गयाजी – (मुकेश प्रसाद सिन्हा)। बिहार की सड़कों पर इन दिनों कुछ अलग सा दिख रहा है। नई सरकार के आने के बाद प्रशासन जिस तेज़ी से अतिक्रमण हटाने में जुटा है, वह लोगों के बीच उम्मीद भी जगाता है और सवाल भी खड़ा करता है कि यह सिर्फ दिखावा है या सच में स्थायी सुधार की दिशा में उठाया गया कदम? खबरों के अनुसार राज्य के करीब 200 स्थानों पर प्रशासन लगातार कार्रवाई कर रहा है। कहते हैं, किसी शहर की पहचान सिर्फ उसके भवनों या बाज़ारों से नहीं होती; उसकी पहचान उसके रास्तों, उसकी खुली हवा, उसके बहते पानी, उसके जीवित तालाबों और उसके सुरक्षित सार्वजनिक स्थानों से होती है। लेकिन अफ़सोस, बिहार में इन सभी जगहों पर वर्षों से अतिक्रमण का बोझ जमा होता गया—मानो किसी ने शहरों की साँसें ही रोक दी हों।
मेरे विचार से, यदि ईमानदारी से अतिक्रमण हटाया जाए तो बिना सड़क चौड़ी किए भी शहरों की जाम की समस्या काफी हद तक खत्म हो सकती है। हमने वर्षों देखा है कि प्रशासन कभी–कभी कार्रवाई करता है, लेकिन कुछ ही महीनों में हालात फिर से उसी जगह लौट आते हैं। सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक स्थानों के बाहर फैला अतिक्रमण इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सड़कें चौड़ी होने के बावजूद आधा हिस्सा दुकानों, ठेलों, पार्किंग और तार–खंभों में घिरा रहता है, जिससे आवागमन बाधित होता है।
आज स्थिति यह है कि सड़कें चौड़ी तो दिखती हैं, पर उन पर चलना हर रोज़ एक नई परीक्षा जैसा है। दुकानों के शेड, ठेले, गलत पार्किंग, बिजली के खंभे और अनगिनत अवैध निर्माण—सब मिलकर रास्तों को निगल चुके हैं। जाम सिर्फ गाड़ियों का नहीं, बल्कि नागरिकों के धैर्य का भी हो चुका है।
सरकारी कार्यालयों के सामने फैला अतिक्रमण तो मानो एक कड़वा व्यंग्य है—जहाँ नियमों की रक्षा होनी चाहिए, वहीं नियमों का सबसे अधिक अपमान होता दिखता है। विडंबना यह है कि रोज़ इन्हीं रास्तों से गुजरने वाले अधिकारियों की निगाहें भी इन समस्याओं को अनदेखा कर देती हैं।
सड़कें ही नहीं, हमारी नदियाँ, तालाब, जंगल, पहाड़—सभी ने अपनी खोई हुई जगह के लिए चुपचाप संघर्ष किया है। अतिक्रमण ने न सिर्फ शहरों की रफ्तार रोकी है, बल्कि प्रकृति की धड़कन तक धीमी कर दी है।
इसका दुष्परिणाम सीधे आम जनता को भुगतना पड़ता है। आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है? यदि प्रशासन चाहे तो समस्या की शुरुआत होने से पहले ही इसका समाधान संभव है।
अब सरकार ने कड़ा कदम उठाया है। कार्रवाई तेज़ है, और फैसले कठोर। लेकिन हर कठोर कदम के पीछे विरोध का तूफान भी उठता है। विपक्ष गरीबों को हटाए जाने का मुद्दा उठाएगा, और सत्ता पक्ष के कुछ हित समूह भी असहज होंगे—क्योंकि इन अवैध कब्ज़ों की नींव कई बार वोट बैंक की राजनीति में ही पलती है।
मगर बदलाव की राह कभी आसान नहीं होती। वास्तविक सुधार हमेशा एक दृढ़ इच्छाशक्ति मांगता है—वह इच्छा जो राजनीतिक गणना से ऊपर उठकर जनहित को सर्वोपरि रखती है।
आज बिहार एक मोड़ पर खड़ा है। दिशा तय करने का समय सरकार के हाथ में है, पर उम्मीद की लौ आम जनता के दिल में है। लोग सिर्फ एक सवाल पूछ रहे हैं—क्या इस बार अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई स्थायी होगी? क्योंकि जनता थक चुकी है—जाम से, अव्यवस्था से, अनदेखी से।






