नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने चुनावी ड्यूटी में शिक्षकों की लगातार बढ़ती जिम्मेदारियों पर चिंता जताते हुए चुनाव आयोग (ईसीआई) को संवेदनशील रहने की नसीहत दी है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि चुनाव संबंधी कार्य इतना अधिक नहीं होना चाहिए कि शिक्षक मानसिक और शारीरिक रूप से टूट जाएं या रोने पर मजबूर हो जाएं।
मंगलवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने अंबेडकर नगर विधानसभा क्षेत्र से जुड़े मामले में चुनाव आयोग द्वारा दाखिल हलफनामे पर विचार किया। न्यायालय ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 13बी के तहत चुनाव आयोग को मतदाता सूची के पुनरीक्षण सहित चुनाव संबंधी कार्यों के लिए सरकारी शिक्षकों की सेवाएं लेने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है।
अदालत ने कहा कि इस अधिकार का प्रयोग शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम, 2009 की धारा 27 तथा बच्चों की पढ़ाई पर पड़ने वाले प्रभाव को ध्यान में रखते हुए संतुलित तरीके से किया जाना चाहिए। हाई कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के ‘सेंट मैरी’ फैसले का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव कराना जितना संवैधानिक दायित्व है, उतना ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना भी राज्य की जिम्मेदारी है।
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने अदालत को बताया कि शिक्षकों से चुनाव संबंधी कार्य केवल अवकाश के दिनों, गैर-शिक्षण दिवसों या स्कूल समय के बाद ही कराया जाता है। इस पर अदालत ने कहा कि छह से आठ घंटे की नियमित स्कूल ड्यूटी के बाद अतिरिक्त चुनावी कार्य शिक्षकों पर शारीरिक और मानसिक दबाव बढ़ा सकता है।
हाई कोर्ट ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ), जिला निर्वाचन अधिकारियों (डीईओ) तथा अन्य संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे शिक्षकों की परिस्थितियों के प्रति संवेदनशील रहें और चुनावी ड्यूटी इस प्रकार निर्धारित करें कि कार्य का बोझ संभालने योग्य रहे तथा किसी शिक्षक के जीवन पर असहनीय दबाव न पड़े।
हालांकि चुनाव आयोग ने अदालत को भरोसा दिलाया कि वह शिक्षकों की कठिनाइयों को कम करने के लिए आवश्यक कदम उठा रहा है। मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त को निर्धारित की गई है।





