ेद बर्फ़ की थरथराती निस्तब्धता-सा।
और कभी— सर्दियों की उनींदी शामों में,
जब दादी की धीमी आवाज़
चाँद के कोने में छिपे किस्सों को उतारकर
हमारी हथेलियों पर रख देती है,
तब विचारों में तारे उतर आते हैं
अपने पूरे लोककथायी उजाले के साथ।

वे पुरखों से चली आती
उस बुद्धिमत्ता की गवाही देते हैं
जो विश्वास की मिट्टी में पली थी—
सीधा रास्ता, संतुलित चाल,
कथनों में सयम, ईश्वर के प्रति विनम्र भय,
और बुराई से बचते रहने की
पुरानी, पर सजीव दीक्षा।
उसी से सँभली है
रोमानियाई लोक-आत्मा की थाती,
और उसी में चमकती है
उनकी प्रिय भाषा का गम्भीर सौन्दर्य।

विचारों का एक दूसरा रंग भी होता है—
दिल की धड़कन-सा लालिमायुक्त।
जो हर शब्द में अपना उजाला भेजता है।
शब्द— किसी गुप्त शक्ति का स्रोत बनकर
हमें आगे बढ़ाता है—
लक्ष्य की ओर, उन बचपन के सपनों की ओर
जो रोशनी, शान्ति और सद्भाव की राह पर
धीरे-धीरे खिले थे।

इसी तरह हमारा जीवन भी
शब्दों की रोशनी में रँगा हुआ
भविष्य की समझदार पृष्ठों पर पसरता जाता है।
पुरखों की सीख का सहारा लेकर
सीधे रास्तों पर चलते हुए—
हम परम्पराओं को थामते हैं,
लोक-वस्त्रों की सादगी,
संयम, विनम्रता और क्षमा के परिधान को
अपने भीतर जीवित रखते हैं।
गीतों और आशीषों के फूलों से बना
यह पुरखों का वस्त्र हम पर हर मौसम में
चुपचाप ठहर जाता है।

शब्द का एक रंग घास की हरियाली-सा भी है,
जहाँ छोटी-छोटी जीवितियाँ
नर्म गुलाब में अपना संसार बुनती हैं,
जहाँ घोंसलों में छिपे अँखुए
पहला गीत सीखते हैं,
और मैदान की गायक-चिड़ियाँ
अपनी हरी-भरी डोरियों में लिपटी
एक प्राचीन-सी ‘दोइना’ गाती हैं।
ओस की पारदर्शी दानों में
लहराता हुआ सारा देश
आकाश की किसी अद्भुत सिम्फ़नी की तरह
धरती को सौंप देता है अपनी उजली थिरकन।

धरती मुस्कुराती है मानो अपनी भूरी महक में
दुनिया के लिए भलाई का रस घोल रही हो।
ऋतुओं के परिधानों में रंग बदलती हुई
वह हमारे मन के भीतर नये रंगों का विस्तार करती है
शान्ति, प्रसन्नता, स्वास्थ्य और निरन्तरता के रंग।
और जब सुबह का सूर्य उसके माथे पर उतरता है,
तो हमारी दिनों की डायरी
धीरे-धीरे धरती के वर्षों में रंग भरती चली जाती है।

2. एक ही आकाश के नीचे

एक ही आकाश के नीचे
हम खड़े हैं, मन खोलकर:
बुज़ुर्ग, बच्चियाँ, स्वप्न देखने वाली युवतियाँ—
कदम भले अलग हों,
पर अधिकारों का वायदा हम सबके लिए एक-सा है,
इस दुनिया में जो किसी शांत आसरे की तलाश में है।

एक ही आकाश के तले
पुरानी तारों से भरे हुए, हमें जोड़ता है
लौट-लौट आने वाला विरह,
भविष्य का छोटा-सा स्वप्न, और शब्दों का विश्वास।
बच्चे दूर तक फैले क्षितिजों में खेलते हैं,
और दादा-दादियाँ
धरती को अपनी मौन आशीषें सौंपते हैं।

एक ही आकाश के नीचे— माता-पिता
अपनी आँखों में रोशनी,
और स्मृतियों में रोटी का स्वाद सँभाले हुए,
फिर लौटते हैं उस पुरानी पाठशाला की ओर,
जो एक दुआ की तरह हमें बुलाती है—
कर्तव्य के पास और प्रेम के भीतर।

एक ही आकाश के नीचे— प्रवासी पंछी
हमारे विचारों को
एक नम्र, उजले संसार की ओर ले जाते हैं,
जहाँ जंगलों की छाती में भी
धूप बोलती है और शांति
मन के भीतर धीमे से उतर आती है।

