
जिंदगी ना मिलेगी दोबारा, जिंदादिली से जीने की सीखें कला(विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस विशेष : 10 सितंबर 2026)जीवन के मोल का अंदाजा केवल एक बात से लगा लीजिए कि एक मृत शरीर में दुनिया की सारी दौलत खर्च करके, अत्याधुनिक अस्पतालों, सरकारों और धार्मिक कर्मकांडों के माध्यम से कोशिश कर लें, पूरे ब्रह्मांड की ताकत लगा दें, फिर भी मृत शरीर में एक सेकंड के लिए भी जान नहीं लाई जा सकती। मतलब जीवन अनमोल है। उसे खत्म करने का अधिकार हमें स्वयं भी नहीं है, क्योंकि यह जीवन प्रकृति और अपने प्रियजनों की देन है।
हर साल 10 सितंबर को “विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस” के रूप में आत्महत्या की रोकथाम और जागरूकता के लिए दुनियाभर में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों में आत्महत्या जैसे विचारों को दूर करने तथा सकारात्मक और सहायक वातावरण बनाने पर जोर देना है। वर्ष 2024 से 2026 तक इसकी थीम “आत्महत्या के बारे में सोचने के तरीके को बदलना और बातचीत शुरू करना” रखी गई है।
आज के आधुनिक युग में आत्महत्याओं में हो रही वृद्धि हमें संकेत दे रही है कि हम कहीं न कहीं अनुचित वातावरण में जी रहे हैं। आत्महत्या के कारणों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, मानसिक दबाव और मनोवैज्ञानिक समस्याएं, अकेलापन और कमजोर होते सामाजिक संबंध, असफलता, पढ़ाई और करियर का दबाव, आर्थिक असुरक्षा, धोखाधड़ी, भय, रिश्तों का टूटना, सामाजिक तुलना और डिजिटल दबाव, हिंसा, दुर्व्यवहार और भेदभाव, नशीले पदार्थों का सेवन या बुरी लत, झूठे दिखावे की आदत तथा शरीर या मन में लंबे समय तक रहने वाला दर्द और बीमारी शामिल हैं। ऐसे अनेक कारणों से आत्महत्या का जोखिम बढ़ता है और इस दिशा में जल्द सुधार की आवश्यकता है।
जब आत्महत्या होती है, तब केवल एक जान नहीं जाती, बल्कि उस परिवार, रिश्तेदारों, कार्यस्थल, समाज और उससे जुड़े पूरे समुदाय में हमेशा के लिए एक स्थान रिक्त हो जाता है। इसका सामाजिक, भावनात्मक और आर्थिक प्रभाव भी पड़ता है। आत्महत्याओं को रोकने के लिए आपसी रिश्तों में सहानुभूति के साथ बातचीत को बढ़ावा देना बहुत जरूरी है। गलतफहमियों को दूर करना, समस्याएं साझा करना, खुलेपन से अपनी बात रखना तथा सहानुभूति और सहयोग का माहौल बनाना बेहद आवश्यक है। सरकार और सामाजिक संस्थाओं को भी समाज में सकारात्मक वातावरण बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए।
जिस देश या समाज में अधिक समस्याएं और परेशानियां होती हैं, वहां रहने वाले लोगों को जीवन में अधिक संघर्ष का सामना करना पड़ सकता है। ऐसी परिस्थितियां मानसिक तनाव को बढ़ा सकती हैं और आत्महत्या तथा अन्य सामाजिक समस्याओं का जोखिम भी बढ़ा सकती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानसिक स्वास्थ्य एटलस 2024 रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2021 में दुनियाभर में लगभग 7.27 लाख मौतें आत्महत्या के कारण हुईं। युवाओं में आत्महत्या मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है। वैश्विक स्तर की तुलना में भारत में भी आत्महत्या एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनी हुई है। महाराष्ट्र में किसान वर्ग की आत्महत्याएं विशेष चिंता का विषय हैं। महाराष्ट्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2023 में राज्य में कुल 6,669 किसानों और खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की, जबकि पूरे भारत में 10,786 किसानों ने आत्महत्या की थी।
बहुत बार हमें पता होता है कि कोई चीज हमारे लिए नुकसानदायक है, फिर भी हम नहीं सुधरते। अनेक बार छोटी-छोटी और बेवजह की बातों को अधिक तूल दिया जाता है, जिसका सीधा बुरा असर हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है। आजकल खुद को दुख देने के लिए हम स्वयं भी कई बार जिम्मेदार होते हैं। जल्द गुस्सा आना, मनमाफिक काम न होने पर आपा खो देना, दूसरों को दोष देना या उनसे द्वेष करना, दूसरों पर अंधा भरोसा करना, भावनाओं में बह जाना, स्वार्थ और लालच, झूठा दिखावा करना तथा विपरीत परिस्थितियों में भी दिखावे को बनाए रखना, समाधान तलाशने के बजाय समस्या में उलझे रहना, लगातार जिंदगी की प्रतियोगिता में भागते रहना, बुरी संगत, दूसरों की खुशी में दुखी और दूसरों के गम में खुश होना, ईर्ष्या, लोगों से अत्यधिक अपेक्षाएं रखना, दूसरों पर जरूरत से ज्यादा आश्रित होना, मानसिक दबाव और प्रभाव के शिकार होना, मेहनत से दूर भागना और शॉर्टकट अपनाना जैसी अनेक बातें मनुष्य की अपनी उपज हैं। चाहे तो मनुष्य इन पर नियंत्रण रखकर बेहतर, स्वास्थ्यवर्धक और संतोषपूर्ण जीवन जी सकता है।
