नौकरी छोड़ असहाय बच्चों को पढ़ा रही पटना की दिलनशी / मानसिक रोग की पहचान और बचाव पर सासाराम में संगोष्ठी / तंत्रिका तंत्र डिसआर्डर पर दी गई जानकारी

पटना (सोनमाटी संवाददाता)। कहा गया है कि अगर खुशियां दूसरों के बीच बांटोगे तो जीवन में खुशी की कमी नहीं रहेगी। यह पंक्ति उन पर सटीक बैठती है जो अपनी नौकरी छोड़ असहाय बच्चों के जीवन को संवारने का काम कर रही है। खुद संघर्ष करके पढ़ाई की लेकिन अनाथ बच्चों के जीवन में शिक्षा के जरिए उजाला ला रही है। इस हस्ती का नाम दिलनशी परवीन है, जो की बिहार के पटना से संचालित प्रबोध समिति के कोषाध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं। दिलनशी दानापुर कैंट इलाके के 80 अनाथ बच्चों को निशुल्क शिक्षा दे रही हैं, जिसमें से 45 बच्चों को स्कूल में नामांकन करवाया गया है। दिलनशी परवीन को उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए कई मंचो ने सम्मानित किया है। हाल ही में इनको ऑल इंडिया एनजीओ एसोसिएशन अवार्ड से नवाजा गया है।  इनकी कई कहानी भी पत्र-पत्रिकाओं में  प्रकाशित हो चुकी है।
जो बच्चे कभी नहीं जाते थे स्कूल
दिलनशी परवीन बताती हैं कि हमारी संस्था में कुल 80 अनाथ तथा गरीब बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। अपने ही घर में इन बच्चों को 2 साल से शिक्षा दे रही हूं। इस वर्ष दो बच्चे मैट्रिक करने वाले हैं लेकिन बच्चों का नौवीं कक्षा में नामांकन करवाने में बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा। दोनों बच्चे कभी स्कूल नहीं जाते थे और इनके पिता इन्हें पढ़ाना नहीं चाहते थे।  जब मैं इनके घर पर जाती थी तो मुझे गंदी-गंदी गालियां देते थे इसके साथ ही दानापुर कैंट स्कूल में मैंने एक साथ 30 बच्चों का नामांकन करवाया यह सभी बच्चे कभी और स्कूल नहीं जाते थे। कक्षा 1 से 4 तक के बच्चों का तो नामांकन आसानी से हो गया लेकिन कक्षा 5 से लेकर आठवीं तक के बच्चों को टीसी चाहिए था। इसके बाद मैंने प्राइमरी एजुकेशन एक्ट पढ़ा, मुझे जानकारी मिली की जो बच्चा कभी स्कूल नहीं जाता है तो उस बच्चे का नामांकन बिना टीसी के हो सकता है। इसके बाद स्कूल प्रिंसिपल से बात करके बढ़ा बच्चों का नामांकन करवाई। जब मैं आठवीं कक्षा में थी तब से मैंने गरीब बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। बेसिक अंक एवं अक्षर ज्ञान से शुरुआत की। गरीबी के कारण इन बच्चों के माता-पिता भी इन्हें न तो पढ़ा सकते थे न ही इनके लिए कॉपी-किताब की व्यवस्था कर सकते थे।
आर्थिक तंगी के कारण छोड़ी पढ़ाई
दिलनशी परवीन बताती है कि मैं अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी क्योंकि मेरे पास पढ़ने को पैसे नहीं थे। इसके बाद मैंने पल्स पोलियो अभियान में 50 रुपये रोजगारी पर काम करना शुरू की जिसे मेरे जरूरत पूरी होती थी। बाद में मैं सुपरवाइजर बनी तो मुझे 1200 रुपए मानदेय मिलने लगा और फिर मैंने उसी पैसे से बच्चों के लिए कॉपी-किताब की व्यवस्था करने लगी। इंटर के पढ़ाई के बाद मैंने एक आईटी कंपनी में डाटा एंट्री ऑपरेटर का काम करना शुरू की। इस काम से महीने में 4000 रुपए मिलते थे, जिससे मैंने परिवार के साथ ही बच्चों को पढ़ाना शुरू की। ऑफिस में काम के बाद घर पर बच्चों को शाम में 7 बजे से देर रात तक पढ़ाती थी। ऑफिस में चंदन कश्यप हर संभव मदद तथा हौसला अफजाई करते थे।
तलकशुदा महिलाओं और वृद्धजनों के लिए हो एक घर
दिलनशी परवीन बताती है– मैं प्रबोध समिति संस्था से कोषाध्यक्ष के रूप में जुड़ी। अभी हमारी टीम में 9 लोग है और इन सभी लोगों ने मुझे बहुत ज्यादा हिम्मत दी। अब मैंने जॉब छोड़ अनाथ बच्चों को नियमित रूप से पढ़ाना शुरू किया है। अभी 80 बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दे रही हूं। संस्था और निजी खर्च चलाने के लिए डाटा एंट्री का काम घर से ही करती हूं। मेरा सपना है कि अनाथ बच्चों के साथ ही तलकशुदा महिलाओं और वृद्धजनों के लिए एक घर बने, जहाँ पर सब एक साथ रहे।
 (रिपोर्ट, तस्वीर : संजीव कुमार सिंह)

