“धरती की पुकार : प्रकृति संग उज्ज्वल कल की ओर” — डॉ. आशुतोष उपाध्याय

“विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर प्रस्तुत है डॉ. आशुतोष उपाध्याय की पर्यावरण कविता — ‘धरती की पुकार : प्रकृति संग उज्ज्वल कल की ओर।’”

(1) पाँच जून दो हज़ार छब्बीस को, सुनो चेतना की पुकारबढ़ते तापमान घटते जलस्तर ने, मचाया है हाहाकार ‘जलवायु और उज्ज्वल भविष्य’ पर, आओ करें विचार ‘प्रकृति से ही प्रेरित’ होकर, जीवन को दें सुदृढ़ आधार

(2) हर सूनी माटी पुकारती, एक पौधा तुम आज लगाओहरी चुनरिया ओढ़े धरती, इस प्यारी धरा को बचाओसाँसें होंगी शुद्ध यहाँ, जब हर आँगन में पेड़ हँसेगावृक्ष की शीतल छाया में, हमारा कल सुरक्षित रहेगा

(3) धुआँ उगलती दुनिया में, संयम का एक दीप जलाओकम करके कार्बन फुटप्रिंट, पर्यावरण का मान बढ़ाओकम करो कचरा धरा पर, व सीमित गाड़ियाँ चलाओ कम करो विलासिता, एवं अनावश्यक उपभोग घटाओ

(4) जाग उठा है मन अगर, तो सोए हुओं को तुम जगाओ पर्यावरण के संरक्षण में, है सबकी भूमिका यह बताओ पहले खुद समझो संकट को, फिर सबको मार्ग दिखाओ ज्ञान का यह पावन प्रकाश, जन-जन के भीतर फैलाओ

(5) टूट रहीं जो कड़ियाँ प्रकृति की, उनको फिर से जोड़ना होगा ईको सिस्टम रिस्टोरेशन को, अब जन-आंदोलन होना होगा नदियाँ, जंगल व जीव-जंतु को, धरा का गहना कहना होगाधरा को सौंपकर इसका वैभव, इनका हक इन्हें देना होगा

(6) बाज़ारवाद की अंधी दौड़ में, सस्टेनेबल राह चुनना होगाप्लास्टिक को कह अलविदा, प्रकृति की चूनर बुनना होगाखरीदें इको-फ्रेंडली सामान्, नहीं तो धरा को नुकसान होगाछोटे-छोटे इन्ही विकल्पों से, इस सृष्टि का कल्याण होगा

(7) चलो लौटें हम जड़ों की ओर, कुदरत के नुस्खे अपनायें नेचर-बेस्ड सॉल्यूशंस से, हम बिगड़े मौसम को बहलायेंनहीं बदलना सम्भव प्रकृति को, हम स्वयं बदल जायेंएक से अधिक विकल्प अपनाकर, ज्यादा लाभ कमायें

(8) वनीकरण-पुनर्वनीकरण से, जंगलों को फिर आबाद करेंमैंग्रोव और आर्द्र भूमि का, हम मिलकर उद्धार करेंजैविक व आई एन एम खेती से, मिट्टी में शक्ति भरेंकृषि वानिकी को अपनाकर, हम खेतों को समृद्ध करें

(9) शहरी हरियाली, हरी-भरी छतों से, कंक्रीट के जंगल महकाना हैग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर व वॉटरशेड द्वारा, जल के स्रोत चहकाना हैकोरल रीफ और सागर की, इस अद्भुत दुनिया को बचाना हैप्रकृति के अचूक उपायों से ही, हमें धरती को स्वर्ग बनाना है______

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