प्रगतिशील लेखक संघ का उदय: 1936 लखनऊ अधिवेशन से साहित्यिक क्रांति की शुरुआत

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में भारत में एक ऐसे साहित्यिक आंदोलन की नींव पड़ी जिसने लेखन को समाज परिवर्तन का माध्यम बना दिया। यह आंदोलन था प्रगतिशील लेखक संघ, जिसने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समानता की वकालत करते हुए कुरीतियों, अन्याय और पिछड़ेपन के खिलाफ आवाज उठाई।इस आंदोलन के प्रमुख सूत्रधार सज्जाद ज़हीर थे, जो 1935 के अंत में लंदन से शिक्षा पूरी कर भारत लौटे। उन्होंने देशभर के साहित्यकारों—प्रेमचंद, अहमद अली, रशीद जहाँ और अन्य प्रमुख बुद्धिजीवियों—को जोड़कर एक संगठित साहित्यिक मंच तैयार किया।

प्रगतिशील लेखक संघ का उद्देश्य भारतीय संस्कृति के मानवीय और यथार्थवादी तत्वों को अपनाना था, जबकि अंधविश्वास, धार्मिक संकीर्णता, साम्राज्यवाद और जागीरदारी जैसी प्रवृत्तियों का विरोध करना इसका मूल लक्ष्य था। यह आंदोलन साहित्य को जनसाधारण के जीवन से जोड़ने और उसे सामाजिक परिवर्तन का हथियार बनाने के पक्ष में था।

9-10 अप्रैल 1936 को लखनऊ में संघ का पहला अधिवेशन आयोजित हुआ, जिसकी अध्यक्षता प्रेमचंद ने की। इस अधिवेशन में जैनेन्द्र कुमार, रघुपति सहाय फिराक, हसरत मोहानी सहित कई प्रमुख साहित्यकार शामिल हुए।अध्यक्षीय भाषण में प्रेमचंद ने साहित्य को समाज का दर्पण बताते हुए उसे जनसामान्य के जीवन संघर्षों से जोड़ने पर बल दिया। वहीं हसरत मोहानी ने साम्यवाद की खुलकर वकालत करते हुए साहित्य को मजदूरों, किसानों और पीड़ित वर्ग का समर्थक बनाने का आह्वान किया।

इस अधिवेशन के बाद प्रलेस की शाखाएँ तेजी से पूरे देश में फैल गईं। अलीगढ़, इलाहाबाद, मुंबई, कलकत्ता और अन्य शहरों में साहित्यकारों ने इस आंदोलन को मजबूत किया। संगठन का संविधान बनाया गया और सज्जाद ज़हीर को इसका प्रमुख (प्रधान मंत्री) चुना गया। यह आंदोलन आगे चलकर भारतीय साहित्य में यथार्थवाद, सामाजिक चेतना और क्रांतिकारी विचारधारा का प्रमुख आधार बना।

  • कुमार बिंदु

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