आतंक की बदलती रणनीति और भारत की नई सुरक्षा चेतना भारत दशकों से आतंकवाद की चपेट में रहा है। कभी यह सीमापार से आयातित हिंसा के रूप में सामने आया, तो कभी भीतर से जन्मे कट्टरपंथ के रूप में। लेकिन आज का भारत उस भयभीत दौर से निकलकर एक नए युग में प्रवेश कर चुका है — जहाँ आतंक से मुकाबला केवल बंदूक, गोला-बारूद और सैन्य बल से नहीं, बल्कि नीति, तकनीक और संकल्प से किया जा रहा है।
फरीदाबाद की साजिश: जब आतंक का चेहरा बदला
हाल ही में फरीदाबाद में 2,900 किलोग्राम विस्फोटक और अत्याधुनिक हथियारों की बरामदगी ने सुरक्षा एजेंसियों को चौकन्ना कर दिया। जांच में यह खुलासा हुआ कि साजिश लाल क़िले जैसे राष्ट्रीय प्रतीक पर हमला करने की थी। यह घटना केवल सुरक्षा व्यवस्था की परीक्षा नहीं थी, बल्कि यह चेतावनी थी कि आतंक अब नया रूप ले चुका है।अब आतंकवादी सीमाओं से नहीं, प्रयोगशालाओं और लैपटॉप से निकल रहे हैं। आतंक ने इस बार फटे बैग नहीं, बल्कि सफ़ेद कोट पहना था — यानी वह पढ़े-लिखे, प्रोफेशनल वर्ग से भी निकल रहा है, जो विज्ञान को विनाश का औजार बना रहा है।
“व्हाइट कॉलर जिहाद” – नया खतरा
यह नया आतंकवाद किसी गरीब या वंचित वर्ग से नहीं, बल्कि शिक्षित और तकनीकी रूप से सक्षम तबके से उपज रहा है। यह “व्हाइट कॉलर जिहाद” है — जहाँ डॉक्टर, इंजीनियर या वैज्ञानिक कट्टर विचारधारा के अधीन होकर आतंक की योजना बनाते हैं।यह प्रवृत्ति बताती है कि आतंकवाद अब गरीबी या बेरोजगारी की उपज नहीं, बल्कि वैचारिक प्रदूषण का परिणाम है। और इसका समाधान केवल संवेदनशीलता नहीं, बल्कि कठोर और निर्णायक नीति से ही संभव है।
नेतृत्व का अंतर: नीति बनाम प्रतिक्रिया
बीते वर्षों में भारत ने अपने सुरक्षा ढांचे को जिस गति से सुदृढ़ किया है, वह वैश्विक स्तर पर सराहनीय है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सुरक्षा एजेंसियों को अधिक स्वतंत्रता, आधुनिक उपकरण और राजनीतिक समर्थन मिला है।जहाँ पहले आतंक की घटनाओं के बाद केवल प्रतिक्रिया होती थी, अब रोकथाम प्राथमिकता बन चुकी है।गुजरात की “राइसिन साजिश” इसका उदाहरण है, जिसे एटीएस ने बिना किसी जनहानि के नष्ट कर दिया। यह केवल कार्यक्षमता नहीं, बल्कि नई प्रशासनिक सोच का परिणाम है।
राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव: अतीत की भूलें
कांग्रेस शासनकाल में भारत के लिए सबसे असुरक्षित दशक साबित हुआ। 2004 से 2014 के बीच मुंबई, दिल्ली, वाराणसी, हैदराबाद जैसे शहर बार-बार निशाने पर रहे।उस दौर में आतंक के खिलाफ राजनीतिक दृढ़ता की कमी दिखी। बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद दिए गए भावनात्मक बयान और “हिंदू आतंकवाद” जैसे शब्दों का प्रयोग न केवल सुरक्षा एजेंसियों के मनोबल को कमजोर करता था, बल्कि असली जिहादी नेटवर्क को भी राहत देता था।राजनीति और सुरक्षा के बीच की यह दूरी भारत को लंबे समय तक असुरक्षित बनाती रही।
