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(प्रसंगवश/कृष्ण किसलय) : सघन साल वन के संकटग्रस्त वासी, पेड़-पूजक कोरवा आदिवासी

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सघन साल वन के संकटग्रस्त वासी, पेड़-पूजक कोरवा आदिवासी
-कृष्ण किसलय
(संपादक, सोनमाटी)

(हीरामन कोरवा अपने शब्दकोश के साथ )

सोनघाटी में कैमूर पर्वत की उपत्यका के साल वन के कुड़ुख-भाषी उरांवों से भी पूर्ववर्ती बाशिंदा रही आदिम जनजाति कोरवा के एक वंशधर ने अपने पुरखों की प्राचीन हस्ती को बचाने और इस वनवासी समुदाय को नई हैसियत से लैस करने का बीड़ा उठाया है। वह वंशधर है झारखंड राज्य के गढ़वा जिला के रंका प्रखंड का हीरामन कोरवा। हीरामन कोरवा एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में अपने समुदाय के वनवासियों को राशन-पेंशन दिलाने का काम करते रहे हैं और शिक्षक बनने के बाद इन्होंने कोरबा बोली के चार हजार शब्दों का कोश तैयार किया, जिसका प्रकाशन झारखंड राज्य के पलामू जिला के मेदिनीनगर (डालटनगंज) के मल्टी आर्ट एसोसिएशन ने किया है। सोनघाटी के ही छोटा नागपुर पठार के प्रागैतिहासिक इतिहास के अति आरंभिक छोर को पकडऩे के लिए इस आदिम जनजाति की बोली के जीवाश्म की तरह बचे शब्द टिमटिमाते चिराग हैं। हीरामन कोरवा के शब्दकोश के महत्व की चर्चा प्रधानमंत्री ‘मन की बात’ कार्यक्रम में कर चुके हैं। पृथ्वी की संकटग्रस्त जनजाति में शामिल कोरवा की संख्या 2011 की जनगणना में करीब 36 हजार थी, जिनमें से अधिसंख्य झारखंड में हैं। झारखंड की 32 जनजातियों में से कोरवा सहित 09 जनजाति को पीवीटीजी श्रेणी (विलुप्त होने की ओर अग्रसर) में रखा गया है। हजारों साल पहले इस यायावर आदिम आदिवासियों का कुनबा बिहार के कैमूर जिला के अघौरा पर्वत से उतरकर पूरब में सोन नदी पार झारखंड में पहुंचा था। अधौरा में 1991 में 13 कोरवा परिवार ही बच रहे थे।
माना गया है कि कोरवा महाभारत काल के कौरवों के वंशधर हैं, इनके पुरखे कौरवों के पूर्वज थे। हडिय़ा, पहाड़ी आदि इनकी उपजाति हैं। पर्वतीय क्षेत्र के सघन वन में रहने वाली इस जनजाति की आबादी एक सदी पहले 1911 की जनगणना में 13920 थी। मुख्यत: सखुआ (साल) केपेड़ वाले जंगल की बाशिंदा यह जनजाति वृक्ष-रक्षक, पेड़-पूजक है, जो धार्मिक पर्व ‘सरनाÓ में साल (सखुआ) के पेड़ की पूजा करती है। यही कारण है कि इस पेड़ का महत्व इनके जीवन में सुबह दतवन (ब्रश करने) से लेकर इसके बीज (सरना) को उबाल कर महुआ के साथ भोजन करने तक आज भी कायम है।
हीरामन कोरवा झारखंड राज्य में गढ़वा जिला के रंका प्रखंड के सुदूर जंगल मेंसिंजो गांव वासी ओपुन (पिता) गणेश कोरवा के बेटा (पोड़ाहोपुन) हैं, जो पसंगी की मड़ंग (अलाव की आग) की रोशनी में नई सदी में इंटर तक पढ़ाई कर 2005 में 12 हजार रुपये महीने की स्कूल के पारा शिक्षक की नौकरी पाने वाले अपने गांव के पहले व्यक्ति हैं। सोनमाटी-संपादक से इन्होंने सिंजो से चार किलोमीटर दूर जंगल के गांव भदुआ से 15 फरवरी की रात बात की, क्योंकि इनके गांव में मोबाइल फोन का टावर नहींपकड़ता है। 20 साल पहले पढ़े-लिखे हीरामन को उनके समुदाय के लोग हिंदी बोलने के कारण उन्हें कोरवा मानते ही नहींथे। तब उन्हें कोरवा बोलकर जाति सिद्ध करनी पड़ती थी। हिंदी में पढऩे-लिखने के बावजूद उन्हें अपनी कोरवा बोली, उसकी ध्वनि बचपन से ही अच्छी लगती थी और उसके शब्दों को वह कापी में नोट करते थे। जब वह पैरा शिक्षक बने, तब उनके संपर्क का दायर बढ़ा, हौसला बढ़ा और 12 सालों की मेहनत के बाद कोरवा बोली का प्रथम शब्दकोश तैयार हुआ। अक्टूबर 2020 में शब्दकोश का विमोचन किया गया। सांसद विष्णुदयाल राम के जरिये बात प्रधानमंत्री तक पहुंची। बहरहाल यह आदिवासी जाति भी समय के साथ बेहद धीमी रफ्तार से ही सही, पर बदल रही है। हीरामन, गणेश (पिता), ललिता (पत्नी), मानिकचंद (मित्र) आदि नामकरण इस बात के प्रमाण हैं। हीरामन मानते हैं, पढ़ाई से ही कोरवा समाज का माइंडसेट (दिमाग) बदलेगा, जिसका इस समाज में घोर अभाव रहा है।

संपर्क : सोनमाटी-प्रेस गली, जोड़ा मंदिर, न्यू एरिया, डालमियानगर-821305, जिला रोहतास (बिहार) फोन : 9523154607, 9708778136

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