हमारी गलतियों का नतीजा ही कई बार हमें आत्महत्या जैसे विचारों तक ले जाता है। इसलिए अपने काम और व्यवहार को ऐसा बनाएं, जिससे हम अनावश्यक परेशानियों और गलतियों से बच सकें।
दूसरों पर जल्द भरोसा न करें और किसी पर भी आंख मूंदकर विश्वास न करें। समयानुसार अपने काम में परिवर्तनशीलता लाएं और नए कौशल सीखें। गहरे मनोवैज्ञानिक खेल खेलने वाले लोगों से बचें। झूठे दिखावे से बचें और नशे से दूर रहें। बुरी संगत से बचें। पछतावे में समय न गंवाएं, बल्कि यह सोचें कि अब क्या बेहतर किया जा सकता है। कम ही सही, लेकिन अच्छे लोगों के संपर्क में रहें, जो विपरीत परिस्थितियों में भी आपका साथ दें। आधुनिकता और सोशल मीडिया की लत से बचें। किसी भी निर्णय से पहले सोचें-समझें और उसके संभावित परिणाम का अंदाजा लगाएं, फिर कदम उठाएं। उग्र गुस्से, भावनाओं या जोश में आकर अनुचित निर्णय लेने से बचें। आधुनिक जीवनशैली के नकारात्मक पहलुओं को आंख मूंदकर अपनाने से बचें। संतोषी बनें, मेहनत पर भरोसा करें, अपनी इच्छाएं दूसरों पर न थोपें, रोजाना खुद के लिए समय निकालें और स्वस्थ रुचियों एवं शौक को प्राथमिकता दें।
शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की तंदुरुस्ती के लिए रोजाना व्यायाम करें। प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा करें, पशु-पक्षियों के प्रति संवेदना रखें तथा परोपकार की भावना जगाएं। असहायों की मदद करें। जिंदगी जिंदादिली से जीनी है, काटनी नहीं है। अपनों के प्यार और भावनाओं की कद्र करें तथा अपने अनमोल जीवन का मोल समझें। हमारी वजह से कभी किसी को तकलीफ न हो, ऐसा जीवन जीने का संकल्प लें।अगर हम कोई अनुचित काम नहीं कर रहे हैं तो लोग क्या कहेंगे, इसकी चिंता न करें। कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता। दूसरों की खुशी में खुश होना और दूसरों के गम में उनका दर्द बांटना ही इंसानियत है। यही मानव का फर्ज है। ऐसी आदतों और वातावरण में जीने वाला व्यक्ति हमेशा सकारात्मक ऊर्जा से ओतप्रोत रहता है। वह तकलीफों और मुश्किलों से भागता नहीं, बल्कि डटकर उनका मुकाबला करता है। हमेशा शांत, सजग, संतुष्ट और प्रसन्न रहने का प्रयास करता है। हमें भी इसी तरह जीवन जीना है।
लुई ब्रेल, अब्राहम लिंकन, फ्लोरेंस नाइटिंगेल, महात्मा ज्योतिराव फुले, सावित्रीबाई फुले, थॉमस एडिसन, अलेक्जेंडर ग्राहम बेल, मैरी क्यूरी, डॉ. बी. आर. आंबेडकर, श्रीनिवास रामानुजन, चार्ली चैपलिन, नेल्सन मंडेला, मदर टेरेसा, ए. पी. जे. अब्दुल कलाम, दशरथ मांझी, बछेंद्री पाल, सिंधुताई सपकाल, अरुणिमा सिन्हा, मलाला यूसुफजई, निक वुजिसिक, तुलसी गौड़ा, सोनम वांगचुक और मैरी कॉम जैसे असंख्य लोग हुए हैं और आज भी हैं, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों पर मात कर संघर्षमय जीवन को एक मिसाल बनाया और दुनिया में पथप्रदर्शक के रूप में रोशनी बिखेरी है।
तनाव के कारण हार्ट अटैक, पक्षाघात और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए किसी भी समस्या में अत्यधिक तनाव लेने के बजाय तनाव प्रबंधन की कला सीखनी चाहिए। यह कला हम अपने देश के नेताओं और महान व्यक्तित्वों के संघर्षपूर्ण जीवन से भी सीख सकते हैं। अतिसाधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि के व्यक्ति, साधारण कद-काठी वाले और सीमित संसाधनों में जीवन बिताने वाले दशरथ मांझी ने बिना किसी के सहारे 22 वर्षों के अथक परिश्रम से अकेले पहाड़ काटकर लोगों की सुविधा के लिए रास्ता बनाया। इतनी मुसीबतों के बावजूद उन्होंने इतिहास रचा। तो फिर हम क्यों जल्दी जिंदगी से हार मान लें?
जब तक सफलता नहीं मिलती, तब तक प्रयास जारी रखें। अपने काम में छोटी-सी चींटी भी कभी हार नहीं मानती, फिर हम तो इंसान हैं। जीत जाएंगे हम भी, अगर हमारा इरादा और हौसला बुलंद है। मुश्किलें, असफलता या दुख आएं अथवा कभी बुरे ख्याल परेशान करें तो एक बात हमेशा ध्यान में रखें कि दुनिया में हमसे भी ज्यादा कठिन परिस्थितियों में लोग जी रहे हैं। समय परिवर्तनशील है, वक्त बदलता जरूर है। हमारा वक्त भी बदलेगा।
- लेखक – डॉ. प्रितम भि. गेडाम
(महाराष्ट्र सरकार से सम्मानित लेखक)
मोबाइल : 082374 17041





