(प्रसंगवश/कृष्ण किसलय) सभ्यता-यात्रा : अंडमान से सरस्वती-सिंधु भाया सोन-घाटी !

-0 प्रसंगवश 0-
सभ्यता-यात्रा : अंडमान से सरस्वती-सिंधु भाया सोन-घाटी!
-कृष्ण किसलय (संपादक, सोनमाटी)

ईसा-पूर्व रोमन दार्शनिक-राजनीतिक मार्कस टुलियस सिसरो ने कहा था कि इतिहास समय का साक्षी है, जो वास्तविकता को रौशन करता, प्राचीन को बताकर स्मृति को ताजा बनाता और वर्तमान का मार्गदर्शन करता है। दूसरे देशों में ईसा-पूर्व से ही इतिहास लेखन गंभीर कार्य रहा है। भारत में सही मायने में इतिहास लेखन का साक्ष्य 12वीं सदी के महाकवि कल्हण की राजतरंगिणी से मिलता है, जो कश्मीर के राजाओं पर केंद्रित है। इससे पहले भारतभूमि पर महमूद गजनवी के साथ आए अलबरूनी के शब्दों में उस समय की बात दर्ज है। इतिहास लेखन मुगलकाल में हुआ, मगर ज्यादातर इतिहासकार दरबारी थे। इसके बाद अंगे्रजी राज में औपनिवेशिक दृष्टि वाले थे। आजादी के बाद ही भारतीय इतिहास को क्रमबद्ध करने का जज्बा जगा।
इतिहास ही बताता है कि आदमी का उत्तरोत्तर विकास कैसे हुआ? वह सभ्यता-संस्कृति, बोली-भाषा-लिपि, जीवनशैली, ज्ञान-विज्ञान के किन चरणों से गुजर कर आज के युग तक पहुंचा? व्यक्ति, समाज या देश के लिए धरोहर और पुरातत्व इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि उनसे पता चलता है, हम कौन हैं, किसके वंशज हैं, कहां से आए हैं? नई सदी की जानकारियां भारतीय इतिहास के कालखंड को कई हजार साल पीछे ले जा चुकी हैं। हजारों सालों के अंतर की सटीक संगति बैठाना आज की जरूरत और भविष्य की उपयोगिता है। सोन-घाटी दुनिया में वह स्थान है, जहां के चुरहट की खोज से जीवविज्ञान में बहुकोशीय जीवन के शुरू होने के कालखंड की स्थापित धारणा को चुनौती मिल चुकी है। इस खोज से बहुकोशीय जीवाश्म का पुराइतिहास 50 करोड़ साल पीछे जा चुका है।
पर्यावरण और डीएनए के नए वैज्ञानिक अनुसंधान के निष्कर्ष बता रहे हैं कि एशिया में आदमी की विकास-यात्रा अंडमान से शुरू होती है और 20-30 हजार सालों में दक्षिण भारत होकर सोन-घाटी में हजारों सालों और फिर राखीगढ़ी, सरस्वती-सिंधु घाटी में भी हजारों सालों तक ठहर कर ईरान, इराक, मिस्र पहुंचती है। फिर सभ्यता-धारा 4-5 हजार साल पहले वापस भारतभूमि पर लौटती भी है। पुरातात्विक खोज, भाषा अध्ययन और उत्खनन तो पहले से मानव सभ्यता के इस क्रमिक विकास के अध्ययन में मदद करते रहे हैं।
बिंध्य-कैमूर पर्वतश्रृंखला भारत के मध्य भाग में है, जिसकी उपत्यका में सोन नद बहता है। इसके पार दक्षिण में सागरतट तक प्राचीनकाल का जंबूद्वीप, उत्तर में हिमालय की तलहटी तक आर्यावर्त और हिमालय पार सुदूर उत्तर-पश्चिम में असीरिया, बेबीलोन, सुमेर यानी आज के ईरान, इराक तक भारतीय संस्कृति की सत्ता स्थापित थी, जिसका एक सिरा दक्षिण भारत, श्रीलंका, अंडमान तो दूसरा सिरा सिंधु घाटी से जुड़ा रहा। बिंध्य-कैमूर के पूरबी छोर पर सोन नद तट का सबसे बड़ा शहर डेहरी-आन-सोन प्राचीनकाल का देहरीघाट है, जहां एनिकट में विश्वविश्रुत सोननहर प्रणाली बनी। देहरी का सामान्य अर्थ दरवाजा है, पर सिंधी भाषा में अर्थ है देश। देहरी घाट कोलकाता से हरियाणा, पंजाब, पेशावर, सिंध तक जाने वाले एशिया के सबसे लंबे (2500 किमी) सड़क मार्ग पर है। जम्बूद्वीप (दक्षिणापथ) और आर्यावर्त (उत्तरापथ) में ताम्र लिप्ति, गंगासागर से कैलाश-मानसरोवर के आने-जाने का अति प्राचीन मार्ग सोन की घाटी से ही गुजरता था। लिंग पूजक नागवंशी जनजातियों का झारखंडी मंदिर देहरीघाट में है तो हिमालय तलहटी के निकट में नगीना (उत्तर प्रदेश) में भी शिवलिंग वाला झारखंडी मंदिर है। झारखंडी नागवंशी मुंडारी-संथाली का शब्द जाहेर खोंडी है। डेहरी-आन-सोन से 60 कि.मी. दक्षिण बांदू में सोन की धारा में डूबा रक्ष-संस्कृति के संस्थापक रावण की सांस्कृतिक परंपरा का दसशीशानाथ मंदिर भी है। इस तरह सोन-घाटी भारत की सभ्यता-यात्रा का गर्भनाल है। इसकी राह पर आज नहीं तो कल देश-दुनिया के बड़े इतिहासकारों-पुरावेत्ताओं को गुजरना पड़ेगा, क्योंकि इसके गर्भ में हड़प्पा-पूर्व की प्रसव-कथा जमींदोज है।

