सत्तर सालों में क्या बन पाया मुकम्मल गणतंत्र ?

हमारा संविधान धर्मनिरपेक्ष होने की बात पर जोर देता है और ऐसे समाज के निर्माण की बात करता हैं, जिसमें सभी समान हों, सबको अपना हक मिले। मगर समाज कभी धर्म तो कभी जाति के नाम पर दंगों में जलता-सुलगता रहता है। सात दशकों बाद आज भी बहुत बड़ी संख्या में देश के फुटपाथों पर समाज का आखिरी आदमी खुले आसमान के नीचे अपना जीवन बीता रहा है और भूखा सोता है। देश में अपराध, भष्टाचार, हिंसा, आंतकवाद की घटनाएं घटते जाने के बजाय लगातार बढ़ती जा रही हैं। इनसे पार पाने, लडऩे की हमारी कोशिशें नाकाम होती रही हैं। जाहिर है कि हम कामयाबी से बहुत दूर हैं और हमारे सिस्टम में लगातार सुधार की जरूरत हैं। इस पर हम सबको सोचना हैं।

लेखक : निशान्त कुमार
(प्रबंध संपादक, सोनमाटी मीडिया समूह)

भारत हर साल 26 जनवरी को अपना गणतंत्र दिवस उत्सवपूर्वक मनाता है। इसी दिन वर्ष 1950 में हमारे देश का संविधान लागू हुआ था। 69 गणतंत्र वर्ष पूरा कर यह देश गणतंत्रता के 70वें साल में प्रवेश कर चुका है। संविधान को अंगीकार करने का अर्थ यही है कि देश का शासन कैसा होगा, उसकी सरकार कैसी होगी और देश के भविष्य का निर्माण किस तरह होगा? हमारे संविधान का उद्देश्य है, एक ऐसा लोकतांत्रिक शासन, जिसे जनता चुने और जनता का शासन हो। गणतंत्र का मतलब ही है गण यानी जनता की, जनता द्वारा नियंत्रित तंत्र यानी प्रणाली, अर्थात आम आदमी का सिस्टम। हमारा संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान हैं। हमारे संविधान में देश के हर एक व्यक्ति, हर नागरिक को यह अधिकार दिया गया है कि वह पूरी आजादी के साथ अपनी जिंदगी जी सके। हमारे गणतंत्र में देश के नेतृत्व के लिए बतौर राजनेता अपना जन प्रतिनिधि चुनने का अधिकार सिर्फ जनता के पास है। कोई देश गणतांत्रिक देश इसलिए है कि शासन तंत्र के सर्वोच्च पद पर आम जनता में से कोई पदासीन हो सकता हैं, जो राजतंत्र की तरह वंशानुगत नहीं है। गणतंत्र में जनता द्वारा चुना हुआ प्रतिनिधि ही सर्वोच्च पद पर आसीन होता है और जनता के सुख-दुख को समझते हुए देश की कमान संभालता है

आज समाज में हर तरफ से गायब है गणतंत्र का सही मतलब
हम अपनी गणतंत्रता के 69 वर्ष पूरे कर 70वें वर्ष के नए युग में प्रवेश कर चुके हैं। इसके बावजूद दुखद यह है कि समाज के हर तरफ से गणतंत्र का सही मतलब गायब दिखाई पड़ता है। हमारे सामने सुरसा की तरह साल-दर-दर विकराल होता यह प्रश्न खड़ा है कि क्या वास्तव में तंत्र और गण के बीच फलदायक रिश्ता बन पाया है? स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ढाई सालों मेें सघन मंथन कर जिस उद्देश्य से भारत को गणतंत्र-राष्ट्र घोषित किया गया और गुलामी से मुक्त लिखित संविधान लागू किया गया, क्या वह उद्देश्य हासिल हो पाया है? प्रश्न यह भी है, क्या वास्तव में गण-समूह के व्यापक हित का फैसला लिया जा रहा हैं? क्या अधिकार होते हुए भी आम आदमी अपना जीवन आजादी और वाजिब हिस्सेदारी के साथ जी रहा है? अनेक सवाल हैं। गणतंत्रता दिवस ऐसे ही सवालों पर विमर्श का दिन हैं,उत्सव का नहीं।
चुनाव जीतने के बाद दीमक लग जाते हैं राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों में
यह हकीकत है और इससे हम सब भी अब वाकिफ हो चुके हैं कि सता पाने की लालच में जनप्रतिनिधियों ने लोगों को धर्म और जाति के मकडज़ाल में उलझा रखा है। सत्ता पाने के लिए चुनाव के समय पार्टियां जैसे घोषणपत्र का निर्माण करती हैं, उसमें भोली-भाली जनता के लिए लोक लुभावने वादे और ख्वाब होते हैं। चुनाव जीतने के बाद तो घोषणपत्र में दीमक लग जाते हैं। राजनेता साम-दाम, दंड-भेद हर विधि से देश के प्रमुख और सर्वोच्च पदों पर अपना कब्जा जमाकर बैठ जाते हैं। सता में बैठे राजनेताओं और नौकरशाहों से साठगांठ कर औद्योगिक-कारोबारी घराने देश के संसाधनों का मनमाना दोहन करते हैं। इसी सांठगांठ के कारण आज शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी तक बिकने लगा है। तंत्र की आड़ में संगठित लोगों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों की लूट मची हुई है और आम जनता को लाभ से वंचित कर उसे हाशिये पर रख दिया गया है। संसाधनों से स्थानीय निवासियों का स्वामीत्व धीरे-धीरे खत्म हो चुका है। उनके अधिकार गिरवी रख लिए गए हैं। नेताओं ने निज-तंत्र मजबूत कर लिया है और बेहद किलाबंद संगठन बना लिया है।