मानसिक रोग की पहचान और बचाव पर संगोष्ठी

सासाराम (रोहतास)-सोनमाटी संवाददाता। सदर अस्पताल के जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम इकाई द्वारा संतपाल स्कूल के उमा आडिटोरियम में मानसिक रोग की पहचान और बचाव पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें विद्यालय के शिक्षक-शिक्षिकाओं ने भाग लेकर मानसिक रोग से संबंधित कई पहलुओं पर जानकारी प्राप्त की। सदर अस्पताल के नैदानिक मनोविज्ञान के डा. विप्लव कुमार सिंह और साइकियाट्रिक सहायक के. महेश्वरन ने मानसिक रोग के लक्षण और बचाव के साथ उपचार पर चर्चा की। विशेषज्ञों ने बताया कि अत्यधिक आत्मग्लानी या आत्महत्या का भाव, ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में कमी, अत्यधिक भय-चिन्ता, अपराध भावना महसूस करना, नींद की समस्या, भ्रम-तनाव, हिंसक व्यहार, नशीली दवा का सेवन, अत्यधिक क्रोध, जिस्मानी दर्द मनरोग से जुड़ा कारण हो सकते हैं। छोटे बच्चों में पाये जाने वाले मनोरोग डिप्रेशन, माइनिया, डिमेंसिया, आटिज्म, पर भी चर्चा हुई। सेमिनार में विद्यालय के शिक्षक-शिक्षिकाओं आरजी तिवारी, एस. लाल, राजीव कुमार, एमके तिवारी, आरबी सिंह, संतोष कुमार सिन्हा, एसपी सिंह, जीए खान, एस इमाम, धीरज तिवारी, सुमिता आईंच, सीबी द्विवेदी, रेनू पांडेय, शुभम प्रिया, विनीता श्रीवास्तव, लवली श्रीवास्तव, साजिया अंसारी, रश्मि श्रीवास्तव आदि ने भाग लिया।
(रिपोर्ट, तस्वीर : अर्जुन कुमार, मीडिया प्रभारी, संतपाल स्कूल)

तंत्रिका तंत्र डिसआर्डर पर दी गई जानकारी

डेहरी-आन-सोन (रोहतास)-कार्यालय प्रतिनिधि। जमुहार स्थित नारायण मेडिकल कालेज एंड हास्पिटल (एनएमसीएच) में न्यूरोलाजी विभाग द्वारा तंत्रिका तंत्र नियंत्रण, परिवर्तन और उपचार पर फार्मास्युटिकल कंपनी जुवेन्ट्स लिमिटेड के सहयोग से गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें विशेषज्ञ वक्ताओं ने न्यूरोलाजिकल डिआर्डर पर मौजूदा अनुसंधान और निष्कर्ष के बारे में जानकारी दी और बताया कि तनाव भरे जीवन में तंत्रिका तंत्र दबाव बढऩे से दुष्प्रभाव भी बढ़ जाता है। तंत्रिका तंत्र में गड़बड़ी होने पर कई तरह की शारीरिक परेशानी शुरू हो जाती है। गोष्ठी को गोपालनारायण सिंह विश्वविद्यालय के कुलपति डा. एमएल वर्मा, नारायण चिकित्सा महाविद्यालय के प्राचार्य डा. एसएन सिन्हा ने भी संबोधित किया।
(रिपोर्ट, तस्वीर : भूपेंद्रनारायण सिंह, पीआरओ, एनएमसीएच)

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