हड़प्पा काल में ड्रिल कर होती थी दंत चिकित्सा

दांत उखाडऩे में नहीं, उसे जमाए रखने में है डाक्टरी दक्षता : डा. अभिषेक सिद्धार्थ

अति प्राचीन है दंत चिकित्सा का इतिहास : पुरातात्विक खोजों में जहां लाखों साल पहले के पूर्व-मानव (होमो) में दंत क्षरण की बीमारी होने के साक्ष्य प्राप्त किए गए हैं, वहीं हजारों साल पहले (पांच-सात हजार वर्ष पूर्व) विश्व की सबसे प्राचीन भारतीय सभ्यता  (सिंधु सरस्वती सभ्यता) के मोहनजोदड़ो-हड़प्पा काल में आधुनिक मानव (होमो सैपियन) के दांतों की चिकित्सा ड्रिल कर किए जाने के सूबत मिले हैं।

 

 डेहरी-आन-सोन (रोहतास, बिहार)-कृष्ण किसलय। दर्द देने वाले दांत को उखाडऩे में नहीं, बल्कि डाक्टर की दक्षता शरीर के इस महत्वपूर्ण अंग को जमाए रखने और मजबूत बनाए रखने में है। इसीलिए आज दांतों की सुरक्षा के लिए बेहतर चिकित्सकीय उपकरणों की दरकार है और आधुनिक दंत चिकित्सा विज्ञान इसके लिए प्रयासरत है कि बेहतर, सटीक व किफायती उपकरण दांत के मरीजों के उपचार के लिए उपलब्ध हो सकेें। दांत का पोषण शरीर के अन्य अंगों के पोषण से थोड़ा अलग किस्म का है, इसलिए दांत की चिकित्सा थोड़ी महंगी है, क्योंकि बेहतर उपकरणों के बिना मरीजों की बेहतर चिकित्सा नहींहो सकती और उनके साथ चिकित्सकीय न्याय नहींकिया जा सकता। यह कहना है रूट कनाल विशेषज्ञ सर्जन युवा दंत चिकित्सक और ब्राइट स्माइल डेन्टल क्लिनिक के प्रबंध निदेशक डा. अभिषेक सिद्धार्थ का।

दन्तक्षय मुख्य तौर पर दो जीवाणुओं के कारण
डा. अभिषेक सिद्धार्थ ने सोनमाटी मीडिया समूह को विशेष बातचीत में दांतों की जैविक संरचना, दांतों की बीमारी व चिकित्सा की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि जैविक दृष्टि से दांत के मुख्य तीन हिस्से (दंत बल्क, दंत ऊतक और दंत मूल) हैं। दंतक्षरण (दंतअस्थि क्षय या छिद्र) की बीमारी दांत की सख्त संरचना को क्षतिग्रस्त करती है। ऊतकों के टूटने से दातों में छेद हो जाते हैं। दन्तक्षय मुख्य तौर पर दो जीवाणुओं स्ट्रेप्टोकोकस म्युटान और लैक्टोबैसिलस के कारण होता है। इन जीवाणुओं से हुई दांत की बीमारी का इलाज नहींकिया गया तो धीरे-धीरे भयानक रूप ले लेता है और चरम स्थिति मौत का भी कारण बन सकती है। दांत की पुनस्र्थापना एन्डोडॉन्टिक उपचार (रूट कनाल) तब ज्यादा जरूरी है, जब दंतक्षरण मसूड़े की मांस तक पहुंच चुका होता है और जिसका उपचार सिर्फ दवाई से संभव नहींहो। रूट कनाल विधि में दांत के क्षतिग्रस्त भाग (मांस, नस आदि) औजारों द्वारा साफ कर रबर जैसा पदार्थ भर दिया जाता है। रूट कनाल के बाद लगाए गए कृत्रिम दांत संवेदनहीन (सेंसलेस) होते है, क्योंकि इसमें सजीव ऊतक नहींहोता। दांत उखाडऩा तो दंतक्षरण का अंतिम उपचार है। क्षतिग्रस्त दांत तभी हटाया जाना चाहिए, जब वह इतना अधिक नष्ट हो चुका हो कि उसे पुनस्र्थापित करना संभव नहीं हो।

मुंह का स्वस्थ और दांत का मजबूत होना सबसे जरूरी
डा. अभिषेक सिद्धार्थ के अनुसार, दांतों की बीमारियों में अमेलोजेनेसिस इम्पर्फेक्टा नामक बीमारी औसतन एक हजार में एक व्यक्ति (कहीं700 और कहीं1400) को होता है। इस बीमारी के कारण दन्त बल्क निर्मित नहींहो पाता और दांत गिर जाता है। दन्त बल्क का 96 फीसदी हिस्सा खनिजों से बना होता है, जो अम्ल के संपर्क में आने पर घुलता रहता है। दन्त ऊतक व दन्त मूल में क्षरण होने पर खतरा अधिक होता है, क्योंकि दांत के इन हिस्सों में खनिज की मात्रा कम होती है। स्वस्थ मुंह में दांत के क्षरण का खतरा कम होता है। इसलिए दांतों की सफाई जरूरी है। आधुनिक उपकरणों से दांतों व मसूड़ों के भीतरी हिस्से की स्वच्छता को बेहतर बनाए रखा जा सकता है। मुंह का स्वस्थ होना और दांत का मजबूत होना सबसे जरूरी है, क्योंकि जीवन के लिए भोजन का आरंभिक प्रस्थान मुंह ही है। अगर दांतों में चबाने की क्षमता नहींहोगी तो भोजन पचाने की पहली प्रक्रिया ही कमजोर होगी और पेट में गैस बनता रहेगा, जो धीरे-धीरे अन्य बीमारी का कारण बन जाता है।

