करोड़ों के लिए कौड़ियों की लड़ाई

  • चितरंजन भारती

अभी मीडिया बनाम कोचिंग विवाद थमा भी नहीं था कि पटना में कोचिंग संस्थानों का आपसी द्वंद्व सामने आ गया। यह वही पटना है, जिसे लंबे समय तक कोचिंग का बड़ा केंद्र माना जाता रहा है। एक समय यहाँ इंजीनियरिंग और मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी के लिए देशभर से छात्र आते थे। लेकिन जब नामांकन और डिग्रियाँ अपेक्षाकृत आसान होने लगीं, तब लोगों का मोहभंग हुआ और धीरे-धीरे उनका रुख कोटा और दिल्ली जैसे बड़े कोचिंग केंद्रों की ओर हो गया।

इसके बावजूद बिहार में छोटे पदों—जैसे शिक्षक, सिपाही, स्टाफ चयन आयोग आदि—की नौकरियों की संभावनाएँ बनी रहीं। हाल के वर्षों में बड़े पैमाने पर भर्तियाँ हुईं, तो अभ्यर्थियों की भीड़ फिर पटना की ओर उमड़ पड़ी। कोचिंग संचालकों ने इसमें संभावनाएँ देखीं और अपनी पूरी ऊर्जा इसी क्षेत्र में लगा दी। परिणामस्वरूप उन्हें बड़ी सफलता भी मिली।

इस कोचिंग संस्कृति का असर यह हुआ कि गाँव-देहात के अनेक छात्र किसी भी स्कूल-कॉलेज में नामांकन लेकर पटना आ बसे। पढ़ाई के नाम पर मूल पुस्तकों से दूरी बढ़ती गई और गाइड-कुंजियों का चलन तेज हुआ। विडंबना यह है कि पचास रुपये की मूल पुस्तक महँगी लगती है, लेकिन पाँच सौ रुपये की गाइड सस्ती प्रतीत होती है। इससे प्रकाशकों और कोचिंग उद्योग, दोनों का बाजार मजबूत हुआ।

अब सवाल यह नहीं रह गया कि कौन कितना पढ़ रहा है या कौन कितना पढ़ा रहा है; असली चिंता सफलता की है। सफलता का पैमाना केवल परिणाम बन गया है। जैसे ही बड़ी भर्तियाँ निकलती हैं, कोचिंग संस्थान दावा ठोकने लगते हैं कि सफल अभ्यर्थियों में सबसे अधिक उनके छात्र हैं। दिलचस्प यह कि कई सफल छात्रों के नाम अलग-अलग संस्थानों की सूची में एक साथ मिल जाते हैं। विवाद यहीं से शुरू होता है।

अभ्यर्थी भी कम चतुर नहीं हैं। वे जहाँ से अधिक लाभ या उपहार मिल सके, वहाँ अपना नाम जोड़ने में संकोच नहीं करते। यही प्रवृत्ति पहले इंजीनियरिंग कोचिंग में भी देखी गई थी, जब आईआईटी या एनआईटी में चयनित छात्रों को मोबाइल, लैपटॉप और अन्य उपहार देकर प्रचार का माध्यम बनाया जाता था। लेकिन धीरे-धीरे उस चमक का असर कम हुआ और पटना का इंजीनियरिंग कोचिंग बाजार मंदा पड़ गया।

छोटी नौकरियों की तैयारी का बाजार अब भी जीवित है। मैट्रिक और इंटर स्तर की परीक्षाओं के लिए लाखों छात्र गाँवों और छोटे कस्बों से पटना आते हैं। अभिभावक अपनी सीमित आय से उनके रहने और पढ़ाई का खर्च उठाते हैं। पटना में एक छात्र का औसत मासिक खर्च लगभग दस हजार रुपये है। लाखों छात्रों के हिसाब से यह रकम करोड़ों में पहुँचती है। इसी से पटना में एक समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी हो गई है—हॉस्टल, लॉज, भोजनालय, पुस्तक दुकानें और कोचिंग संस्थान, सब इसी पर टिके हैं।

यही अर्थव्यवस्था आज वर्चस्व की लड़ाई का कारण बन रही है। हाल में खान कोचिंग और ज्ञान बिंदु कोचिंग के बीच विवाद इसी प्रतिस्पर्धा का परिणाम माना जा रहा है। दोनों संस्थान पटना के मुसल्लहपुर हाट जैसे घनी आबादी वाले इलाके में अगल-बगल स्थित हैं और दोनों ने हाल की सिपाही भर्ती में सफल छात्रों को सम्मानित करने के लिए कार्यक्रम आयोजित किए थे। विवाद तब बढ़ा, जब दोनों की सूची में बड़ी संख्या में समान नाम पाए गए।

स्थिति तब और बिगड़ी जब आरोप लगा कि एक संस्थान के बैनर पर दूसरे संस्थान के पोस्टर लगाए गए। इसके बाद बैनर हटाने और फाड़ने की घटना हुई, जो आगे चलकर हिंसा में बदल गई। एक सुरक्षा गार्ड की पिटाई हुई और मामला पुलिस तक पहुँचा। पुलिस अब सीसीटीवी फुटेज, बयानों और अन्य साक्ष्यों के आधार पर जांच कर रही है।

यह घटना केवल दो संस्थानों की लड़ाई नहीं है; यह उस बड़े कोचिंग उद्योग का चेहरा है, जहाँ शिक्षा अब सेवा कम और कारोबार अधिक बनती जा रही है। यूट्यूब और सोशल मीडिया ने शिक्षकों को ब्रांड में बदल दिया है। लाखों फॉलोअर्स, विज्ञापन और डिजिटल सदस्यता ने शिक्षा को एक बड़े व्यवसाय में तब्दील कर दिया है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या शिक्षा केवल नौकरी दिलाने तक सीमित हो गई है? क्या कोचिंग संस्थान छात्रों को केवल परीक्षा पास करना सिखा रहे हैं, या उन्हें बेहतर नागरिक भी बना रहे हैं? आज जरूरत केवल रोजगार की नहीं, बल्कि ऐसी शिक्षा की है जो संवेदनशीलता, लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक समझ को भी विकसित करे।

पटना का कोचिंग बाजार आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ शिक्षा, तकनीक और व्यापार का संगम दिखाई देता है। यह अवसर भी है और चुनौती भी। लेकिन अंततः छात्रों और अभिभावकों को यह समझना होगा कि चमकदार विज्ञापन, वायरल वीडियो और बड़े-बड़े दावे सफलता की गारंटी नहीं हैं। असली सफलता मूल पुस्तकों, अनुशासन और गंभीर अध्ययन से ही आती है।

क्योंकि शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी नहीं, बल्कि एक बेहतर समाज का निर्माण भी है।

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