सीमाओं से साइबर तक: आतंक का विस्तार
आज आतंकवाद बंदूक से आगे बढ़ चुका है। सोशल मीडिया, एन्क्रिप्टेड चैट्स, डार्क वेब और ड्रोन तकनीक ने इसकी पहुँच को कई गुना बढ़ा दिया है।अब आतंकी संगठन भर्ती, फंडिंग और साजिश — सब ऑनलाइन करते हैं। यह “डिजिटल जिहाद” का युग है, जहाँ हर क्लिक एक संभावित खतरा बन सकता है।सरकार ने इस चुनौती का सामना करने के लिए साइबर इंटेलिजेंस नेटवर्क को मज़बूत किया है। डेटा एनालिटिक्स, एआई निगरानी और डिजिटल ट्रेसिंग अब भारतीय एजेंसियों के प्रमुख उपकरण हैं।
तुष्टीकरण की राजनीति से निर्णायक शासन तक
भारत के राजनीतिक परिदृश्य में आतंक से निपटने को लेकर दो विचारधाराएँ हमेशा आमने-सामने रही हैं। एक, जो तुष्टीकरण और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर निर्णय से बचती रही; दूसरी, जो राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानकर कठिन निर्णय लेने से नहीं हिचकती।
मुरशीदाबाद में बांग्लादेश सीमा के पास 150 बमों की बरामदगी इस बात की याद दिलाती है कि निष्क्रियता और वोट-बैंक की राजनीति हमेशा खतरा बढ़ाती है।भाजपा शासन में यह संतुलन बदल गया है — अब संदेश साफ है, “राष्ट्र की सुरक्षा से बड़ा कोई एजेंडा नहीं।”
नया भारत: जागरूक नागरिक और सशक्त तंत्र
सुरक्षा अब केवल सेना या एजेंसियों की जिम्मेदारी नहीं रही, बल्कि यह नागरिक चेतना का हिस्सा बन चुकी है। “देखो, बताओ, सतर्क रहो” जैसे अभियान इस जनसहयोग का प्रतीक हैं। नागरिक समाज अब केवल दर्शक नहीं, बल्कि सुरक्षा का सहभागी है। यह परिवर्तन भारत को न केवल सुरक्षित, बल्कि जिम्मेदार राष्ट्र भी बना रहा है।
लाल क़िले से डार्क वेब तक: प्रतीक और संघर्ष
लाल क़िले पर संभावित हमला भारत की आत्मा पर प्रहार था। लेकिन यह साजिश अपने अंजाम तक नहीं पहुँच सकी — क्योंकि भारत ने अब अपने नेतृत्व में ऐसी निर्णायकता विकसित कर ली है, जो किसी खतरे को बढ़ने नहीं देती। आज की सुरक्षा नीति यह मानती है कि आतंक को जवाब देने का सबसे अच्छा तरीका है — उसे जन्म लेने से पहले समाप्त कर देना।
जागरूक राष्ट्र, सुरक्षित कल
आतंक का स्वरूप हर दशक में बदलता रहा है — कभी सीमा पार से, कभी भीतर से, और अब डिजिटल माध्यमों से।लेकिन भारत ने हर बार खुद को पुनर्गठित किया है। आज यह राष्ट्र तकनीकी रूप से सक्षम, वैचारिक रूप से एकजुट और नेतृत्व के स्तर पर दृढ़ है। यह वही भारत है जो अब भय से नहीं, भरोसे से चलता है।
“जो देश की ओर आँख उठाएगा, उसका नाम मिट जाएगा”- यह सिर्फ नारा नहीं, बल्कि एक नए आत्मविश्वासी भारत की नीति है।

प्रस्तुति : गोविंद मिश्रा, पत्रकार