स्वच्छता-सफाई और जागरूकता की नियमित दरकार
डा. सिद्धार्थ ने बताया कि मुंह की नियमित सफाई-स्वच्छता से दांत-मुंह की बीमारी नियंत्रित होती है। मुंह में रहने वाले जीवाणु कार्बोहाइड्रेट खाकर दांत की त्रिस्तरीय संरचना (दंत बल्क, दंत ऊतक व दन्त मूल) को क्षति पहुंचाने वाले अम्ल पैदा करते हैं। दांत की बीमारी नहींहोने पाए, इसके लिए ही भोजन के बाद ब्रश से दांतों की सफाई करने की अनुशंसा की जाती है। दांत की सफाई से भोजन-नाश्ते के बाद दांतों पर रह गए कार्बोहाइड्रेट साफ हो जाते हैं। नियमित रूप से दिन में दो बार ब्रश करने की आदत डालनी चाहिए। तंबाकू, जरूरत से ज़्यादा अलकोहल सेवन, ज्यादा मीठा आहार, केक, कुकीज, कैंडी आदि के अत्यधिक सेवन से बचना चाहिए। आज भी लोगों को स्वास्थ्य की दृष्टि से साक्षर होने की जररूरत है। इसीलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी प्रभावकारी संस्था दुनिया भर में स्वास्थ्य से संबंधित विभिन्न दिवसों का आयोजन कर जागरूक करने का कार्य करती है। लोगों में जागृति पैदा करने के लिए ही २० मार्च को विश्व ओरल हेल्थ (मुखस्वास्थ्य) दिवस और 7 अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 1948 में विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाने का फैसला 7 अप्रैल को जनेवा में लिया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन से दुनिया के 195 देश जुड़े हुए हैं।

अति प्राचीन है दंत चिकित्सा का इतिहास

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पुरातात्विक खोजों में जहां लाखों साल पहले के पूर्व-मानव (होमो) में दंत क्षरण की बीमारी होने के साक्ष्य प्राप्त किए गए हैं, वहींहजारों साल पहले (पांच-सात हजार वर्ष पूर्व) विश्व की सबसे प्राचीन भारतीय सभ्यता (सिंधु सरस्वती सभ्यता) के मोहनजोदड़ो-हड़प्पा काल में आधुनिक मानव (होमो सैपियन) के दांतों की चिकित्सा ड्रिल कर किए जाने के सूबत मिले हैं। अविभाजित भारत के बलूचिस्तान (पाकिस्तान) में पुरातात्विक खुदाई में मिली मानव खोपडिय़ों में दांतों में एक ही तरह के छिद्र के मौजूद होने से अनुमान लगाया गया है कि दंातों में ड्रिल करने के उपकरण होते थे और ड्रिलिंग पद्धति से दांतों का उपचार होता था। कार्बन डेटिंग पद्धति से इन मानव खोपडिय़ों के 5500 से 7000 साल पुराने होने का आकलन किया गया है। बलूचिस्तान के एक पुराने कब्रगाह से निकाले गए 300 नरकंकालों में से नौ खोपडिय़ों के दांतों में एक तरह के छेद पाए गए हैं और कब्रगाह से ऐसा औजार मिला है, जिसके एक सिरे पर लगे चकमक पत्थर के जरिये दांत, हड्डी, सीप, पत्थर आदि में छेद किया जाता था। अमेरिका, फ्रांस, इटली और मैक्सिको के शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष दिया है कि नरकंकाल और वहां से प्राप्त औजार सात हजार साल पुराने हैं।

नवपाषाण काल का आदमी (होमो या पूर्व-मानव) भी था परेशान
दंतक्षय की बीमारी अति प्रागैतिहासिक काल में भी थी। नवपाषाण काल की लाखों वर्ष पुरानी पाई गई पूर्व-मानव (आधुनिक होमो सैपियन से पहले की मानव प्रजाति) की खोपड़ी के दांतों में इसके प्रमाण मिल चुके हैं। जाहिर है कि नवपाषाण काल का आदमी (होमो या पूर्व-मानव) भी दंतक्षरण से परेशान था। नवपाषाण काल के आदमी में दांतों के क्षरण की वजह पौधों से प्राप्त वैसा भोजन था, जिसमें कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक थी। लाखों साल बाद पैदा हुई आदमी की होमो सैपियन (आधुनिक मानव) प्रजाति भी दंतक्षरण से परेशांहाल थी। दंत क्षरण के पुरातात्विक प्रमाण उस कालखंड में सबसे अधिक संख्या में पाए गए हैं, जिस कालखंड में दुनिया में चावल की खेती (सबसे पहले भारत सहित दक्षिण एशिया के देशों में) शुरू हुई। दरअसल पके हुए भोजन के अधिक प्रयोग के चलन से दंतक्षरण में वृद्धि हुई।

