ईरान और अमेरिका के बीच समझौता हो चुका है। इस पर तीन दिन बाद जिनेवा में औपचारिक रूप से हस्ताक्षर होंगे। समझौते की जो शर्तें हैं, वे लगभग सभी ईरान के पक्ष में हैं। अमेरिका और खाड़ी देश मिलकर ईरान को 28 लाख करोड़ रुपये का मुआवजा देंगे। ईरान की सवा लाख करोड़ रुपये की जब्त संपत्ति उसे वापस की जाएगी। होर्मुज में अमेरिकी नाकेबंदी समाप्त होगी। ईरान को अपना तेल बेचने का पूर्ण अधिकार होगा।
निश्चित रूप से इस समझौते को जमीन पर उतारने में अभी अनेक दिक्कतें आएंगी। इजरायल इसे सफल न होने देने की जी-तोड़ कोशिश करेगा। उसके प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इस समझौते का हिस्सा नहीं है और वह लेबनान तथा यमन पर हमले जारी रखेगा। खाड़ी देश भी बेचैन होंगे और यह सब अमेरिकी शह पर होगा।
28 फरवरी से शुरू हुई जंग के शुरुआती दौर में ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करके अमेरिका और इजरायल को यह मुगालता हो गया था कि अब वे जंग जीत गए हैं, मगर यह रणनीति काम नहीं आई। ईरान की लंबे समय से चल रही तैयारी, मजबूत नेतृत्व और वहां की जनता ने मिलकर इन साढ़े तीन महीनों में डटकर इन देशों का मुकाबला किया और उन्हें घुटनों पर ला दिया। दुनिया की महाशक्ति अमेरिका और इजरायल जैसे शासन को झुकने पर मजबूर कर दिया। युद्ध से पहले ईरान की जो स्थिति थी, उससे अधिक मजबूत स्थिति में वह आज उभरा है। यद्यपि थोपे गए युद्ध के कारण उसे भारी तबाही भी झेलनी पड़ी, लेकिन समझौते ने भविष्य की दिशा तय कर दी है। संभावना है कि ईरान जल्दी ही मौजूदा संकट से काफी हद तक उबर जाएगा।
इसके मुकाबले हमारी सरकार का पिलपिला राष्ट्रवाद देखिए, जो अमेरिका के आगे सदैव नतमस्तक दिखाई देता है। पाकिस्तान के साथ युद्धविराम अमेरिका तय करता है और उसकी घोषणा भी वही करता है। ईरान और रूस से तेल खरीदें या नहीं, यह अमेरिका तय करता है। वेनेजुएला से भारत तेल खरीदे या नहीं, यह भी अमेरिका ही तय करता है। राष्ट्रीय स्वाभिमान जैसी चीज आज बची नहीं है। व्यापार समझौता भी उसकी शर्तों पर होता दिखाई देता है।
सोचिए, दुर्भाग्य से यदि ईरान जैसा संकट भारत के सामने आया होता तो क्या हमारा नेतृत्व उसे संभाल पाता? अब्दुल को ‘टाइट’ करने में जुटा नेतृत्व कभी देशवासियों के आत्मसम्मान की रक्षा नहीं कर सकता। खोखला राष्ट्रवाद, चंद पूंजीपतियों की गोद में बैठा राष्ट्रवाद, अमेरिका के आगे नतमस्तक राष्ट्रवाद और नफरत की बुनियाद पर टिका राष्ट्रवाद किसी भी क्षण देश को इतने गहरे संकट में फंसा सकता है कि उससे होने वाले नुकसान की भरपाई दशकों तक मुश्किल हो जाए। आज भी हम संकट में ही हैं। एक तरह का पागलपन आबादी के एक हिस्से पर तारी कर दिया गया है। पाकिस्तान और बांग्लादेश से आगे इस राष्ट्रवाद की नजर नहीं जाती। जो अपने ही देश की बड़ी आबादी का दुश्मन हो, उसे राष्ट्रवाद नहीं कहा जा सकता। यह विध्वंसवाद है और इसके जनक किसी भी सूरत में राष्ट्रवादी नहीं हैं। ये खिलौने हैं, जिनमें चाबी कोई और भर रहा है।
- विष्णु नागर, लेखक व वरिष्ठ पत्रकार





