
कुमार बिंदु की कविता : दक्खिन
मैं विंध्य पर्वत की गोद में बैठा हूं
मैं इसकी गोद में खेलता- कूदता रहा हूं
अब मैं इसके कंधे पर बैठना चाहता हूं
जैसे बचपन में पिता के कंधे पर बैठा करता था
सकरात का मेला देखने के लिए
मेले में सजी दुकानों को निहारने के लिए
मैं अब विंध्य पर्वत के कंधे पर बैठना चाहता हूं
विहंगम दृष्टि से देखना चाहता हूं
बदलती हुई यह दुनिया
यह विशाल मानव संसार
मगर जब- जब विंध्य के कंधे पर
चढ़ने की कोशिश करता हूं
कुछ देर में ही हाँफने लगता हूं
थक- हारकर बैठ जाता हूं
उसी की गोद में लेट जाता हूं
हालांकि मुझे अपने कंधे पर बिठाने के लिए
झुका हुआ है विशाल विंध्य
जैसे झुक जाते थे मेरे पिता
मुझे अपने कंधे पर बिठाने के लिए
मेरे बूढ़े दादा बताते हैं
देवताओं के अनुरोध पर
विंध्य के कंधे पर चढ़कर
अगस्त्य ऋषि गए थे उत्तर से दक्षिण
फिर कभी लौटकर नहीं आए
अपनी मातृभूमि बनारस
इसीलिए मेरे बच्चे !
तुम कभी मत मानना देवताओं की बात
तुम कभी मत जाना दक्खिन की ओर
तुम कभी मत बनना दक्षिणपंथी
संपर्क : डेहरी ऑन सोन, रोहतास, बिहार 09939388474
इसे भी पढ़े : 👉🏻कुमार बिंदु की दो कविताएं
इसे भी पढ़े : 👉🏻बाल दिवस के अवसर पर बाल कविताएं
इसे भी पढ़े : 👉🏻लक्ष्मीकांत मुकुल की अरुणाचल यात्रा पर कविताएँ
इसे भी पढ़े : 👉🏻दो कवयित्रियों की कविता
इसे भी पढ़े : 👉🏻कुमार बिंदु की कविता : जादूगरनी रात और जादुई सपने