कामयाबी से बहुत दूर हैं हम, दरकार है सिस्टम में बदलाव की
हमारा संविधान धर्मनिरपेक्ष होने की बात पर जोर देता है और ऐसे समाज के निर्माण की बात करता हैं, जिसमें सभी समान हों, सबको अपना हक मिले। मगर समाज कभी धर्म तो कभी जाति के नाम पर दंगों में जलता-सुलगता रहता है। सत्ता उसी को मिलती रही है, जो गरीबी की बात करता रहा है। भूखी जनता का पेट भरने, रहने के लिए हरेक को घर देने की बात करता रहा है और नारा देता रहा है। जबकि सात दशकों बाद आज भी बहुत बड़ी संख्या में देश के फुटपाथों पर समाज का आखिरी आदमी खुले आसमान के नीचे अपना जीवन बीता रहा है और भूखा सोता है। देश में अपराध,भष्टाचार, हिंसा, आंतकवाद की घटनाएं घटते जाने के बजाय लगातार बढ़ती जा रही हैं। इनसे पार पाने, लडऩे की हमारी कोशिशें नाकाम होती रही हैं। जाहिर है कि हम कामयाबी से बहुत दूर हैं और हमारे सिस्टम में लगातार सुधार की जरूरत हैं। गरीब, लाचार, वंचितों के बारे में ईमानदारी से सोचने और पक्के तौर पर करने की जरूरत है। जाति से उपर उठकर देशहित की सोचने की जरूरत है। भारत में गणतंत्र तभी सही अर्थ में स्थापित हो पाएगा, जब हर नागरिक अपना कर्तव्य ईमानदारी और स्वैच्छिक भागीदारी के साथ पूरा करे। जनता के सेवक, सरकारें और नौकरशाह, उद्योगपति जनता के बारे में भी सोचें। तभी वैसा गणतंत्र इस देश में स्थापित हो सकेगा, जिसकी कल्पना इस देश के महापुरुषों ने, आजादी के दीवानों ने, मातृभूमि के लिए शहादत देने वालों ने की थी। सही मायने में ऐसा हो सकेगा, तभी हम गर्व से कह सकते हैं कि हम गणतंत्र भारत मेें रहते हैं। गांधीजी हमारे बीच नहीं हैं, पर वह एक गणतंत्र देश को हम सबको सौंप गए। महात्मा गांधी ने कहा था, मैं ऐसे संविधान के लिए प्रयत्न करूंगा, जिसमें छोटे से छोटे व्यक्ति को यह अहसास हो कि यह देश उसका है, इसके निर्माण में उसका योगदान है और उसकी आवज का महत्व हैं। ऐसे संविधान के लिए प्रयत्न करूंगा, जहां ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं होगा, जहां स्त्री-पुरुष के बीच समानता होगी और इसमें नशे जैसी बुराई के लिए कोई जगह नहीं होगी। मगर ऐसा हो सका क्या? इस पर हम सबको सोचना है।

(तस्वीरें : अमरनाथ शर्मा, पटना)

 

लेखक :

निशान्त राज   9955622367

(प्रबंध संपादक, सोनमाटी मीडिया समूह)

 

 

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