सुमेर सभ्यता के लोग भी थे दंतक्षरण के शिकार, रोम में होती थी चर्च में प्रार्थना
करीब 5000 साल पुरानी सुमेर सभ्यता की परंपरा में लिखी गई पुस्तक और मिस्र में ईसा से 1550 साल पहले लिखे गए ग्रंथ (द एबर्स पैपीरस) में दंतक्षरण का उल्लेख है। ईसा से 668 से 626 साल पहले मसूड़ों में सूजन होने से असीरिया के सर्गोनाइड राजवंश के एक राजा का दांत उखाडऩे का ऐतिहासिक जिक्र मिलता है। मिस्र, ग्रीक (रोम) की सभ्यता में दंतक्षरण से होने वाले दर्द का उपचार किया जाता था। उपचार में जड़ी-बूटियों के उपयोग के साथ जादू-टोना भी शामिल था। रोमन कैथलिक परंपरा में तो दांत की बीमारी दूर करने के लिए प्रार्थना की जाती थीं। संत एपोलॉनिया की प्रार्थना इसका उदाहरण है।
12वींसदी में नकार दिया गया कृमि से दंतक्षरण का ज्ञान, 20वींसदी में चिह्निïत हुए जीवाणु
मिस्र के प्रागैतिहासिक उल्लेख में दंतक्षरण का कारण कृमि (जीवाणु) माना गया। जबकिहजारों साल बाद 12-13वींसदी के अरबी दुनिया के सुप्रसिद्ध चिकित्सक गौबारी ने अपनी पुस्तक (बुक ऑफ एलाइट कन्सर्निंग द अनमास्किंग ऑफ मिस्ट्रीज एण्ड टीयरिंग ऑफ वेल्स) में जीवाणु से दंतक्षरण होने के विचार को खारिज कर दिया। तेरहवी सदी के बाद इस्लामिक दुनिया में दंत-कृमि होने के सिद्धांत को स्वीकार करना बंद कर दिया गया। तब जीवाणु को देखे जा सकने वाले माइक्रोस्कोप का आविष्कार नहींहुआ था। बाद में अरब देशों के प्रभाव में आकर यूरोपीय चिकित्सकों ने भी इसी धारणा को स्वीकार किया। यूरोप के पियरे फाचर्ड जैसे प्रसिद्ध चिकत्सक ने भी दंत-कृमि की अवधारणा स्वीकार नहींकी। पियरे रिचर्ड ने दांतों-मसूड़ों के लिए चीनी को हानिकारक बताया। तब पश्चिम के देशों में गन्ने की खेती और इसके इस्तेमाल बढ़ गया था। 19वी सदी (1890 के दशक) में चिकित्सक डब्ल्यूडी मिलर ने कीमोपैरासाइटिक सिद्धांत की स्थापना बहुत तार्किक तरीके और साक्ष्यों के आधार पर की, जिस सिद्धांत में माना गया कि मुंह में अम्ल बनाने वाले जीवाणु रहते हैं, जो कार्बोहाइड्रेट के कारण दांत की संरचना को क्षति पहुंचाते हैं। इसके बाद 1921 में चिकित्सा वैज्ञानिक फर्नेन्डो राड्रिग्ज वर्गेस ने मुंह के अनेक जीवाणुओं को चिह्निïत भी किया।

डेन्टल सर्जन डा. अभिषेक सिद्धार्थ :
युवा चिकित्सक डा. अभिषेक सिद्धार्थ  डेहरी-आन-सोन (रोहतास) में इंडेन के बिहार में एक अग्रणी रसोई गैस वितरक मोहिनी इंटरप्राइजेज के प्रबंध निदेशक और समाजसेवी उदय शंकर के पुत्र हैं। डा. सिद्धार्थ पटना (बिहार) में कार्यरत कंसलटेन्ट इंडोडोन्टिस एवं डेन्टल सर्जन हैं। इनकी पत्नी डा. सुप्रिया भारती डेन्टल सर्जन एवं ओरल पैथोलाजिस्ट हैं और डा.बीआर अंबेडकर डेन्टल कालेज, पटना में असिस्टेन्ट प्रोफेसर हैं। डेहरी-आन-सोन में संचालित विश्वस्तर के आधुनिक उपकरणों से लैस ब्राइट स्माइल डेन्टल क्लिनिक में दोनों चिकित्सक युगल सप्ताह में दो दिनों (मंगलवार और बुधवार) का सघन समय दे रहे हैं।

(विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विशेष रिपोर्ट : कृष्ण किसलय, तस्वीर : निशांत राज)

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