एक ही आकाश के नीचे— रोमानियाई शब्द
अपनी नन्ही-सी डोर शुद्ध जड़ों से बुनता है।
और तुम्हारी कविता में, प्रिय कवयित्री,
मुझे हर दिशा से
एक दिव्य प्रकाश का पाठशाला-सा
उजाला प्रवाहित होता दिखता है।

एक ही आकाश के नीचे—कथाओं के कोपलें,
जनजातियों की यादें, इच्छाएँ और शब्द—
सब इकट्ठा होकर समय की हथेली पर बैठते हैं,
जहाँ स्वर्गीय इशारों में
जीवन अपनी अगली सीख लिखता है।

एक ही आकाश के नीचे—
कोश्कोदेनि के मोर अपनी भव्यता
क्षितिज पर छलका देते हैं।
और तुम, प्रिय कवयित्री,
अपने वरदानी स्वर से उन्हें बुलाती हो—
कि वे इस दुनिया की पवित्र राह पर शुभता की वर्षा करें।

एक ही आकाश में—
लड़कियाँ और जवान लड़के
बागीचों में स्वप्न की लहरों-से दौड़ते हैं,
और बच्चे फूलों-से हँसते हुए
अपने धैर्यवान बड़ों के नेह भरे नज़रों के नीचे पलते हैं।

एक ही आकाश के नीचे—
शब्द ऊपर उठते हुए जीवित आलय बन जाते हैं।
और पिता—अपनी गरमाहट भरी आवाज़ में
तुम्हारी कविता को धीमे-धीमे प्रार्थना का वस्त्र पहनाते हैं।

एक ही आकाश के नीचे—प्रकृति
तुम्हारे माँ-मन और कवयित्री-हृदय को झुककर प्रणाम करती है। जंगल हर नए छंद के उत्तर में
खुशियों से भर उठते हैं
जिन्हें तुम चुपचाप उन तक पहुँचाती हो।

मोरों के उजाले से भरे
उस कोमल आकाश के नीचे
जीवन की किताब खुलती है— निर्दोष, सहज।
मानवता—वह धागा है, जो जोड़ता है,
और हर सुंदर कर्म में शांति का बीज बोता है।

मोर भोर के शब्दों में नाचते हुए,
अपनी धरती और अपनी लालसा से
रँगे पंख फैलाते हैं और जीवन की वह किताब—
एक जीवित प्रार्थना की तरह—
हमें प्रेम की दीर्घकालिक शिक्षा देती है।

शांति के उस कोमल आकाश में—
सजग तारों के नीचे— बुज़ुर्ग, माता-पिता और बच्चे
एक साथ इकट्ठा होते हैं।मानवता—वह वेदी है
जो कभी नहीं टूटती,जब आत्मा गाती है
और दिल पुकारता है।

और तुम, प्रिय कवयित्री—
अपने पवित्र शब्दों से समय के गीत पर
दुनिया की यह किताब लिखती हो।
कोशकोदेनि के मोर उड़ान में तुम्हें उत्तर देते हैं—
शांति और अनुग्रह से भरी एक युगान्तर धरोहर की तरह।

मोरों की उस उजली आँखों वाले
दीप्तिमान आकाश में एक मौन, पवित्र पुस्तक खुलती है
उदासी और प्रेम से धुले पन्नों पर
शब्द अपनी पवित्रता में टिके हुए,
मानवता को लिखते जाते हैं समझदार, शांत हाथों से।

शांति के उस आकाश में
जब भोर शब्दों की तरह उतरती है
धरती के भीतर से एक प्रार्थना उठती है:
वह हमारे दादा-दादियों की आवाज़ है,
कोमल, पारदर्शी,
जो दुनिया के भाग्य को आशीष से भर देती है।

मोर अपनी स्वप्नीली पंखुड़ियाँ झाड़ते हुए,
शरद की पत्तियों पर
और खुली सोच पर अपनी चमक छोड़ जाते हैं।
और जीवन की वह पुस्तक
एक जीवित वेदी की तरह— हर आत्मा को
शिशु-सा उजाला देती
मनुष्यता– वह पुल है जो कभी नहीं टूटता,
जब आकाश हमें पुकारता है,
और शांति हमारे नाम लिखती है।
तुम, प्रिय कवयित्री— अपने पवित्र छंदों के साथ
हमें एक ही आकाश में रखती हो,
एक ही धरती की साझी साँस में।

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