संपर्क : सोनमाटी-प्रेस गली, जोड़ा मंदिर, न्यू एरिया, डालमियानगर-821305, जिला रोहतास (बिहार) फोन 9523154607, 9708778136

इतिहास जो लिखा जा रहा… (लेखक कृष्ण किसलय) : इस बार ‘सोनमाटी’ का अंक विशेष (प्रिंट) ‘आदमी की आदिभूमि भारत की सोनघाटी‘ पर केेंद्रित है, जो अपने विषय-वस्तु की एक पूर्वपीठिका है।

तस्वीर : इस स्तंभ (प्रसंगवश) की टिप्पणी के साथ दी गई तस्वीर विश्वविश्रुत सोन नहर प्रणाली के आरंभिक निर्माण (करीब डेढ़ सदी पूर्व) की है, जिसमें 19वीं-20वीं सदी में कोई पांच हजार जलपोत (भापचालित स्टीमर) चलते थे।

Share
  • Related Posts

    केंद्रीय हिंदी निदेशालय की व्याख्यानमाला के लिए डॉ. सुशील उपाध्याय चयनित, महाराष्ट्र में देंगे व्याख्यान

    देहरादून/हरिद्वार (उत्तराखंड)। चमन लाल स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य एवं शिक्षाविद् डॉ. सुशील उपाध्याय का चयन भारत सरकार के केंद्रीय हिंदी निदेशालय की प्रतिष्ठित ‘प्राध्यापक व्याख्यानमाला’ योजना के लिए किया गया…

    Share

    राजभाषा नीति के उत्कृष्ट क्रियान्वयन पर आईसीएआर-पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना को नराकास का विशेष पुरस्कार

    पटना। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना को भारत सरकार की राजभाषा नीति के उत्कृष्ट क्रियान्वयन के लिए नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति (केंद्रीय कार्यालय), पटना (नराकास)…

    Share

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

    You Missed

    केंद्रीय हिंदी निदेशालय की व्याख्यानमाला के लिए डॉ. सुशील उपाध्याय चयनित, महाराष्ट्र में देंगे व्याख्यान

    केंद्रीय हिंदी निदेशालय की व्याख्यानमाला के लिए डॉ. सुशील उपाध्याय चयनित, महाराष्ट्र में देंगे व्याख्यान

    राजभाषा नीति के उत्कृष्ट क्रियान्वयन पर आईसीएआर-पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना को नराकास का विशेष पुरस्कार

    राजभाषा नीति के उत्कृष्ट क्रियान्वयन पर आईसीएआर-पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना को नराकास का विशेष पुरस्कार

    जीएनएसयू और एनएमसीएच को तीन अंतरराष्ट्रीय आईएसओ प्रमाणपत्र, गुणवत्ता प्रबंधन में मिली बड़ी पहचान

    जीएनएसयू और एनएमसीएच को तीन अंतरराष्ट्रीय आईएसओ प्रमाणपत्र, गुणवत्ता प्रबंधन में मिली बड़ी पहचान

    जवाहर नवोदय विद्यालय कक्षा 6 प्रवेश के लिए आवेदन शुरू, 28 नवंबर को होगी चयन परीक्षा

    बीड़ी श्रमिकों के बच्चों की छात्रवृत्ति के लिए बिहार में जागरूकता शिविर, आवेदन में मिली सहायता

    बीड़ी श्रमिकों के बच्चों की छात्रवृत्ति के लिए बिहार में जागरूकता शिविर, आवेदन में मिली सहायता

    आईसीएआर पटना में 22वीं अनुसंधान सलाहकार समिति की बैठक शुरू, जलवायु-स्मार्ट कृषि पर जोर

    आईसीएआर पटना में 22वीं अनुसंधान सलाहकार समिति की बैठक शुरू, जलवायु-स्मार्ट कृषि पर जोर